Sunday, July 26, 2026

1026.अधिकार की लड़ाई, संस्कारों की कीमत पर नहीं

अधिकार की लड़ाई, संस्कारों की कीमत पर नहीं

पेपर लीक का विरोध पूरी तरह न्यायोचित था। युवाओं का आक्रोश स्वाभाविक था, क्योंकि जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के सपने और परिश्रम भी आहत होते हैं। सरकार ने कार्रवाई की, शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दिया। अब आवश्यकता है कि इस षड्यंत्र में शामिल प्रत्येक दोषी को कानून के अनुसार कठोरतम दंड मिले, ताकि भविष्य में कोई भी विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ करने का साहस न कर सके।

किन्तु इस पूरे आंदोलन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों का जो आचरण सामने आया, वह अत्यंत दुखद और चिंताजनक है। विरोध के नाम पर अश्लील भाषा, अभद्र नारे और मर्यादा की सीमाओं का उल्लंघन किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की गरिमा को कलंकित करता है। अपनी बात रखने के लिए विचारों की शक्ति चाहिए, अभद्रता की नहीं। इस धरना प्रदर्शन में कुछ ऐसे फोटो और वीडियो सोशल मीडिया में चल रहे हैं मैं तो अपने पेज पर उन्हें पोस्ट या शेयर नहीं कर सकता। हमारी अपनी मर्यादा और ऐसे संस्कार है कि उन्हें मैं तो नही दोहरा सकता। 

 अगर जेन Z का है ये संस्कार है तो उनके माँ-बाप को शर्म से डूब मरना चाहिए जिन्होनें अपने बच्चों को तमीज़ नहीं सिखायी। पहले भी धरने-प्रदर्शन, अनशन आंदोलन होते रहे, यह लोकतंत्र का अधिकार है लेकिन प्रदर्शन के नाम पर भौंडापन, हक और अधिकार के नारों की जगह खुलेआम अश्लीलता, यह किसी भी विद्यार्थी के लक्षण नहीं हैं। उदण्ड लड़कों को तो फिर भी लोग समझ सकते हैं कि बाहर जाकर वे बिगड़ जाते हैं लेकिन जंतर मंतर में लड़कियों के द्वारा इस तरह अश्लीलता गम्भीर चिंता पैदा करती है। स्त्रियों का तो श्रृंगार लाज है जिसे इस प्रदर्शन में लड़कियों ने ताक पर रख दिया। अगर ये जेनZ है तो सभ्य समाज के लिए यह जेनरेशन कोढ़ साबित होगी। किसी भी समाज के लिए शब्दों की मर्यादा, संस्कारित आचरण और सकारात्मक विचार आवश्यक हैं।

भारत में धरना, प्रदर्शन और आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकार हैं। हमारे देश ने अनेक ऐतिहासिक आंदोलनों को देखा है, जहाँ असहमति भी शालीनता, संयम और नैतिक बल के साथ व्यक्त की गई। अधिकारों की लड़ाई यदि गरिमा और संस्कारों के साथ लड़ी जाए, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक और सकारात्मक होता है।

लोकतंत्र हमें विरोध का अधिकार देता है, परंतु संस्कृति हमें उसकी मर्यादा सिखाती है। हमारे देश ने गांधी, जयप्रकाश नारायण और अनेक जनांदोलनों की परंपरा देखी है, जहाँ संघर्ष था, पर संयम भी था; असहमति थी, पर शालीनता भी थी।

सबसे अधिक पीड़ा तब होती है, जब विद्यार्थी, जो राष्ट्र का भविष्य कहलाते हैं, स्वयं अपने आचरण से शिक्षा और संस्कार की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं। विशेष रूप से जब बेटियाँ भी सार्वजनिक मंचों पर अभद्र भाषा और अशोभनीय व्यवहार का प्रदर्शन करती दिखाई दें, तो यह केवल एक आंदोलन का विषय नहीं रह जाता, बल्कि समाज और परिवार दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाता है। नारी की सबसे बड़ी पहचान उसका आत्मसम्मान और उसका गरिमामय व्यक्तित्व है।

हाँ, यह भी उतना ही सत्य है कि कुछ व्यक्तियों के आचरण के आधार पर पूरी पीढ़ी या सभी विद्यार्थियों को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। आज भी असंख्य युवा ऐसे हैं, जो शालीनता, अनुशासन और तर्क के साथ अपनी बात रखते हैं और वही इस देश की वास्तविक शक्ति हैं।

माता-पिता अपने बच्चों को केवल डिग्री लेने के लिए नहीं, बल्कि एक बेहतर इंसान बनने के लिए घर से दूर भेजते हैं। शिक्षा यदि चरित्र निर्माण न कर सके, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। क्या दिल्ली की हवा की मानिंद वहाँ की शिक्षा भी प्रदूषित हो चुकी है?

विकसित भारत केवल आधुनिक इमारतों, तकनीक और अर्थव्यवस्था से नहीं बनेगा; वह संस्कारित नागरिकों, संयमित विचारों और मर्यादित आचरण से बनेगा।

अधिकारों की लड़ाई अवश्य लड़िए, लेकिन अपनी भाषा, अपने व्यवहार और अपने संस्कारों की कीमत पर नहीं। यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।

जय हिन्द!

