Monday, June 15, 2026

1017. तीर्थ में साधन नहीं साधना जरूरी

तीर्थ में साधन नहीं साधना जरूरी

 चारधाम, अमरनाथ यात्रा, वैष्णोदेवी या फिर किसी भी तीर्थस्थल को अब लोगों ने पर्यटन का क्षेत्र बना दिया है जहाँ आस्था से अधिक लोग घूमने-फिरने के ख्याल से जाने लगे हैं। लोगों की बढ़ती भीड़ से कमाई का जरिया देखते हुए एविएशन कंपनी हर जगह हेलीकॉप्टर उड़ा रही है वहीं अधिकांश पहाड़ी क्षेत्रों में रोपवे बन रहा है। बेशक यह सुविधा तीर्थयात्रियों के लिए है लेकिन लोगों की भीड़ से सुरक्षा मानकों को धत्ता दिखाते हुए एविएशन कंपनियां पतंग ली तरह एक एक साथ दर्जनों हेलीकॉप्टर उड़ा रही है जिससे आये दिन हादसे हो रहे हैं। इन हेलीकॉप्टर में पूर्णतः प्रशिक्षित पायलट हैं या नहीं? यह भी जांच का विषय है। केदारनाथ समेत तमाम तीर्थस्थल इतने दुर्गम पहाड़ों पर हैं कि पहले लोग वहां साधना के लिए महीनों पैदल चढ़ाई कर जाते थे। तीर्थ में जाने का मतलब ही होता है कष्ट सहते हुए ईश्वर के दरबार मे भक्तिभाव से किसी तरह पहुँचना। मनुष्य का बस चले तो जिंदा ही स्वर्ग पहुँचने का रास्ता ढूंढने लगे। अन्य मजहबों में यह हो भी रहा है। जन्नत और 72 हूरों के ख्वाब में लोग खुद को बम से  उड़ा भी रहे हैं। मक्का-मदीना में भी आये दिन बेतहाशा भीड़ के कारण हादसे की ख़बर आती रहती है। यहूदी, सिक्ख, जैन के तीर्थस्थलों का भी यही हाल है। ईश्वर इन घटनाओं से हमें संकेत देने की कोशिश करता है कि आस्था के साथ खिलवाड़ मत करो, हमारे पास सिर्फ आये जिसके हृदय में सच्चा भाव हो, तीर्थस्थान सैर सपाटे की जगह नहीं है। यहाँ आना है तो प्रकृति के साथ उसके अनुसार पैदल चलते हुए भक्तिभाव से भजन वंदन करते आओ। ईश्वर के पास जाने के लिए हेलीकॉप्टर या गाड़ी का शॉर्टकट रास्ता मत अपनाओ। अगर प्रकृति विरुद्ध आओगे तो उसका दण्ड भी पाओगे। जब तपस्या करनी होती है तो साधन का मोह पीछे छोड़ना होता है। पहले के साधु संत इतने सक्षम थे कि कहीं भी मन की गति से चले जाते थे लेकिन जब तपस्या करनी होती थी तो दुर्गम रास्तो से पैदल चलकर पर्वत की चोटी पर जाकर साधना करते थे। भगवान श्रीराम जब  वनवास हेतु निकले तो उन्होंने रथ के साथ साथ तमाम राजसी वस्त्र और आभूषण त्याग कर पैदल ही चल पड़े। चाहते तो वह भी रथ और शिविर के साथ जाकर वनवास पूर्ण कर सकते थे। इसी तरह पाण्डवो ने भी पैदल चलकर अपनी तपस्या पूर्ण की। भगवान कृष्ण भी जब यदुवंशियों के लिए सुरक्षित स्थान की तलाश में निकले तो दाऊ बलराम के साथ पैदल ही निकले और समुद्र में द्वारिका नगरी बसाई।  

