मुसाफिर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, सफर अल्फाज़ करता हूँ. कहानी, गीत गजलों से , सहर आगाज़ करता हूँ . नहीं मशहूर की चाहत, नहीं हसरत बड़ी दौलत - प्रियम हूँ मैं मुहब्बत का, दिलों पे राज़ करता हूँ.. ©पंकज प्रियम
आंदोलन के नाम पे क्या तुम सारा देश जला दोगे? नईं हुकूमत लाने को क्या, घर की नींव हिला दोगे? शासन से मतभेद अगर है, आसन से तुम बात करो- पर भीड़तंत्र के आगे क्या तुम लोकतंत्र झुठला दोगे? @पंकज प्रियम