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Thursday, July 2, 2026

१०२१. व्यास का पुत्र व्यास नहीं बन सकता ?

 राजा का बेटा राजा, किसान का बेटा किसान, फ़िल्म स्टार के बच्चे स्टार, नेता का बेटा नेता, मुख्यमंत्री का बेटा मुख्यमंत्री, डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर, IAS/IPS के बच्चे भी उसी राह पर चलते हैं तो फिर एक कथावाचक का बेटा कथा क्यों नहीं कर सकता? इससे सबके पेट में दर्द क्यूँ होने लगा है? आरक्षण की सीढ़ी पीढ़ी-दर-पीढी चल सकती है लेकिन एक योग्य बालक अपनी पिता का काम नहीं सम्भाल सकता? मने हद ही कर देते हैं सब ! देवकीनंदन ठाकुर जी का बेटा देवांश किसी का हक तो मारने जा रहा है? कहीं नौकरी के लिए रोना/धोना करने नहीं जा रहा है? उसे व्यासपीठ की गद्दी विरासत में मिली है तो क्या दिक्कत है?

क्या वह अपने घर की व्यास परंपरा को आगे बढ़ाए या उन नौकरियों के लिए मत्था खपाये जहाँ अधिकांश प्रतिभा या तो आरक्षण के तले कुचली जाती है या फिर परीक्षा से पहले ही लाखों करोड़ों में क्वेश्चन लीक होने से हार जाती है।
अरे! बच्चे तो बचपन जो देखते आते हैं वही बनते हैं इसमें गलत क्या है? अगर यही कुछ और करता तो लोग कहते कि दुनिया को प्रवचन देने वाले अपने बच्चों में संस्कार नहीं भर पाये। कुछ समय पूर्व जब डॉ कुमार विश्वास जी ने कहा था कि बच्चों को रामायण की शिक्षा देनी चाहिए नहीं तो घर का नाम रामायण रखने से कुछ नहीं होता तो कई लोगों ने उनके बच्चों के रहन -सहन पर टीका टिप्पणी शुरू कर दी थी कि सबको रामकथा सुनाने वाले अपने बच्चों को संस्कार सिखाओ। धर्म हो, व्यवसाय हो या फिर कोई भी धंधा, पीढ़ियों से आगे बढ़ती जाती है। जितने भी व्यापारी हैं सबके बच्चे व्यापार की करते हैं, नौकरी वालों के बच्चे भी बहुत हद तक अपने अभिभावकों के ही रास्ते चलते हैं।
जाहिर सी बात है कि देवकीनंदन ठाकुर के बेटे देवांश में बचपन से ही कथा प्रवचन के संस्कार पड़े हैं और अगर वह भी अपने पिता की राह पर चल रहा है तो इसमें बुरा क्या है? उसके अंदर प्रतिभा होगी तो अपने पिता से बड़ा कथावाचक बन सकता है. अगर प्रतिभा न हो बड़े बड़े नेता और अभिनेताओं के बच्चों को फ़्लॉप होते देखा है। देवकीनंदन ठाकुर ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर जो आश्रम खड़ा किया है उसे उनका बेटा नहीं तो कौन सम्भालेगा? किसी पर भी ओछी टिप्पणी करने से पहले खुद उसके लायक बन तो जाओ? किसी पर आप एक उँगली उठाते हो तो तीन तुम्हारी ओर ही स्वयं उठती है।
राधे राधे