अगर आप ईश्वर के बताए रास्तो पर चलते हुए जाते हैं तब जाकर आप सही मायनों में साधना और तपस्या कर पाते हैं। इन स्थलों में सिर्फ वही जाते थे जिन्हें वास्तव तप, जप और साधना करनी होती थी लेकिन आज ये सभी स्थल पर्यटन केंद्र बन चुके हैँ जहाँ केवल भीड़ है और उनसे कमाई करने के लिए प्रकृति के साथ लगातार छेड़छाड़ की जा रही हैं। पहाड़ों को काटकर सुरंग, सड़क, होटल, हेलीपैड इत्यादि का निर्माण हो रहा है लिहाज़ा प्रकृति मनुष्यों से अपना बदला ले रही है। इन प्राकृतिक स्थलों पर पर्यटकों की बेतहाशा भीड़ से वहाँ हर तरह के प्रदूषण भी बढ़ रहे हैं जिसके कारण वहाँ का संतुलन बिगड़ने लगा है। इस परिवर्तन का विरोध प्रकृति हादसों के रूप में दिखाती है बावजूद इसके लोग समझते नहीं। इन दिनों वीकएंड पर लोग इन स्थलों में सैर सपाटे के लिए निकल पड़ते हैं। आज किसी भी तीर्थस्थल में शनिवार, रविवार या छुट्टियों के दिन पांव रखने की जगह नहीं मिलती जिससे हादसे भी होते हैं। 

