राम मन्दिर: आस्था और समर्पण
जो राम का नहीं, किसी काम का नहीं
अयोध्या राम मन्दिर में चढ़ावे की चोरी से किसी भी सच्चे सनातनी का मन आहत जरूर है लेकिन आस्था में कोई कमी नहीं हुई है। भला चोर उच्चकों के कारण भगवान और मन्दिरो पर आस्था कम हो सकती है क्या? घर मे नौकर चाकर चोरी कर लें तो क्या हमें अपने घर और मातापिता के प्रति आस्था घट जाएगी क्या? जिन्होंने कुकर्म किया उन्हें आज नहीं तो कल कर्मो की सजा अवश्य मिलेगी लेकिन इसके लिए हम ईश्वर पर श्रद्धा कम कर देंगे क्या? जिन्होंने ईश्वर की चरणों में दान दे दिया तो फिर उसके बारे सोचना क्या? संविधान और कानून के हाथ से लोग भले बच सकते हैं लेकिन ईश्वर की लाठी से कोई नहीं बच सकता। प्रभु राम तो त्याग और मर्यादा की मूरत हैं, रामायण हमें त्याग, समर्पण, विश्वास और मर्यादा का पाठ पढ़ाता है। जिस प्रभु ने जन कल्याण हेतु एक क्षण में राजपाट छोड़कर वनवास ले लिया उनसे बड़ा धैर्यवान और त्यागी कौन होगा? भरत ने मिला हुआ राज्य त्यागकर राम की खड़ाऊं सर पे रखकर उनके आने तक स्वयं तपस्वी जीवन जिया। फिर चाहे।माता सीता हौ, भ्राता लक्ष्मण-उर्मिला या फिर परम् भक्त हनुमान हों, हर एक पात्र से हमें जीवन का पाठ पढ़ने को मिलता है। जिस प्रभु राम ने सोने की लंका जीतने से पूर्व ही विभीषण को दान कर दिया उन्हें तुच्छ सोने चांदी रत्न आभूषण की जरूरत है क्या?
अयोध्या मंदिर के मामले में किसी बड़ी साज़िश से भी इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि वर्षों बाद मन्दिर स्थापना के बाद से ही यह उन लोगों की आँख में खटक रहा है जिन्होंने जानबूझकर मन्दिर बनने नहीं दिया। कोर्ट के फैसले के बाद विरोधी तत्वों ने खुलेआम कह दिया था कि वे इस निर्णय को नहीं मानते और जब हुकूमत आएगी तो राम मन्दिर ध्वस्त कर दिया जाएगा। राम मंदिर हर ऐसे व्यक्ति की आंख की किरकिरी बना हुआ है जो नहीं चाहता था कि प्रभु राम का इतना भव्य मंदिर बने। मंदिर को बदनाम करने का हर सम्भव प्रयास जारी है। जिन्होंने राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था वे भी आज राम भक्त होने का स्वांग रचा रहे हैं। हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि हजारों कारसेवकों के बलिदान के बाद यह मंदिर बन सका है।
मंदिर आस्था का केंद्र होता जहाँ केवल श्रद्धा, समर्पण और तपस्या होनी चाहिए। उसे पर्यटन बनाएंगे तो लूट खसोट होगी ही। मंदिर में सिर्फ पुजारी और सच्चे सेवादार होने चाहिए जिनकी ईश्वर में अटूट श्रद्धा हो, उसे पाप का भय होता है, वह कभी चोरी नहीं कर सकता। प्राचीन काल के हजारों मंदिर इसके उदाहरण है। मंदिरों में सदियों लोग सोने, चांदी, रत्न आभूषण अपनी श्रद्धा के अनुसार चढ़ाते रहे लेकिन जबतक मन्दिर पुजारियों के भरोसे रहा कभी चोरी की घटना नहीं हुई, हमारे मन्दिर इतने समृद्ध थे कि विदेशी आक्रांताओं ने सबसे पहले मंदिरों को ही निशाना बनाया। राजा महाराजाओं ने कभी भी भी मंदिरों में अपने मैनेजर नियुक्त कर उससे धन उगाही नहीं की, मंदिरों के चढ़ावे से गुरुकुल चलते थे।
