Monday, June 22, 2026

1018. ठोक दी गोली सीने में

ठोक दी गोली सीने में

उसे कह रहा था भ्रष्टाचारी, ठोक दी गोली सीने में। 
बहुत बन रहा था क्रांतिकारी, ठोक दी गोली सीने में।।

गाँव-गली की बात उठाकर, अपने कद को बढ़ा रहा था,
सत्ता विरुद्ध आवाज़ लगाकर, सबको कैसे चढ़ा रहा था। 
न्यायालय की राह कठिन थी, सच का खुलना बाकी था,
लेकिन फ़ैसला दिनदहाड़े, किस्मत को मिलना बाकी था। 
दफ़्तर-दफ़्तर कागज देकर, सरकारी विश्वास किया,
झूठ के ऊँचे सिंहासनों से, उसने सीधा त्रास लिया।

दरबारों को यह कब भाया, सच बोले जो जीने में।
बहुत बन रहा था क्रांतिकारी, ठोक दी गोली सीने में।।

कहते हैं मुठभेड़ हुई थी, कहते हैं हथियार मिला। 
कितने प्रश्न बचे हुए हैं, किसको है अधिकार मिला?
सच की लाशें दबी पड़ी है, सत्ता के तहख़ानों में,
जाने कितनी सिसक रही है,, बंद पड़े खदानों में।
लोकतंत्र की चौखट रोई, कानून खड़ा शर्माया है,
प्रश्न उठे जनता के जब, उत्तर गोली बन आया है। 

इतिहास पूछेगा कल तुमसे, क्या था दोष नगीने में?
बहुत बन रहा था क्रांतिकारी, ठोक दी गोली सीने में।।

जिसने सच की बात कही, वो ही सबसे भारी था,
दरबारों के झूठ के आगे, आँखों में चिंगारी था।
जनता के दुख-दर्द लिखे जो, वो अख़बार पुराना था,
राजमहल को आँख दिखा दे, ऐसा कहाँ जमाना था। 
काग़ज़, जिरह गवाह, अदालत, सबको पीछे छोड़ दिया,
जिसने सच की राह चुनी थी, उसका ही मुँह मोड़ दिया।

सच की कीमत पूछ रहे हो, बिकती है अब पीने में।
बहुत बन रहा था क्रांतिकारी, ठोक दी गोली सीने में।।

कानूनों की लंबी राहें, सबको बहुत थकाती हैं।
लेकिन सत्ता की बंदूकें, फ़ैसले तुरंत सुनाती हैं।
कल जो नारे गूँज रहे थे, आज सन्नाटा बोल रहा। 
लोकतंत्र की चौपालों में, कौन किसे अब तोल रहा?
इतिहासों की आदत है ये, सब हिसाब रख लेते हैं।
तख़्त बदलते देर न लगती, बदल के मंज़र देते हैं।

सच की कीमत यही बतायी, सूखा खून पसीने में।
बहुत बन रहा था क्रांतिकारी, ठोक दी गोली सीने में।

माना उसकी गलती थी, जो सत्ता को ललकारा था,
पर सिस्टम के आगे वह भी, कदम कदम पे हारा था।
बन्दूक उठाकर उसने भी, बहुत बड़ा अपराध किया,
आत्मसमर्पण करके लेकिन, था खुद को साध लिया।
उसके बाद हुआ जो कुछ भी, उसको कैसे छुपाओगे?
जिन प्रश्नों को छोड़ गया वह, उत्तर कैसे बताओगे?

तेरी भाषा मे कह दूं तो, "थी कॉक्रोची खून कमीने में"
बहुत बन रहा था क्रांतिकारी, ठोक दी गोली सीने में।।
पंकज प्रियम 
22.06.2026

सत्य है हर अन्याय के विरुद्ध बन्दूक उठाना समाधान नहीं है,
लेकिन इसके लिए सिस्टम को भी खुद सुधरने की जरूरत है। 
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