पंकज प्रियम

1016. पत्थर की खोज

पत्थर की खोज

इन दिनों हर तरफ पत्थरों की ही चर्चा है। यूँ तो हमारे यहाँ फूलों की वर्षा का रिवाज़ है लेकिन जब ओले पड़ते हैं तो उसे आम बोलचाल की भाषा में पत्थरों की बारिश भी कहते हैं। हालाँकि यहाँ जिस पत्थर की बात चली है उससे हर कोई वाक़िफ़ है।आजकल कश्मीर से लेकर केरल तक पत्थरबाज शांतिपूर्ण ढंग से सड़कों पर पत्थरों की बारिश कर रहे हैं। पहले तो सिर्फ कश्मीर में ही भटके हुए युवा पत्थरों की बारिश करते थे लेकिन झटका तब लगा जब एक पत्थरबाज को ही सेना ने जीप के आगे बांधकर पत्थरों की बारिश से स्वागत कराया। इस तकनीक से सेना के जवान भटके हुए युवाओं की भीड़ से सकुशल बाहर निकल सके। एक बयान को लेकर  3 जून 2022 को कानपुर में पत्थरबाजों ने अपनी कला का जोरदार प्रदर्शन किया फिर 10 जून को तो एकसाथ 16 राज्यों में पत्थरों की बारिश हुई। कई पुलिसकर्मियों के सर फूटे, जानमाल का भारी नुकसान हुआ। हालाँकि इस शुक्रवार को पत्थर के साथ-साथ पेट्रोल बम और गोलियां भी चल गई। राँची में तो दो की मौत भी हो गयी। इसपर खूब बवाल भी मचा और किसी ने तो यहाँ तक कह दिया कि -"पत्थरों से जान जाती है क्या?" यही तो एक नया टेक्नीक डेवलप हुआ है कि पत्थर कोई हथियार तो है नहीं। संविधान और कानून की नजर में आप निहत्थे हैं और पुलिस इसके लिए गोली तो चलाएगी नहीं। किसी को पत्थर लग भी गया तो उसकी फोरेंसिक जाँच तो हो नहीं सकती! बुलेट का मिलान तो पिस्तौल से हो जाती है लेकिन पत्थर को फूटे सर से मिलान करना उतना आसान नहीं होगा। पत्थर मुफ्त और सुलभ हथियार के रूप में हर गली मोहल्ले में उपलब्ध है और चलाने के लिए भी कोई प्रशिक्षण की जरूरत नहीं। एक बच्चा भी पत्थर उठाकर किसी का सर फोड़ सकता है। बाद में उसे नाबालिक करार देकर कानूनी तौर पर बचा जा सकता है। इसी टेक्निकल खोज ने आज भारत को परेशान कर रखा है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी बाबा ने तो पत्थर के जवाब में बुलडोजर उतार दिया है। शुक्रवार को जो चलाएगा पत्थर, शनिवार को उसके घर चलेगा बुल्डोजर। लंबी और कि लचर कानूनी प्रकिया से आजिज आ चुकी आम जनता को यह बुलडोजर व्यवस्था बहुत भा रही है। कानूनी प्रक्रिया के तहत अगर कार्रवाई शुरू भी होती है तो सजा होते-होते दशकों बीत जाता है। सजा भी मामूली ऐसी की अपराधी को कोई फर्क पड़ता नहीं। 
आप भले पत्थर मार कर पुलिस का सर फोड़ दें, उनकी जान ले लें लेकिन पुलिस ने आत्मरक्षा में भी अगर हल्का बल प्रयोग कर लिया तो फिर पूरी दुनिया में विक्टिव कार्ड खेल सकते हैं कि पुलिस ने  निहत्थे मुल्जिमों पर गोली चला दी। 
यूँ तो पत्थर का प्रयोग पाषाण काल से ही प्रारम्भ हो गया था लेकिन तब मनुष्य अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ही इसका उपयोग करता था। पत्थरों के प्रयोग से आग की खोज हुई और मानव ने भोजन पका कर खाना सीखा। हालाँकि हमारे प्राचीन वेद और ग्रन्थों में बहुत पहले से मनुष्य काफी विकसित हो चुका था। चूंकि भारत में पत्थरों की कोई कमी नहीं है। विशाल पर्वत हो या पठारी चट्टान, नदी नाले या फिर मैदान, पत्थरों से पटा हुआ है अपना देश महान। यहाँ तो कंकर-कंकर में शंकर विद्यमान हैं। हम हैं कि हर पत्थर को बना देते हैं भगवान। वैसे भी हमारे यहाँ प्रचलित कहावत है -"मानो तो देव नहीं तो पत्थर". 
इसलिए सनातन धर्म मे पत्थर सदैव पूजनीय है। हमारे यहाँ तो पत्थरों को रत्न का दर्जा प्राप्त है जिसे हर कोई आभूषणों में इस्तेमाल करता है।उसका दुरूपयोग तो हम कर ही नहीं सकते। इतिहास को जानने समझने के लिए पत्थरो का बड़ा महत्व है तभी तो पहले के लोग शिलालेख की विधि अपनाते थे जो आज भी प्राचीन इतिहास का जीता जागता साक्षी है। पत्थरों से मूर्तियां और मन्दिर बनाये जाते थे तभी तो चाहकर भी विदेशी आक्रांता उनका अस्तित्व मिटा नहीं सके। हमारे आराध्य प्रभु राम ने तो सागर पर पत्थर का पुल बांध दिया था जो आज भी रामसेतु,  एडमब्रिज के नाम से जाना जाता है। भगवान श्री कृष्ण ने तो गोवर्द्धन पर्वत उठाकर न सिर्फ पूरे गोकुल की रक्षा की वल्कि देवराज इंद्र के घमंड को भी चकनाचूर कर दिया। यह सही है कि बगैर पत्थर के कंक्रीट के घर की कल्पना भी नहीं कि जा सकती है। घर हो या सड़क, पुल हो या बांध, बिना पत्थर के कुछ भी सम्भव नहीं है। इसलिए पत्थरों का बड़ा महत्व है लेकिन इसका उपयोग निर्माण में हो किसी के विनाश में नहीं।
  एक मुहावरा है -"ईंट का जवाब पत्थर" लेकिन इसका कतई मतलब नहीं है कि हम पत्थरबाजी करेंगे। दरअसल इसका सही अर्थ है मुँहतोड़ जवाब देना, पत्थर मारना नहीं। पत्थर को जड़ का स्वरूप भी माना गया है लेकिन  'करत-करत अभ्यास के जड़मति हॉट सुजान' भी प्रचलित है। पानी की लगातार गिरती धार और कुआं में रस्सी के घिसने से पत्थर कटने का भी उदाहरण है। यहाँ तो पत्थर से आसमान में भी सुराख कर देने का जज़्बा कायम है। दुष्यंत कुमार यूँ नहीं लिखते- 
"कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता?
जरा एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।

