Thursday, April 12, 2018

नन्ही जान थी



ना वो हिन्दू थी ना वो मुसलमान थी
हवसी दरिन्दों! वो तो नन्ही जान थी।

कितनी बेदर्दी से नोचा मिलकर तुमने
वो भी किसी के दिल की अरमान थी।

अरे हवस के अंधो! बेशर्म हो कितने
वो तो तेरी बेटी जैसी ही तो नादान थी।

मत भूल तू भी तो किसी का होगा बाप
शर्म नही आई करते तुझे ये जघन्य पाप।
किस मुंह को लेकर घर को तुम जाओगे
कैसे तुम औलादों से ये नजऱ मिलाओगे।
ना धिक्कारा हृदय तुम्हारा?न ही सन्ताप!

अरे हैवानों! किस बेदर्दी से तोड़ा तुमने
बाज़ार में बिकती,नहीं कोई सामान थी।

चुप रहो! मौत की सिसायत करने वालो!
कोई वोट नही, वो बेटी हिंदुस्तान की थी।

जाति,धर्म,मजहब में देश को बाँटनेवालों
वो कोई धर्म नही,किसी की अभिमान थी।

©पंकज प्रियम
12.4.2018