Monday, June 15, 2026

1016. पत्थर की खोज

पत्थर की खोज

इन दिनों हर तरफ पत्थरों की ही चर्चा है। यूँ तो हमारे यहाँ फूलों की वर्षा का रिवाज़ है लेकिन जब ओले पड़ते हैं तो उसे आम बोलचाल की भाषा में पत्थरों की बारिश भी कहते हैं। हालाँकि यहाँ जिस पत्थर की बात चली है उससे हर कोई वाक़िफ़ है।आजकल कश्मीर से लेकर केरल तक पत्थरबाज शांतिपूर्ण ढंग से सड़कों पर पत्थरों की बारिश कर रहे हैं। पहले तो सिर्फ कश्मीर में ही भटके हुए युवा पत्थरों की बारिश करते थे लेकिन झटका तब लगा जब एक पत्थरबाज को ही सेना ने जीप के आगे बांधकर पत्थरों की बारिश से स्वागत कराया। इस तकनीक से सेना के जवान भटके हुए युवाओं की भीड़ से सकुशल बाहर निकल सके। एक बयान को लेकर  3 जून 2022 को कानपुर में पत्थरबाजों ने अपनी कला का जोरदार प्रदर्शन किया फिर 10 जून को तो एकसाथ 16 राज्यों में पत्थरों की बारिश हुई। कई पुलिसकर्मियों के सर फूटे, जानमाल का भारी नुकसान हुआ। हालाँकि इस शुक्रवार को पत्थर के साथ-साथ पेट्रोल बम और गोलियां भी चल गई। राँची में तो दो की मौत भी हो गयी। इसपर खूब बवाल भी मचा और किसी ने तो यहाँ तक कह दिया कि -"पत्थरों से जान जाती है क्या?" यही तो एक नया टेक्नीक डेवलप हुआ है कि पत्थर कोई हथियार तो है नहीं। संविधान और कानून की नजर में आप निहत्थे हैं और पुलिस इसके लिए गोली तो चलाएगी नहीं। किसी को पत्थर लग भी गया तो उसकी फोरेंसिक जाँच तो हो नहीं सकती! बुलेट का मिलान तो पिस्तौल से हो जाती है लेकिन पत्थर को फूटे सर से मिलान करना उतना आसान नहीं होगा। पत्थर मुफ्त और सुलभ हथियार के रूप में हर गली मोहल्ले में उपलब्ध है और चलाने के लिए भी कोई प्रशिक्षण की जरूरत नहीं। एक बच्चा भी पत्थर उठाकर किसी का सर फोड़ सकता है। बाद में उसे नाबालिक करार देकर कानूनी तौर पर बचा जा सकता है। इसी टेक्निकल खोज ने आज भारत को परेशान कर रखा है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी बाबा ने तो पत्थर के जवाब में बुलडोजर उतार दिया है। शुक्रवार को जो चलाएगा पत्थर, शनिवार को उसके घर चलेगा बुल्डोजर। लंबी और कि लचर कानूनी प्रकिया से आजिज आ चुकी आम जनता को यह बुलडोजर व्यवस्था बहुत भा रही है। कानूनी प्रक्रिया के तहत अगर कार्रवाई शुरू भी होती है तो सजा होते-होते दशकों बीत जाता है। सजा भी मामूली ऐसी की अपराधी को कोई फर्क पड़ता नहीं। 
आप भले पत्थर मार कर पुलिस का सर फोड़ दें, उनकी जान ले लें लेकिन पुलिस ने आत्मरक्षा में भी अगर हल्का बल प्रयोग कर लिया तो फिर पूरी दुनिया में विक्टिव कार्ड खेल सकते हैं कि पुलिस ने  निहत्थे मुल्जिमों पर गोली चला दी। 
यूँ तो पत्थर का प्रयोग पाषाण काल से ही प्रारम्भ हो गया था लेकिन तब मनुष्य अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ही इसका उपयोग करता था। पत्थरों के प्रयोग से आग की खोज हुई और मानव ने भोजन पका कर खाना सीखा। हालाँकि हमारे प्राचीन वेद और ग्रन्थों में बहुत पहले से मनुष्य काफी विकसित हो चुका था। चूंकि भारत में पत्थरों की कोई कमी नहीं है। विशाल पर्वत हो या पठारी चट्टान, नदी नाले या फिर मैदान, पत्थरों से पटा हुआ है अपना देश महान। यहाँ तो कंकर-कंकर में शंकर विद्यमान हैं। हम हैं कि हर पत्थर को बना देते हैं भगवान। वैसे भी हमारे यहाँ प्रचलित कहावत है -"मानो तो देव नहीं तो पत्थर". 
इसलिए सनातन धर्म मे पत्थर सदैव पूजनीय है। हमारे यहाँ तो पत्थरों को रत्न का दर्जा प्राप्त है जिसे हर कोई आभूषणों में इस्तेमाल करता है।उसका दुरूपयोग तो हम कर ही नहीं सकते। इतिहास को जानने समझने के लिए पत्थरो का बड़ा महत्व है तभी तो पहले के लोग शिलालेख की विधि अपनाते थे जो आज भी प्राचीन इतिहास का जीता जागता साक्षी है। पत्थरों से मूर्तियां और मन्दिर बनाये जाते थे तभी तो चाहकर भी विदेशी आक्रांता उनका अस्तित्व मिटा नहीं सके। हमारे आराध्य प्रभु राम ने तो सागर पर पत्थर का पुल बांध दिया था जो आज भी रामसेतु,  एडमब्रिज के नाम से जाना जाता है। भगवान श्री कृष्ण ने तो गोवर्द्धन पर्वत उठाकर न सिर्फ पूरे गोकुल की रक्षा की वल्कि देवराज इंद्र के घमंड को भी चकनाचूर कर दिया। यह सही है कि बगैर पत्थर के कंक्रीट के घर की कल्पना भी नहीं कि जा सकती है। घर हो या सड़क, पुल हो या बांध, बिना पत्थर के कुछ भी सम्भव नहीं है। इसलिए पत्थरों का बड़ा महत्व है लेकिन इसका उपयोग निर्माण में हो किसी के विनाश में नहीं।
  एक मुहावरा है -"ईंट का जवाब पत्थर" लेकिन इसका कतई मतलब नहीं है कि हम पत्थरबाजी करेंगे। दरअसल इसका सही अर्थ है मुँहतोड़ जवाब देना, पत्थर मारना नहीं। पत्थर को जड़ का स्वरूप भी माना गया है लेकिन  'करत-करत अभ्यास के जड़मति हॉट सुजान' भी प्रचलित है। पानी की लगातार गिरती धार और कुआं में रस्सी के घिसने से पत्थर कटने का भी उदाहरण है। यहाँ तो पत्थर से आसमान में भी सुराख कर देने का जज़्बा कायम है। दुष्यंत कुमार यूँ नहीं लिखते- 
"कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता?
जरा एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।