जो पत्थरबाजों के रहनुमा बनकर बोलते हैं कि पत्थर से किसी की जान जाती है क्या? तो उन्हें दुष्यंत कुमार के अंदाज़ में जवाब देना पड़ रहा कि

"कौन कहता है कि पत्थर से जान नहीं जाती?
जरा एक पत्थर तो तबियत से खाकर देखो!"

पत्थरों की मार उनसे पूछिये जिन बेगुनाहों/पुलिस जवानों के सर फटे हैं। राँची में ही पुलिस अधिकारी यूसी झा की पत्थर लगने से मौत हो गयी थी। ऐसे कितने ही जवान, इंसान पत्थरबाजों के पत्थर से घायल होते हैं, उनकी जान तक चली जाती है।  बचपन में मेरा भी सर फूटा है एक पत्थर से, हालाँकि किसी पत्थरबाजी का परिणाम नहीं बल्कि आम पेड़ के नीचे खड़े होने का दण्ड था। मेरे स्कूल का ही एक सहपाठी आम तोड़ रहा था जिसके हाथ से निकला पत्थर आम तो नहीं तोड़ पाया लेकिन मेरे सर को फोड़ डाला। एकबारगी तो लगा जैसे सर पर कोई चट्टान गिर पड़ा और मेरी आँखों के आगे अंधकार छा गया। वह लड़का तो भाग खड़ा हुआ। मेरे साथ मेरी दीदी थी वह मुझे पास के हैंडपंप तक ले गयी और जब सर पर पानी गिराया तो मानो खून की नदी बह निकली। हैंडपंप का पूरा प्लेटफार्म खून से लाल हो गया था। किसी तरह पास के हॉस्पिटल जाकर इलाज़ करवाया तो जान बची। वह एक अनजाने में लगा पत्थर था लेकिन जो पत्थरबाजी होती है उसमें तो इरादतन पूरे बल से पत्थर मारा जाता है अगर वह किसी के सर में लगे तो बचना मुश्किल है। आखिर किसने पत्थर चलाने की शुरुआत की है जो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत को चोटिल करता जा रहा है। क्यूँ कुछ लोग अपने छतों पर पत्थर जमा करके रखते हैं?और समय आने पर बेगुनाहों का सर फोड़ते हैं! जरूरत है इसपर ठोस कार्रवाई की। अपराधियों को कड़े दंड की ताकि कोई अन्य सपने में भी पत्थर चलाने की सोचे नहीं।
 

कवि पंकज प्रियम

Tuesday, March 3, 2026

1014. ट्रम्प जोगीरा

जोगीरा
आपस में ही लड़वाकर के, बेचे खुद हथियार।
युद्ध कराकर नोबेल चाहे,  सामन्ती सरदार।।
जोगीरा सा रा रा रा

पल-पल में ये बोली बदले, बदले अपना भाव।
खुद को तानाशाह समझता, देता टैरिफ ताव।।
जोगीरा सा रा रा रा

अच्छा है ये सनकी अबकी, खत्म करे आतंक।
आतंकी देशों को विषधर, मारे चुन-चुन डंक ।।
जोगीरा सा रा रा रा

सब आतंकी खत्म हुए तो, होगी दुनिया शांत।
शान्ति हेतु युद्ध जरूरी, जबतक हैं आक्रांत।।
जोगीरा सा रा रा रा

