मुसाफिर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, सफर अल्फाज़ करता हूँ. कहानी, गीत गजलों से , सहर आगाज़ करता हूँ . नहीं मशहूर की चाहत, नहीं हसरत बड़ी दौलत - प्रियम हूँ मैं मुहब्बत का, दिलों पे राज़ करता हूँ.. ©पंकज प्रियम
मिटाकर रंग नफ़रत का, मुहब्बत रंग तुम भर लो।
आपकी कविता में जो बात कही गई है की नफ़रत मिटाकर मोहब्बत का रंग भरने की, वह बहुत खूबसूरत है। यह हमें सिखाती है कि अगर हम अपने मन से गिले-शिकवे और दुश्मनी निकाल दें, तो ज़िंदगी और भी रंगीन हो जाएगी।
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आपकी कविता में जो बात कही गई है की नफ़रत मिटाकर मोहब्बत का रंग भरने की, वह बहुत खूबसूरत है। यह हमें सिखाती है कि अगर हम अपने मन से गिले-शिकवे और दुश्मनी निकाल दें, तो ज़िंदगी और भी रंगीन हो जाएगी।
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