Wednesday, October 30, 2024

1002.आओ ज्योति पर्व मनायें

आओ ज्योति पर्व

मन से ईर्ष्या द्वेष मिटाकर, 
नफरत का हर भेष मिटाकर।
प्रेम भाव सन्देश जगाकर, 
               सत्य सनातन दीप जलाएं
                आओ ज्योति पर्व मनाएं।

अंधकार पर प्रकाश की,
अज्ञानता पर ज्ञान आस की।
असत्य पर सत्य की,
              पुनः एक जीत दुहरायें,
              आओ ज्योति पर्व मनाएं।

भूखा -प्यासा हो अगर,
बेबस लाचार ललचाई नज़र। 
उम्मीद जगे तुमसे इस कदर, 
           कि दर्द में मरहम लेप लगायें,
               आओ ज्योति पर्व मनाएं।

अन्याय से ये समाज, 
प्रदूषण-दोहन से धरा आज ।
असह्य वेदना से रही कराह
        इस दर्द की हम दवा बन जायें,
              आओ ज्योति पर्व मनाएं।

भय आतंक -वितृष्णा बुझाकर
बुझती नजरो में आस जगाकर।
जाति-मज़हब का भेद मिटाकर
                अमन-चैन के फूल खिलायें,
                   आओ ज्योति पर्व मनाएं।

चहुँओर प्रीत की रीत जगाकर,
निर्मल निश्छल गीत बनाकर।
निर्झर का संगीत सजाकर,
               मन से मन का मीत बनायें
               आओ ज्योति पर्व मनाएं।
               आओ ज्योति पर्व मनाएं।
©पंकज प्रियम
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Thursday, October 24, 2024

1001. गैया माता (आरती)

ॐ जय गैया माता, मैया जय गैया माता।
दूध दही घृत माखन, घर-घर सुख दाता। ॐ जय-

तुम हो गौंवत्री पयस्विनी, तुम हो सुधा दाता।
 ओ मैया तुम हो सुधा दाता।
गौरी, धेनु, सुरभी, भद्रा हिंदमाता। ॐ जय गैया माता।

तुम हो कान्हा प्यारी, कपिला गिरिजा गीता। 
ओ मैया कपिला गिरिजा गीता।
तुम्हरे चरण जिस घर में, धन बैभव आता। ॐ जय गैया माता। 

गौतमी गोमती श्यामा, वैष्णवी मङ्गला गौमाता। ओ मैया वैष्णवी मङ्गला गौमाता।
नंदिनी भारती कृष्णा, रजता, मनसा तृप्ता। ॐ जय गैया माता

गोपेश्वरी कल्याणी, संध्या, ज्वाला, ललिता। 
ओ मैया सन्ध्या ज्वाला ललिता। 
पंचगव्य तुमसे ही, पूर्णा, भक्ति, त्वरिता। ॐ जय गैया माता। 

गोबर ऊर्जादायक, गोमूत्र अमरदाता। ओ मैया गोमूत्र अमरदाता। 
रोग प्रतिरोध क्षमता, अमृता कहलाता। ॐ जय गैया माता। 

गौसेवा फलदायी, सुख सन्तति करता। ओ मैया सुख सन्तति करता।
जिस घर में तुम रहती, क्लेश नहीं टिकता। ॐ जय गैया माता।

निशदिन आरती जो कोई, प्रेम सहित गाता। ओ मैया प्रेम सहित गाता।
कहत प्रियम सुन साधो, संकट मिट जाता। ॐ जय गैया माता। 

ॐ जय गैया माता, मैया जय गैया माता। 
दूध दही घृत माखन, घर-घर सुखदाता। ॐ जय गैया माता।
©®पंकज प्रियम

Sunday, October 20, 2024

1000. शिवायन

*दोहा*
जन रामायण पूर्ण कर, कृष्णायन का नाम।
मातुपिता आशीष से, किया शिवायन काम।।

भोलेशंकर की कथा, आदि अनादि अशेष। 
प्रियम समर्पित साधना, ग्रंथ शिवायन भेष।। 2

*चौपाई*
शिवशक्ति की महिमा न्यारी। ग्रंथ शिवायन गाथा प्यारी।।1
अद्भुत अनुपम रचना प्यारी। सत्य सनातन महिमा न्यारी।। 2
कण-कण भारत काव्य बना है। सबके मन का भाव सना है।।3
शिव का वर्णन सरल कहाँ है।
कण भर कोशिश हुई यहाँ है।।4
सत्य स्वरूप शिवायन सुंदर।  स्थापित हो यह घर के अंदर।।5
सबने पूरी की है निष्ठा।वेद ग्रन्थ सी मिले प्रतिष्ठा।। 6
हर दिन पूजन करे जो इसका। पूर्ण मनोरथ हो सब उसका।। 7 
ग्रन्थ शिवायन शिव को अर्पण। 
करे प्रियम निज भाव समर्पण।।8