जब जब धर्म की हानि होती, होता सबका नाश।
अधर्म हमेशा हार ही जाता, होता स्वयं विनाश।।
जोगीरा सा रा रा रा

खामनई की मौत पे देखो, जश्न मने ईरान।
भारत मे सब छाती पीटे, कैसा है ईमान?
जोगीरा सा रा रा रा

औरों की ख़ातिर क्या कोई, घर में लगाता आग?
अगर शौक का लड़ने का तो, जाओ भारत त्याग।
जोगीरा सा रा रा रा
पंकज प्रियम 
विश्व कल्याण हेतु एकबार में सारे आंतकी नेता और आतंकी देशों का सफ़ाया आवश्यक है। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि धर्म और शांति की स्थापना हेतु निर्णायक युद्ध भी आवश्यक है। अगर दुर्योधन बातों से ही मान जाता तो प्रेम के आराध्य कृष्ण को महाभारत क्यूँ रचना पड़ता। कहते हैं न लातों के भूत बातों से नहीं मानते। 

Sunday, March 1, 2026

1013. जोगीरा

दुनियाभर में आग लगाकर,  बनता है सरदार।
आपस में लड़वाये सबको, बेचन को हथियार।
जोगीरा सा रा रा

टैरिफ-टैरिफ खेल रचाकर, करता सबको तंग।
पागल हाथी के जैसे यह, करता है हुड़दंग।।
जोगीरा सा रा रा


मोदी जी ने जाकर बोला, कर दो रेलम रेल। 
खींचातानी बहुत हो गयी, ख़त्म करो अब खेल।।
जोगीरा सा रा रा
पंकज प्रियम
 


Thursday, January 22, 2026

1012.शून्य से शब्द

शून्य से शब्द

चाहता हूँ लिखना
मैं भी बहुत कुछ
पर मन है अशांत उद्विग्न
कुछ जाना, कुछ भिन्न
शून्य में खोजता हूँ
कुछ शब्द कुछ बिम्ब
पर,जाने क्यूँ? 
सूझता नहीं कुछ.
खो गया कहाँ
न जाने अब
अपना ही प्रतिबिम्ब।
चाहता हूँ जोड़ना
रिश्तों को प्यार से
स्नेहिल रेशमी तार से
पर पता नहीं क्यूँ
उलझ जाते हैं
रेत से बिखर जाते हैं
चाहता हूँ खोलना
खुद को उलझे जाल से
अनकहे अनसुने
अनसुलझे जंजाल से
चाहता हूँ जितना 
मैं सुलझना
उतना ही और
उलझा पाता हूँ। 
खोजता हूँ 
स्वयं में स्वयं को
पर खुद को भी
कहाँ ढूंढ़ पाता हूँ।
शब्दों के सागर में
डूबकर भी कहाँ
कुछ लिख पाता हूँ
है कोई ?
जो मुझसे
मिला दे मुझे!
शून्य से शब्द
दिला दे मुझे!

©पंकज प्रियम
22.1.2026

1011.सिस्टम

सिस्टम

फाइलों के जंजाल में,
बाबू मकड़जाल में,
टेबुल सुस्ती चाल में,
        काम अड़ जाता है।

कागजी पड़ताल में,
बेजा के हड़ताल में,
नियम भेड़चाल में,
       सिस्टम सड़ जाता है।

यहाँ-वहाँ चक्कर मे,
घूमे घनचक्कर में,
अहम के टक्कर में,
       खुदे लड़ जाता है। 

सब बने बोली वीर,
हवा में चलावे तीर,
काम जो पड़े तो फिर
          पैर पड़ जाता है।

        ©पंकज प्रियम
22.01.2026

Sunday, September 7, 2025

1010. गीतायन

गीतायन परिकल्पना 
पंकज प्रियम 
वरदा वीणा वादिनी, तुझे नवाऊँ शीश।
रूके नहीं यह लेखनी, दे मुझको आशीष।।

