Sunday, September 13, 2026

1029. सिनेमा

जब पहली बार सिनेमा हॉल गया...
सनम बेवफा....और मोती पिच्चर
जब पहली बार सिनेमा हॉल गया....

मोती पिक्चर पैलेस की फोटो देखी तो बचपन की यादें ताजा हो गयी। उसवक्त गांव में रहता था और पांचवी के बाद तिसरी चला गया। तिसरी भी तब एक प्रखण्ड कस्बे से अधिक कुछ नहीं था। मनोरंजन के नाम पर कोई साधन उपलब्ध नहीं था। किसी किसी के घर रेडियो और बहुत बिरले ब्लैक एंड व्हाइट सलोरा टीवी। 

बात शायद 91 की होगी, उस वक्त गांव से गिरिडीह के लिए जमुआ द्वारपहरी होते गाड़ी से जाना पड़ता था। घर के पास वाली सड़क कच्ची, उबड़-खाबड़ और कई नदियों को पार करके जाना पड़ता था। मेरे पास एक छोटी लाल रंग की एटलस साइकिल थी, दिलीप दा को सिनेमा का बहुत शौक था, आज भी है। कहा चलो सिनेमा देखने, मेरे लिए तो पहला अनुभव था, चल दिया साइकिल में पीछे बैठकर। करीब घर से गिरिडीह करीब 20 किलोमीटर ऊबड़-खाबड़ रास्ते होते गिरिडीह पहुंचा। उस वक्त मोती हॉल का बड़ा क्रेज था। फ़िल्म लगी सनम बेवफ़ा। भीड़ काफ़ी थी और मेरा पहली बार इतनी भीड़ से सामना हुआ था। मैं घबड़ा रहा था और दिलीप दा को स्टैण्ड में साइकिल लगाने और फिर टिकट लेने जाना था। मैं उसका हाथ छोड़ नहीं रहा था तो उसने वह झुंझला उठा। मेरा बालमन दुखी हो गया। खैर उस रेलमपेल भीड़ टिकट लेकर पहली बार सिनेमा हॉल में सनम बेवफ़ा फ़िल्म देखी। जब गाना शुरू हुआ- ओ हरे दुप्पटे वाली" तो पूरा हॉल सीटियों से गूँज उठा। मेरे लिए ये पहला अजीब अनुभव था। सिनेमा देखने के बाद लौटते शाम हो गई तो रानीखावा में दिलीप दा की फुआ के घर रात बितायी और फिर अगली सुबह वापस घर लौटा था। दिलीप दा सिनेमा का इतना प्रेमी था कि पूछिये ही मत, आठवीं की परीक्षा दिलाने मुझे मिर्जागंज ले जाता तो मुझे स्कूल में छोड़कर वह उसी छोटी साइकिल से राजधनवार चला जाता और फ़िल्म देखने के बाद वापस मिर्जागंज मुझे लेने समय पर आ भी जाता था। उसके साथ मुझे भी सिनेमा का ऐसा चस्का लगा कि महीने में 3-4 फिल्मे तो देख दी लेता था। गिरिडीह के सवेरा, स्वर्ण, राजधनवार के राजमणि में तो सैकड़ो फ़िल्म देखी, सिनेमा का पागलपन ऐसा था की कई बार दिलीप दा और हम पैदल ही धनवार से उसके घर खेशरम्बा चले गए क्योंकि गाड़ी के लिए पैसा बचता ही नहीं था। 1993-94 में जब कॉलेज की पढ़ाई के लिए  रांची गया तो वहाँ भी खूब फिल्में देखी, सुजाता, संध्या, वेलफेयर, प्लाजा, सैनिक, वसुंधरा, लगभग सभी में फिल्मे देखी। तब सिनेमा हॉल में फिल्मों के बड़े बड़े कट आउट पोस्टर लगते थे, खाली समय मे वेलफेयर हॉल में पोस्टर बनते भी देखता और आनंदित होता। अब तो हॉल में जाकर ढाई-तीन घण्टे बैठकर फ़िल्म देखने का समय भी नहीं मिलता और जब से टॉकीज मल्टीप्लेक्स और ओटीटी में बदले हैं तबसे फ़िल्मो का वह आकर्षण ही खत्म हो गया है जो 90 के दशक में हुआ करता था। सिनेमा को लेकर बचपन की एक याद अभी भी मिटी नहीं है। वर्ष का ध्यान नहीं लेकिन हम बहुत छोटे थे, गांव वाली सड़क से गिरिडीह के लिए एकमात्र सामंतो बस चलती थी। छोटी फुआ की शादी के फूफा Ranjit Upadhyay जी आये थे तो फुआ-फूफा, गन्नू चा Ganpati Pathak और चाची कुछ और लोगों के साथ गिरिडीह सिनेमा देखने जा रहे थे। बचपने में हम और रंजीत Ranjeet Kumar Mishra भी संग में लटक लिये। चित्तरडीह के बहुत आगे शायद घोरंजो के आसपास हम दोनों को जबरन उतार दिया गया। हम और रंजीत मायूस होकर बस से उतर कर पैदल ही चलने लगे कि पैदल ही गिरिडीह चल जाएंगे। एकाध किलोमीटर चलने के बाद हिम्मत जवाब दे दिया और सारा जोश हवा हो गया। फिर वापस लौटने लगे, धूल भरी गर्म हवा में उड़ते-डोलते दोनो चलने लगेज तब उस रास्ते मे कोयला और अन्य सामानों को ढोने के लिए बैलगाड़ी चलती थी। एक बैलगाड़ी में हम दोनों सवार हो गए और फिर घर वापस लौट आये...../ अब ईश्वर की कृपा से सबकुछ तो है लेकिन फ़िल्म देखने का वक्त नहीं। कभी-कभार छुट्टियों में ott पर कुछ फिल्में देख लेते हैं लेकिन बोरिंग गाने और सीन को फ़ास्ट फारवर्ड स्किप करके। अब तो लगता है समय सनम बेवफा हो गया है। हालाँकि फिल्मों से प्रेम खत्म हुआ नहीं है, कुछ नागपुरी फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट राइटर का भी काम किया, कई डॉक्युमेंट्री फिल्में बना चुका हूँ और जल्द ही साहित्योदय के बैनर तले एक अच्छी फिल्म प्रोड्यूस करने की भी योजना है। देखें माँ जगदम्बा कब यह इच्छा पूर्ण करती है?

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