जो पत्थरबाजों के रहनुमा बनकर बोलते हैं कि पत्थर से किसी की जान जाती है क्या? तो उन्हें दुष्यंत कुमार के अंदाज़ में जवाब देना पड़ रहा कि

"कौन कहता है कि पत्थर से जान नहीं जाती?
जरा एक पत्थर तो तबियत से खाकर देखो!"

पत्थरों की मार उनसे पूछिये जिन बेगुनाहों/पुलिस जवानों के सर फटे हैं। राँची में ही पुलिस अधिकारी यूसी झा की पत्थर लगने से मौत हो गयी थी। ऐसे कितने ही जवान, इंसान पत्थरबाजों के पत्थर से घायल होते हैं, उनकी जान तक चली जाती है।  बचपन में मेरा भी सर फूटा है एक पत्थर से, हालाँकि किसी पत्थरबाजी का परिणाम नहीं बल्कि आम पेड़ के नीचे खड़े होने का दण्ड था। मेरे स्कूल का ही एक सहपाठी आम तोड़ रहा था जिसके हाथ से निकला पत्थर आम तो नहीं तोड़ पाया लेकिन मेरे सर को फोड़ डाला। एकबारगी तो लगा जैसे सर पर कोई चट्टान गिर पड़ा और मेरी आँखों के आगे अंधकार छा गया। वह लड़का तो भाग खड़ा हुआ। मेरे साथ मेरी दीदी थी वह मुझे पास के हैंडपंप तक ले गयी और जब सर पर पानी गिराया तो मानो खून की नदी बह निकली। हैंडपंप का पूरा प्लेटफार्म खून से लाल हो गया था। किसी तरह पास के हॉस्पिटल जाकर इलाज़ करवाया तो जान बची। वह एक अनजाने में लगा पत्थर था लेकिन जो पत्थरबाजी होती है उसमें तो इरादतन पूरे बल से पत्थर मारा जाता है अगर वह किसी के सर में लगे तो बचना मुश्किल है। आखिर किसने पत्थर चलाने की शुरुआत की है जो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत को चोटिल करता जा रहा है। क्यूँ कुछ लोग अपने छतों पर पत्थर जमा करके रखते हैं?और समय आने पर बेगुनाहों का सर फोड़ते हैं! जरूरत है इसपर ठोस कार्रवाई की। अपराधियों को कड़े दंड की ताकि कोई अन्य सपने में भी पत्थर चलाने की सोचे नहीं।
 

