समंदर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, मुझे खामोश रहने दो, छुपा है इश्क़ का दरिया, उसे खामोश बहने दो। नहीं मशहूर की चाहत, नहीं चाहूँ धनो दौलत- मुसाफ़िर अल्फ़ाज़ों का, मुझे खामोश चलने दो। ©पंकज प्रियम
आंदोलन के नाम पे क्या तुम सारा देश जला दोगे? नईं हुकूमत लाने को क्या, घर की नींव हिला दोगे? शासन से मतभेद अगर है, आसन से तुम बात करो- पर भीड़तंत्र के आगे क्या तुम लोकतंत्र झुठला दोगे? @पंकज प्रियम
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