मन्दिर कोई होटल नहीं जहाँ व्यवस्था के लिए मैनेजर हों वहाँ तो सिर्फ सेवादार होने चाहिए। मंदिर की व्यवस्था हमेशा से वही पूरी ईमानदारी के साथ संभाल सकता है जिसको भगवान के प्रति पूर्ण आस्था है, भगवान की दिनरात पूजा अर्चना सेवा करनेवाला पुजारी मन्दिर से चोरी करने की बात कभी सपने में भी नहीं सोच सकता लेकिन जिनकी पूजापाठ में कोई रुचि ही नहीं वैसे लोगों को मन्दिर की व्यवस्था में जोड़ेंगे तो गड़बड़ होगी ही। अयोध्या मंदिर में चोरी तो बहुत बड़ी बात है और उन पापियों को दण्ड मिलेगा इसमे कोई दो राय नहीं है लेकिन इस घटना को लेकर जिस तरह से सनातन पर हमले शुरू हो गए हैं वह चिंतनीय है। आज वे लोग भी छाती पीटकर हल्ला मचा रहे हैं जिन्हें न तो सनातन में आस्था थी और न ही भगवान श्रीराम में। उन्होंने तो राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था। कुछ लोग इस घटना के बाद भगवान को झूठे बोलकर कह रहे हैं की भगवान होते तो चोरी होती क्या?
अरे! भगवान ने न तो कभी किसी चढ़ावा चढ़ाने को कहा और न ही उसकी रक्षा हेतु व्यवस्थापक रखने को। यह तो सरकारो ने मंदिर के चढ़ावे से मुफ्त की रेवड़ियां और सब्सिडी बांटने के लिए मंदिर को बैंक बना रखा है। मन्दिरों में चढ़ावे की देखरेख हेतु आफ़सर, बैंक कर्मी, मैनेजर और नौकर चाकर भर रखें है जिनकी न तो ईश्वर में आस्था होती है और न पाप का भय। उन्हें तो बस नोटो का पहाड़ दिखता है। चोरी सिर्फ मंदिर में तो हुई नहीं, जहाँ भी पैसों की बरसात होगी वहाँ चोरी लोग करेंगे ही। यह सामान्य कलयुगी मानवीय प्रवृति है। एक साधु संत तपस्वी ही इन चीजों से ऊपर है, उसे तो सिर्फ भगवान के भजन से मतलब है। इसमे आप आज के समृद्ध कथावाचकों को न जोड़आप बैंक लूट देखिए, अधिकांश मामलों में बैंक कर्मी मील होते हैं। सरकारी योजनाओं का हाल देखिए, मंदिरों से अधिक डाका तो सरकारी योजनाओं में पड़ता है, क्या मंत्री, क्या अफसर सभी अपने हिस्से की चोरी करने में लगे रहते हैं और यह सालों से चल रहा है। यूहीं तो कोई नेता साल दो साल में अरबो-खरबो का मालिक नहीं बन जाता? राम मंदिर में चोरी की घटना से किसी भी सच्चे सनातनी की आस्था और श्रद्धा में कोई कमी नहीं आयी है क्योंकि चोरी-डकैती लूटपाट हर जगह हो रही है भला इससे एक भक्त और भगवान के बीच की आस्था कैसे टूटने लगी? जो भी दान चढ़ावा करते हैं वे यह सोचकर नही करते की उसका क्या उपयोग होगा? वह तो अपनी श्रद्धा से अपनी कमाई का एक छोटा सा हिस्सा भगवान की चरणों मे समर्पित कर देता है इस भावना के साथ कि- "तेरा तूझको अर्पण क्या लागे मेरा" जब सबकुछ ईश्वर का ही है तो उस दान, चढ़ावे का दिखावा और अफ़सोस कैसा?
पंकज प्रियम