Wednesday, June 24, 2026

1019. आग

आग
हम तभी जागते हैं जब 
लगती है कहीं पे आग
हो जाता है बड़ा हादसा
तब खुलती हमारी आंख
कुछ दिन पड़ताल चलेगी
कुछ दिन हो हल्ला होगा
घोषणा मुआवजा सरकारी
फिर वही चढ़ जाएगी 
सबकी आंखों में पट्टी
अखबारों में विज्ञापन की
जिम्मेवारों में रिश्वत की
सब सोये रहेंगे तबतक
जब तलक फिर कोई
हो नहीं जाएगा हादसा।
नहीं किसी की जिम्मेवारी
नही देखता कोई अधिकारी।
उनका क्या? जिनकी
गोद हो गयी सूनी
जिनके घर का बुझा चिराग
लग गयी सपनो में ही आग।

पंकज प्रियम 
साहित्योदय 

1 comment:

Admin said...

यह कविता हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई सामने रखती है। हम अक्सर किसी बड़े हादसे के बाद कुछ दिन शोर मचाते हैं, दुख जताते हैं और फिर सब कुछ भूल जाते हैं। सबसे ज्यादा दर्द उन लोगों का होता है, जिन्होंने अपने अपनों को खो दिया, लेकिन उनकी पीड़ा धीरे-धीरे खबरों से गायब हो जाती है।
बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

अधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
धन्यवाद!