Thursday, January 22, 2026

1012.शून्य से शब्द

शून्य से शब्द

चाहता हूँ लिखना
मैं भी बहुत कुछ
पर मन है अशांत उद्विग्न
कुछ जाना, कुछ भिन्न
शून्य में खोजता हूँ
कुछ शब्द कुछ बिम्ब
पर,जाने क्यूँ? 
सूझता नहीं कुछ.
खो गया कहाँ
न जाने अब
अपना ही प्रतिबिम्ब।
चाहता हूँ जोड़ना
रिश्तों को प्यार से
स्नेहिल रेशमी तार से
पर पता नहीं क्यूँ
उलझ जाते हैं
रेत से बिखर जाते हैं
चाहता हूँ खोलना
खुद को उलझे जाल से
अनकहे अनसुने
अनसुलझे जंजाल से
चाहता हूँ जितना 
मैं सुलझना
उतना ही और
उलझा पाता हूँ। 
खोजता हूँ 
स्वयं में स्वयं को
पर खुद को भी
कहाँ ढूंढ़ पाता हूँ।
शब्दों के सागर में
डूबकर भी कहाँ
कुछ लिख पाता हूँ
है कोई ?
जो मुझसे
मिला दे मुझे!
शून्य से शब्द
दिला दे मुझे!

©पंकज प्रियम
22.1.2026

1011.सिस्टम

सिस्टम

फाइलों के जंजाल में,
बाबू मकड़जाल में,
टेबुल सुस्ती चाल में,
        काम अड़ जाता है।

कागजी पड़ताल में,
बेजा के हड़ताल में,
नियम भेड़चाल में,
       सिस्टम सड़ जाता है।

यहाँ-वहाँ चक्कर मे,
घूमे घनचक्कर में,
अहम के टक्कर में,
       खुदे लड़ जाता है। 

सब बने बोली वीर,
हवा में चलावे तीर,
काम जो पड़े तो फिर
          पैर पड़ जाता है।

        ©पंकज प्रियम
22.01.2026