Thursday, August 27, 2026

1028. एक पल में स्वाहा

एक पल में स्वाहा...

घमण्ड..... किस बात का
पैसा, कुर्सी या ताक़त का?
किस बात की शत्रुता? 
मान- सम्मान- अपमान का
सब तो बस भरम है मन का
इस क्षणभंगुर ज़िन्दगी में
एक पल भी कहाँ लगता है?
सबकुछ बिखर जाने में
उधर नारायण ने चुटकी ली
और सबकुछ पलट जाता है पल में।
दौलत-शोहरत और इज्ज़त
सब खत्म हो जाती है एक क्षण में। 
ज़िंदगी तो उधार के सांसों पर है
एक पल में वसूली हो जाएगी
और तुम्हारी सांसे थम जाएगी

जब जब धरती पर पाप बढ़ा
जब जब प्रकृति संताप चढ़ा
प्रकृति स्वयं संतुलन बना लेती है
कभी बाढ़, कभी सुखाड़
कभी भूकम्प, कभी प्रलय
हर युग मे यही तो होता आया है
नदी- तालाब को पाटकर
बस्तियां बसा तो लोगे
पहाड़-जंगल को काटकर 
घर ऊपर बना तो लोगे
कुंआं- चुआं, पोखर-तालाब
के ऊपर कंक्रीट सजा तो लोगे
लेकिन नदियां अपने रास्ते आएगी
तुम्हें रौंदते हुए आगे निकल जाएगी
रह जाएगा सिर्फ तुम्हारा मलवा
पल भर भी कहाँ लगेगा ? 
पहाड़ों को अपनी देह झटकने में
और जब प्रदूषित करोगे
नदी, समंदर और पर्वत को
तब फटेगा कलेजा बादलों का
और क्षण में सबकुछ कर देगा स्वाहा।
पंकज प्रियम प्रियमवाणी 
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