मुसाफिर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, सफर अल्फाज़ करता हूँ. कहानी, गीत गजलों से , सहर आगाज़ करता हूँ . नहीं मशहूर की चाहत, नहीं हसरत बड़ी दौलत - प्रियम हूँ मैं मुहब्बत का, दिलों पे राज़ करता हूँ.. ©पंकज प्रियम
धरती बंजर काला अम्बर घनघोर घटाएं उमड़ रही।
ठूंठ हुआ तन बुझा नहीं मन जड़ों से मिट्टी उखड़ रही।
जर्जर काया मौत का साया जिंदगी मानो उजड़ रही।
पत्तों के आस में साँसों के विश्वास में हररोज़ जिन्दगी यूँ बढ़ रही।
©पंकज प्रियम