Friday, June 8, 2018

358.इश्क़ समंदर

358.इश्क़ समंदर

कभी दिल को यूँ मचलने तो दो
हदों से आगे जरा गुजरने तो दो।

जिस्म की कोई चाह नहीं अपनी
जरा रूह तक मुझे उतरने तो दो।

बदन में खुशबू से महक जाऊंगा
अपने तन मन में बिखरने तो दो।

तेरी आंखों में ही मैं जाम पी लूंगा
जरा नजरों से नजर मिलने तो दो।

जाना जाना इतनी भी जल्दी क्या
कभी वक्त को जरा ठहरने तो दो।

खुद जल उठेगी मुहब्बत की शमां
जरा दिलों में चराग़ जलने तो दो।

निकल पड़ेगी इश्क़ की दरिया भी
नफरतों के पहाड़,पिघलने तो दो।

फ़साना मुहब्बत का बनेगा प्रियम
इश्क़ के समंदर को उमड़ने तो दो।
©पंकज प्रियम

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