कवि पंकज प्रियम

Thursday, August 13, 2020

865.कोरोना से भी खतरनाक

कैसर से भी खतरनाक अवाँछित कार्य के दबाव
काम का दबाव और मौत
कवि पंकज प्रियम

व्यथित हूँ यह सुनकर की PTI के राँची ब्यूरोहेड पी बी रामानुजम जी ने आत्महत्या कर ली है। हमेशा चेहरे पर मुस्कान लिये रहते थे। जब भी बात होती बहुत शांत और शालीनता से अपनी बात रखते। कहा जा रहा है कि संस्थान के कार्य दबाव के कारण उन्होंने यह कदम उठाया। मौत के कुछ पहले ही देर रात आख़िरी ख़बर भी फाइल की जो उनकी कर्तव्यनिष्ठा बताने के लिए काफी है। सोचिए जो व्यक्ति मरने जा रहा हो वह अपने संस्थान के लिए अंत समय मे भी  आयी ख़बर को भेजता है। 
किसी के भी कार्य के दौरान या घर पर आत्महत्या की खबर बहुत ही व्यथित करने वाला होता है. यूँ तो आत्महत्या के कई कारण हो सकते हैं लेकिन कार्य में अवांछित दबाव कैंसर से भी खतरनाक होता है. चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो लेकिन कार्य की गुणवत्ता कभी भी दबाव से नहीं आती. व्यक्ति कार्य अपने घर-परिवार के लिए ही करता है लेकिन वही कार्य अगर उसके मन की शांति भंग करे. घर -परिवार के लिए वक्त नहीं मिले और अवांछित दबाव हो तो वह ज्वालामुखी की तरह फट जाता है. या तो वह विद्रोह के स्वर धर लेता है या फिर स्वयं का जीवन खत्म करने पर अमादा हो जाता है. घर -परिवार में भी जब अनावश्यक तनाव होता है तभी अपनी जान लेने का कठिन निर्णय ले लेता है. 
अपने 15 साल की सक्रिय पत्रकारिता में मैंने स्वयं महसूस किया कि विशुद्ध पत्रकारिता के लिए हरवक्त संक्रमण काल होता है। काम का दबाव हरवक्त रहता है , 1 ब्रेकिंग का छूटना आपके 99 एक्सलूसिव खबर पर पानी फेर देता है। उसपर से हरवक्त कम्पनियों की कोस्ट कटिंग के बहाने ...अभी कोरोना काल में सभी की जान खतरे में हैं। लोग घरों में बैठकर टेलीविजन पर मौत के आंकड़ों को देखकर मीडिया और सरकार को कोसते रहते हैं लेकिन उन्हें यह पता नहीं कि कितना खतरा मोल लेकर मीडिया, पुलिस, सरकारी कर्मी, अधिकारी कार्य करते हैं। आज पूरी दुनियां घरों में कैद है लेकिन हम जैसे लोग जान पर खेलकर रोज ऑफिस जाते हैं, लोगों से मिलते हैं काम करते हैं। निजी कंपनी हो या फिर सरकार, आज सबको अपने लक्ष्य को पूर्ण करने का दबाव झेलना पड़ रहा है। कोरोना ने सबको बाहरी बैठक, आयोजन पर रोक लगाया तो लोगों ने zoom ,गूगल और jio जैसे app ढूंढकर मीटिंग शुरू कर दी। पहले तो ऑफिस आवर में ही मीटिंग होती थी अब तो रात के 9 बजे या फिर छुट्टियों के दिन भी मीटिंग के लिए तत्काल व्हाट्सएप पर मैसेज आ जाता है। अब आप मर रहे हों या जी रहे हों, निकर में हों या लुंगी में मीटिंग में जुड़ना पड़ता है। महीनों तक वेतन न मिलने के बावजूद घर में क्या हालत है? कैसे जी रहा है यह देखने समझने की फुरसत न तो निजी कंपनियों को है और न ही सरकार को, उसे बस हर हाल में अपनी पीठ थपथपाने के लिए अनप्रैक्टिकल टारगेट पूर्ण कर के दिखाना है। चाहे इसके लिए लोग दबाव में आकर आत्महत्या ही क्यों  न कर लें। 