मातु पिता आशीष से, पूरण हो मन-काम।
धर्म ध्वजा लहरा सकें, गीतायन के नाम।।

लीलाधर की लीला न्यारी। महाभारत कथा है प्यारी।
गीतायन है ग्रन्थ मनोरम। हर प्रसङ्ग लगता सर्वोत्तम।।
इसकी महिमा बड़ी निराली। भर दे सबकी झोली  खाली।।
गीता का यह ज्ञान सिखाये। सही गलत की राह दिखाये।।

धर्मस्थापन के लिए, रचा महा संग्राम।
कौरव पाण्डव पात्र थे, युद्ध लड़े घनश्याम।। 

धर्म-कर्म की अनुपम गाथा। भावक नवा रहे निज माथा।।
मन में यह विश्वास जगाए। अज्ञ-तिमिर को दूर भगाए।।
गूँजी गीता वाणी न्यारी । जिसे बखाने कृष्ण मुरारी॥
संकट में जब अर्जुन डोला । ज्ञान-कोश तब प्रभु ने खोला॥

कथा कही मुनि व्यास ने, जिसको लिखे गणेश।
है भारत के रूप में,    अद्भुत ग्रन्थ विशेष।।

धर्म हेतु रणभूमि सजाई । नीति-रीति सबकुछ समझाई ॥
कर्मयोग के पाठ पढ़ाये । भक्ति-ज्ञान के मार्ग बढाये.  
सुख-दुख सब की गति बतलाई. वृथासक्ति सब दूर भगाई। 
पावन गीता ग्रन्थ पुनीता । ज्ञान-मोक्ष की मार्ग प्रणीता।


गाथ रची संग्राम पर, हुआ अनोखा काम।
भारत के हर भाग से, जन-मन जुड़े तमाम।।

सरल सहज हिन्दी की भाषा। गढ़ी गयी नूतन परिभाषा।।
शब्द सुमन सुंदर अति पावन। भाव शिल्प लगते मनभावन।
सत्य शांति स्नेहिल रस धारा। है गीतायन गान हमारा।
कृष्ण कंठ वर्णित उपदेशा। मोक्ष मार्ग दर्शित सन्देशा।।


सफल मनोरथ हो रहा, मिला स्वजन-सहयोग।
"गीतायन" के रूप में, यह है नवल प्रयोग।

गीतायन यह दीप अनोखा। जिसने जनमन का विष सोखा ॥
सत्य धर्म सेवा हितकारी। जीवन यज्ञ सफल  सुखकारी।।
जीवन कर्म सुगम फलदाता. सकल मनोरथ भाग्यविधाता.
गीतायन यह ज्ञान अनूपा. मंगल गान अमित स्वर-रूपा. 

गीतायन के ज्ञान से, हुआ सुजाग्रत बोध। 
धर्म, योग, उपदेश से, मिटे सकल अवरोध॥

गीतायन गीत
युग-युग का सन्देश सुनाती, सम्मुख रख मानव जीवन।
सुन लो आज अनोखी गाथा, क्या कहती है गीतायन?

कुरुक्षेत्र का कण-कण साक्षी, युद्ध लड़े नर नारायण।
किसने कब-कब किसको मारा, हारा किससे किसका मन।
जीत गया जो रण में सबसे, फिर वह किससे हार गया।
कौन पराजित हुआ यहाँ पर, कौन किसे ललकार गया।

किसने क्या बलिदान दिया, कब किसने किया परायण.  
सुन लो आज अनोखी गाथा, क्या कहती है गीतायन?