 पंकज प्रियम
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Thursday, July 23, 2026

1025. आंदोलन

आंदोलन के नाम पे क्या तुम सारा देश जला दोगे?
नईं हुकूमत लाने को क्या, घर की नींव हिला दोगे?
शासन से मतभेद अगर है, आसन से तुम बात करो-
पर भीड़तंत्र के आगे क्या तुम लोकतंत्र झुठला दोगे?
@पंकज प्रियम

Monday, July 13, 2026

1023. कपूत



जिस बाप ने तुझको जनम दिया
और पाला पोसा बड़ा किया।
थाम के अँगुली चलना सिखाया
क़दमों पर अपने खड़ा किया।

आज विवश लाचार हुआ तो
हाय! कैसा तुमने कर्म किया?
हाथ उठाकर पिता पे तूने
अरे! कैसा ये अधर्म किया?

तनिक न कांपे हाथ तुम्हारे?
नहीं तुझे क्या शर्म लगी?
जिसने तुझको नाम दिया
संग उसके ही कुकर्म किया।

फ़टी क़मीज़ और फटे ही जूते
खुद ही पहने बाबा ने।
आदमी एकदिन बड़ा बनेगा
देखे सपने बाबा ने।

उन्हें पता क्या बड़ा तू होकर,
उनपे ही हाथ चलाएगा।
जिसने तुझको दुनिया दिखायी
उन्हें ही आँख दिखाएगा?
पंकज प्रियम 

Sunday, July 5, 2026

1022. अभिमान कैसा?

अभिमान कैसा?

ये दौलत ये शोहरत ये सम्मान कैसा?
ये जीवन उधारी तो' अभिमान कैसा?

जहाँ धड़कने भी उधारी किसी की
किसी को वहाँ दे अभयदान कैसा?

पलों से जियादा कहाँ ज़िन्दगी है?
तो पलपल पले ख़ूब अरमान कैसा?

पढ़ा और लिक्खा नहीं हर्फ़ से बढ़,
तो कहना तेरा खुद ही विद्वान कैसा?

उसी के' इशारों पे' चलती है' साँसे,
बँधी डोर पुतली का गुमान कैसा?

कहाँ कुछ लिये आये जाना कहाँ है
फ़क़त चार दिन का है' एहसान कैसा?

बिखर जाएगी देह माटी में मिलकर ,
परिंदों सा उड़ना है आसमान कैसा?

धरा ही रहेगा........ कमाया धरा में,
सफ़र ज़िन्दगी फिर ये सामान कैसा?

प्रियम जो कमाया, उसी का दिया सब
उसी का उसी को किया दान कैसा?
©पंकज प्रियम

Thursday, July 2, 2026

१०२१. व्यास का पुत्र व्यास नहीं बन सकता ?

 राजा का बेटा राजा, किसान का बेटा किसान, फ़िल्म स्टार के बच्चे स्टार, नेता का बेटा नेता, मुख्यमंत्री का बेटा मुख्यमंत्री, डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर, IAS/IPS के बच्चे भी उसी राह पर चलते हैं तो फिर एक कथावाचक का बेटा कथा क्यों नहीं कर सकता? इससे सबके पेट में दर्द क्यूँ होने लगा है? आरक्षण की सीढ़ी पीढ़ी-दर-पीढी चल सकती है लेकिन एक योग्य बालक अपनी पिता का काम नहीं सम्भाल सकता? मने हद ही कर देते हैं सब ! देवकीनंदन ठाकुर जी का बेटा देवांश किसी का हक तो मारने जा रहा है? कहीं नौकरी के लिए रोना/धोना करने नहीं जा रहा है? उसे व्यासपीठ की गद्दी विरासत में मिली है तो क्या दिक्कत है?

क्या वह अपने घर की व्यास परंपरा को आगे बढ़ाए या उन नौकरियों के लिए मत्था खपाये जहाँ अधिकांश प्रतिभा या तो आरक्षण के तले कुचली जाती है या फिर परीक्षा से पहले ही लाखों करोड़ों में क्वेश्चन लीक होने से हार जाती है।
अरे! बच्चे तो बचपन जो देखते आते हैं वही बनते हैं इसमें गलत क्या है? अगर यही कुछ और करता तो लोग कहते कि दुनिया को प्रवचन देने वाले अपने बच्चों में संस्कार नहीं भर पाये। कुछ समय पूर्व जब डॉ कुमार विश्वास जी ने कहा था कि बच्चों को रामायण की शिक्षा देनी चाहिए नहीं तो घर का नाम रामायण रखने से कुछ नहीं होता तो कई लोगों ने उनके बच्चों के रहन -सहन पर टीका टिप्पणी शुरू कर दी थी कि सबको रामकथा सुनाने वाले अपने बच्चों को संस्कार सिखाओ। धर्म हो, व्यवसाय हो या फिर कोई भी धंधा, पीढ़ियों से आगे बढ़ती जाती है। जितने भी व्यापारी हैं सबके बच्चे व्यापार की करते हैं, नौकरी वालों के बच्चे भी बहुत हद तक अपने अभिभावकों के ही रास्ते चलते हैं।
जाहिर सी बात है कि देवकीनंदन ठाकुर के बेटे देवांश में बचपन से ही कथा प्रवचन के संस्कार पड़े हैं और अगर वह भी अपने पिता की राह पर चल रहा है तो इसमें बुरा क्या है? उसके अंदर प्रतिभा होगी तो अपने पिता से बड़ा कथावाचक बन सकता है. अगर प्रतिभा न हो बड़े बड़े नेता और अभिनेताओं के बच्चों को फ़्लॉप होते देखा है। देवकीनंदन ठाकुर ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर जो आश्रम खड़ा किया है उसे उनका बेटा नहीं तो कौन सम्भालेगा? किसी पर भी ओछी टिप्पणी करने से पहले खुद उसके लायक बन तो जाओ? किसी पर आप एक उँगली उठाते हो तो तीन तुम्हारी ओर ही स्वयं उठती है।
राधे राधे