प्रलय
रोक दोगे जो नदी का रास्ता
तो तय है विनाश से वास्ता
नदियां कब रुकी है
किसी के रोकने से
पत्थर, पर्वत, पेड़ मकान
सब बहा ले जाती है साथ मे
जो भो आता उसकी राह में
नदियों को पाटकर
पहाड़ो को काटकर
जंगल को चाटकर
अतिक्रमण घाटपर
प्रकृति के विरूद्ध
जो हो रहा नित नया विकास
वही लेकर आ रहा है विनाश
जीवन है प्रकृति के संग चलना
पेड़, पहाड़, नदी के अंग बनना
लेकिन विकास की अंधी दौड़ में
हो रहा हर रोज प्रकृति का नाश
पहाड़ों में ठंडी पुरवाई नहीं
होटलों की गर्म एसी चलती है
शांत सुरम्य पहाड़ी घाटियों में
अब बस पी-पों पीं-पों बजती है।
जब प्रकृति से करोगे खिलवाड़
तो फटेंगे बादल, यूहीं टूटेंगे पहाड़
अब भी है वक्त, सम्भल जाओ
धरती को अब और न सताओ
युगों-युगों से यही हुआ है
जन जन में तब संताप बढ़ा है।
जब जब धरती सतायी जाती है
प्रकृति, प्रलय बनकर आती है।
पंकज प्रियम
प्रियमवाणी
नेपाल त्रासदी में हताहत हुए सभी नागरिकों के लिए गहरी संवेदना है। ईश्वर उनकी आत्मा हो शांति प्रदान करे।
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