सब कहते सत्ता का झगड़ा, भाई –भाई को मारा.
नारी का अपमान हुआ तो, मिट गया वंश कुरु सारा. 
पांचाली का हँसना वह भी,  मूढ़मगज दुर्योधन पर।
पुत्रमोह में अंधे राजा के शापित वृद्धापन पर।।

कौन यहाँ दोषी बन बैठा, किसको था मौन समर्थन
सुन लो आज अनोखी गाथा, क्या कहती है गीतायन।

धर्म अधर्म के मध्य लडाई, सत्य-असत्य की खाई. 
लोभ, मोह, दम्भ के मोहरे,  चौसर की सब चतुराई।
झूठ, कपट के, छल के आगे, हारी सब सच्चाई।
सभामध्य में चीरहरण पर, किसको थी लज्जा आई? 

भीष्म, द्रोण, कर्ण के मौन ने किया कलंकित आदर्शन?
सुन लो आज अनोखी गाथा, क्या कहती है गीतायन? 

गीतायन महाकाव्य अनुपम, जिसमें गीता-सार लिखा।
रणभूमि रण मध्य खड़े कृष्ण, विराट रूप संसार दिखा।
युग परिवर्तन की चौखट पर, कृष्ण रूप अवतार हुआ।
धर्म स्थापन हित अधर्म के पुतलों का संहार हुआ।।

अद्भुत कथा, महाभारत के सर्जक थे ऋषि द्वैपायन।
सुन लो आज अनोखी गाथा, क्या कहती है गीतायन।।

Tuesday, April 22, 2025

1009.आतंक का मज़हब

वो आये नाम पूछा
धर्म देखा और मार दी गोली
न ब्राह्मण देखा, न क्षत्रिय
न वैश्य और न ही शूद्र,
न अगड़ा, न पिछड़ा
न ऊंच न नीच
म सवर्ण न दलित
न जैन, न भीम 
न एसटी, एससी, ओबीसी
न यादव, न सिंह, न मिश्रा, न वर्मा
न जात देखी, न पात देखी
उनकी नजरों में तो बस हिन्दू थे
जिनके कपार पर ठोक दी गोली
छोड़ा तो सिर्फ उन्हें ही छोड़ा
जिन्होंने उनके कहने पर कलमा पढ़ा। 
आप लड़ते रहो जात-पात पर
उलझे रहो जातिगत जनगणना पर।
किसी को ब्राह्मणों पर मूतना है
किसी को भूरा बाल साफ करना है
किसी को एमवाई का साधन है गणित
कोई अगड़ा, पिछड़ा और दलित।
@पंकज प्रियम

Saturday, April 5, 2025

1008. जयचन्द



जयचन्द

तब भी कुछ जयचंद थे, अब भी हैं जयचंद।
जयचंदों ने ही किया, भारत का पट बंद।।

आक्रान्ता औकात क्या? कर पाते क्या वार?
साथ अगर देते नहीं,         देश छुपे गद्दार।।

सोने की चिड़िया कभी, आर्यावर्त अखण्ड।
खण्ड-खण्ड जिसने किया, देना होगा दण्ड।।

देश छुपे गद्दार को, अब लो सब पहचान।
जो हुआ नहीं देश का, क्या तेरा है जान।।

भारत माता कह रही,  कर लो अब संकल्प।
राष्ट्र बचा लो साथ मिल,  वक्त बचा है अल्प।।

पंकज प्रियम
05.04.2025

Friday, March 14, 2025

1007. रंग से परहेज़

रंगों से परहेज किसे है,         बोलो मेरे यार।
रंग बिना क्या धरती-अम्बर, रंग बिना संसार?
जोगीरा सा रा रा रा

रंगों से ही सजा हुआ है, यहाँ सकल संसार।
रंग बिना बेरंग है कितने, जीवन के दिन चार।
जोगीरा सा रा रा रा

झगड़ा-झंझट काहे करते, काहे करते रार?
मिलकर सारे रंग लगाओ, रंगों का त्यौहार।
जोगीरा सा रा रा रा

