Tuesday, April 10, 2018

दिल की सज़ा

उनपर भी सजा मुक़र्रर कर दो साहब
जिस्म से निकाल के जो दिल तोड़ गए।

दफा 302 नहीं,307 तो लगा दो साहब
दिल तो तोड़ा मगर,जान क्यूँ छोड़ गए।

ऐ हवा!जाके कह दो ,तनिक उनसे जरा
वो तेरे दिल मे था,फिर क्यूँ मुँह मोड़ गए।

एक सजा तो जरूर मुक़र्रर करना साहब
कसूर उनके हुश्न का,आंखे मेरी फोड़ गए।

बढ़ाया था हाथ,था वादा साथ निभाने का
बड़ी बेदर्दी से प्रियम,वो यूँ हाथ जोड़ गए।

#©पंकज प्रियम
10.4.2018