Tuesday, November 19, 2024

1004. पुरुष भी रोते हैं

कौन कहता है कि, मर्द रोते नहीं।
रोते तो हैं मगर आँसू बहाते नहीं।

पुरुषों का हृदय कोई पत्थर का नहीं होता
वहाँ भी धड़कती है एक जान किसी के लिये
एक पुरूष केवल पुरूष ही नहीं होता
होता है एक माँ का दुलारा, बाप का प्यारा
एक पत्नी का संसार और बच्चों का सहारा।
घर परिवार से बाहर दुनिया और समाज
माथे पर जिम्मेवारियों का कँटीला ताज
पुरूष भी रोता और सिसकता है
आंसुओं के बाढ़ को रोक लेता है
उसकी भी आँखे होती है नम
पी जाता है अंदर ही सारे गम।
बूढ़े माँ-बाप कहीं कमजोर न पड़ जाएं
बीवी-बच्चे कहीं उदास न हो जाएं।
इसलिए आँसुओ को दबाना पड़ता है।
चेहरे पर लाकर झूठी -सी मुस्कान
दिल में हर गम को छुपाना पड़ता है। 
पुरूष तब रोता है जब वह तन्हा होता है
जीवन के भँवर में जब खुद को खोता है।
अकेले ही सारी दुनिया का बोझ ढोता है।
हाँ पुरूष भी अंदर-अंदर खूब रोता है। 

पुरुष दिवस की बधाई।
कवि पंकज प्रियम

Saturday, November 2, 2024

1003. खोना पड़ता है

रातों की नींद, दिन का सुकून खोना पड़ता है।
घर-परिवार, सुख-चैन से दूर होना पड़ता है।
फ़क़त पत्थर फैंकने से फल नहीं मिल जाता-
दिनरात पसीना बहाकर बीज बोना पड़ता है।।

ये मत सोच कि धरा ने तुमको दिया क्या है?
जरा सोच, धरा के लिए तुमने  किया क्या है?
ये जननी तो सबको समान अवसर देती है-
ये तो अपना कर्म है कि उससे लिया क्या है?

माँ और मिट्टी कहाँ बच्चों से हिसाब लेती है?
जो कुछ भी है सबकुछ तो बेहिसाब देती है।
ये बच्चों की नादानी है जो फ़र्क मान बैठते-
माँ का आँचल को आनंदमयी रमणरेती है।

फ़टी चादर को क्या तलवार से सिया जाता है?
अपनों से क्या रिश्तों का हिसाब लिया जाता है?
मिलना न मिलना सब तय है उसके बहीखाते में-
फल तो वही मिलता है जो कर्म किया जाता है।।

प्रियमवाणी
©पङ्कज प्रियम