*दोहा* 
शिव शक्ति के प्रेम का, अद्भुत हुआ बखान। 
सत्य शिवायन साधना, बने सुग्रन्थ महान।। 3

*चौपाई*
आदिशक्ति की प्रीत पुनीता। जनम-जनम में रही विनीता।। 9
बमभोले की है वो प्यारी। मातु भवानी महिमा न्यारी।। 10
शिवशक्ति का रूप मनोरम। पुरूष प्रकृति का है संगम।। 11
जग कल्याण के हेतु हरदम। त्याग समर्पण करते बमबम।।12
व्याघ्रछाल नरमुण्ड की माला, कण्ठ सुशोभित करते हाला।।13
जटाजूट से गङ्गा धारा। भाल सुशोभित चंदा न्यारा ।। 14
भस्म लपेटे तन में सारे। कानन-कुण्डल बिच्छू प्यारे।।15
डम-डम डमरू नाद भयंकर, ले त्रिशूल ताण्डव कर शंकर।। 16
दानव-मानव सबके प्यारे। बमभोले हैं जगत दुलारे।।17
भेदभाव से परे हैं शंकर। अभयदान देते अभ्यंकर।। 18
सहज सरल हैं बमबम बोले। बेल-धतूरे से मन डोले।। 19
पूजा जपतप ध्यान जरूरी। मनोकामना करते पूरी ।। 20

 *दोहा*
सत्य साधना से सृजित, पूर्ण मनोरम काम।
शिव को समर्पित ग्रन्थ ये, रचा शिवायन नाम।।4

*चौपाई*
पन्द्रह सर्गो में संपादित। दो खण्डों में है ये सर्जित।। 21
प्रथम खण्ड में गाथा सुंदर। द्वितीय खण्ड में युद्ध भयंकर।। 22
डेढ़ शतक कवियों ने मिलकर। किया सृजन यह ग्रन्थ मनोहर।।23
ग्रन्थ शिवायन काव्य महातम। सकल जगत में है यह उत्तम।।24
नितदिन जो भी पाठ करे वो। कभी काल से नहीं डरे वो ।। 25
काल अकाल निकट नहि आवै। मोक्ष प्राप्त कर शिव को पावे।। 26
कहे प्रियम यह ध्यान लगाकर। तृप्त हुआ मन ग्रन्थ को पाकर।। 27
शिवशक्ति की गाथा पावन। सत्य साधना ग्रंथ शिवायन।। 28

दोहा- 
भोलेशंकर की कृपा, मिला अम्ब वरदान।
ईश्वर के आशीष से, पूर्ण हुआ अवदान।।

  
पंकज प्रियम

999. शिव का मन

शिव का अंतर्मन
कैसे तुझे बताऊं गौरा, क्या कहता है मेरा मन।
सबने देखा तन के बाहर, देख न पाया अंतर्मन।

काल का देव बनाया हमको, महाकाल सब कहते।
जग संहारक नाम दिया और मुझसे सब हैं डरते।
जग कल्याण के हेतु हरदम, हमने खुशियां त्यागी।
भोग विलास से दूर रहे हम, ध्यान योग वैरागी।
चिताभस्म में धूनी रमाये, व्याघ्रचर्म है मेरा वसन।
सबने देखा मृत्यु ताण्डव, देख न पाया सन्तुलन।
सबने देखा तन के बाहर, देख न पाया अंतर्मन।

सागर के मंथन में अमृत, सब देवों ने पान किया।
देवता दानव सबने अपने, हिस्से धन का खान किया।
कालकूट का विष फैला तो, सबने मेरे नाम किया।
मेरे भक्तों ने ही मुझको, आज यहां बदनाम किया। 
गांजा फूँके भांग को पीते, मेरे नाम पे मद सेवन।
सबने हलाहल पीते देखा, देख न पाया मन क्रंदन।

कैसे तुझे बताऊं गौरा, क्या कहता है मेरा मन।
सबने देखा तन के बाहर, देख न पाया अंतर्मन।
पंकज प्रियम