2 मिनट का मौन रखकर शोक सभा होगी, "बेचारा बहुत अच्छा था"- कह हाथ झाड़कर चलते बनेंगे या फिर भाषण देंगे आख़िर आत्महत्या क्यों की, कायर था आदि-आदि। मैं भी आत्महत्या को गलत ही मानता हूँ लेकिन कुछ तो ऐसी परिस्थितियां आ ही जाती है जब लोगों के सोचने समझने की सारी शक्ति खत्म हो जाती है। बात 2014-15 की है तब मैं पाकुड़ में पदस्थापित था। जिस लोकल ट्रेन से सफ़र कर रहा था उसमें अंडाल स्टेशन पर एक 25-26 साल का आर्मी का जवान हमारी बोगी में चढ़ गया जबकि उसके बाकी साथी दूसरी बोगी में थे। कई बार उतरने की कोशिश करता रहा। हम सभी समझ रहे थे कि शायद जल्दबाज़ी में गलत बोगी में चढ़ा है इसलिए उतरना चाह रहा है। हम सबने मना  किया कि अगले स्टेशन पर बोगी बदल लेना। ठंड में भी वह पसीने से तरबतर था। खुद में बड़बड़ा रहा था कि-  मेरी कोई गलती नहीं है मेरी माँ बीमार थी इसलिय घर आया था। उसकी बातों से लग रहा था कि शायद छुट्टी नहीं मिलने के कारण ड्यूटी से भागकर अपनी माँ को देखने आया हो और अब दण्ड का डर सता रहा हो। वह कई बात गेट के पास जाता फिर अंदर बैठ जाता। यही क्रम चलता रहा। फिर वह गेट के साथ लगकर खड़ा हो गया। ट्रेन ने जैसे ही अपनी रफ़्तार तेज की उसने हाथ छोड़ दिया और खडाक..........।
सभी अवाक......। ट्रेन इतनी रफ्तार में थी कि रोकी नहीं जा सकी। उस पूरी रात मैं सो नही  पाया और आज भी वह घटना जेहन से जाती नहीं। पिछले दिनों सुशान्त की आत्महत्या की ख़बर आयी तो मैंने एक कविता लिखी थी कि आत्महत्या करनेवाला हीरो नहीं हो सकता है। हालांकि अब यह हत्या का मामला नज़र आ रहा है अतः मैंने अपनी उस कविता की बलि दे दी है। हालांकि आत्महत्या को मैं कभी सही नहीं मानता और इसे जीवन के संघर्षों से भागने का सबसे आसान तरीका समझता हूँ लेकिन किसी के लिए भी अपनी जान लेना बहुत कठिन होता है। खुद से अधिक अपने परिवार और बच्चों की चिंता सामने आती है। कोरोना में इस गम्भीर संकट में रोज ऑफिस जाता हूँ, सरकार के लक्ष्य को प्राप्त करने के उपरी दबाव में लगतार कार्य करता हूँ, लोगों से मिलता हूँ। यह सोचकर ही डर लगता है कि कुछ हुआ तो फिर बच्चों को कौन देखेगा? घर परिवार कौन संभालेगा? आप सोच सकते हैं कि ऐसे कितने ही सवालों से जूझने के बाद रामानुजम जैसे वरिष्ठ पत्रकार को भी आत्महत्या जैसे कदम उठाना पड़ा होगा। पत्रकार पूरी दुनिया से सवाल कर सकता है लेकिन मीडिया संस्थानों पर ही सवाल नहीं उठा सकता है। अगर किसी ने हिम्मत की तो उसे नौकरी से निकाल दी जाती है। यही स्थिति सरकारी गैर सरकारी सभी जगह लागू होता है। प्रबंधन में शामिल बड़े अधिकारी या पत्रकार अपनी कुर्सी बचाने के लिए कर्मचारियों से अधिक प्रबंधन के प्रति समर्पित हो जाते हैं। मैंने कई बार अपने यहाँ कर्मचारियों के हित में बड़े अधिकारियों से लड़ाई मोल ले ली जिसका खामियाजा हमेशा भुगतना पड़ा लेकिन मैंने देखा है कि जिनके लिए आप लड़ाई लड़ते हैं, अपने प्रबंधन से झगड़ा मोल लेते हैं वही मातहत कर्मचारी सिर्फ अपना स्वार्थ देखते हैं और जब वक्त आता है तो वही आपके साथ खड़ा नहीं होते। इसलिए ज़िन्दगी आपकी अपनी है सबको अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है। जिंदगी संघर्ष का नाम है इसे जीयें और अपने अंदर के तनाव को परिवार और दोस्तों में शेयर करें। खुद को सृजनात्मक कार्यो में इतना व्यस्त कर दें कि तनाव फटकने का नाम न ले। सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत रखें। भगवान ने जन्म दिया है तो भोजन भी वह देगा। कोई न तो किसी का जीवन चलाता है और न कुछ बिगाड़ ही सकता है। सत्य परेशान जरूर होता है लेकिन जीत सदैव उसी की होती है इसलिए मुश्किलों से घबराएं नहीं और ज़िन्दगी को खुशहाल बनाएं। योग साधना करें, पूजा पाठ करें, भजन करें या जो भी आपकी पसंद की चीज हो वही करें। 

अभी लिखता हूँ। बहुत लिखना बाकी है