पङ्कज प्रियम

Wednesday, March 12, 2025

१००६.. रंग मुहब्बत

मिटाकर रंग नफ़रत का, मुहब्बत रंग तुम भर लो।

भुलाकर दुश्मनी दिल में, नई उमंग तुम भर लो।
नहीं शिकवे गिले कोई, न कोई द्वेष हो मन में-
मनाकर प्रेम की होली, सभी को संग तुम कर लो।।
©पंकज प्रियम

Friday, February 7, 2025

1005.ऋतुराज बसन्त

ऋतुराज बसन्त
धरती ने शृंगार किया हो चले सुगन्धित वन उपवन। 
बासंती जो चली हवा, तो, झूम उठा सारा तन-मन।

फूल खिले हैं बागों में और वसुधा ओढ़ी पीली चुनर।
कुहू-कुहू कोयलिया गाये,   गुंजारित कर रहे भ्रमर।
बौराये मकरंद की ख़ातिर, फिरते कलियों के आंगन।
बासंती जो चली हवा, तो, झूम उठा सारा तन-मन।

दुल्हन आज बनी है अवनी, अम्बर आज बना है कन्त।
प्रकृति ने बारात सजायी, आया जो ऋतुराज बसन्त।
फूलों ने जो खुशबू बिखेरी, महक उठा है आज चमन।
बासंती जो चली हवा, तो, झूम उठा सारा तन-मन।

नवकोंपल से शोभित तरुवर, हर्षित धरती और गगन।
होली सा खुमार चढ़ा है,         नाचते गाते सारे मगन
सुर्ख दहकते अंगारों से...    फूल पलाश भरे कानन।
बासंती जो चली हवा, तो, झूम उठा सारा तन-मन।

पंकज प्रियम कवि पंकज प्रियम

Tuesday, November 19, 2024

1004. पुरुष भी रोते हैं

कौन कहता है कि, मर्द रोते नहीं।
रोते तो हैं मगर आँसू बहाते नहीं।

पुरुषों का हृदय कोई पत्थर का नहीं होता
वहाँ भी धड़कती है एक जान किसी के लिये
एक पुरूष केवल पुरूष ही नहीं होता
होता है एक माँ का दुलारा, बाप का प्यारा
एक पत्नी का संसार और बच्चों का सहारा।
घर परिवार से बाहर दुनिया और समाज
माथे पर जिम्मेवारियों का कँटीला ताज
पुरूष भी रोता और सिसकता है
आंसुओं के बाढ़ को रोक लेता है
उसकी भी आँखे होती है नम
पी जाता है अंदर ही सारे गम।
बूढ़े माँ-बाप कहीं कमजोर न पड़ जाएं
बीवी-बच्चे कहीं उदास न हो जाएं।
इसलिए आँसुओ को दबाना पड़ता है।
चेहरे पर लाकर झूठी -सी मुस्कान
दिल में हर गम को छुपाना पड़ता है। 
पुरूष तब रोता है जब वह तन्हा होता है
जीवन के भँवर में जब खुद को खोता है।
अकेले ही सारी दुनिया का बोझ ढोता है।
हाँ पुरूष भी अंदर-अंदर खूब रोता है। 

पुरुष दिवस की बधाई।
कवि पंकज प्रियम

Saturday, November 2, 2024

1003. खोना पड़ता है

रातों की नींद, दिन का सुकून खोना पड़ता है।
घर-परिवार, सुख-चैन से दूर होना पड़ता है।
फ़क़त पत्थर फैंकने से फल नहीं मिल जाता-
दिनरात पसीना बहाकर बीज बोना पड़ता है।।

ये मत सोच कि धरा ने तुमको दिया क्या है?
जरा सोच, धरा के लिए तुमने  किया क्या है?
ये जननी तो सबको समान अवसर देती है-
ये तो अपना कर्म है कि उससे लिया क्या है?

माँ और मिट्टी कहाँ बच्चों से हिसाब लेती है?
जो कुछ भी है सबकुछ तो बेहिसाब देती है।
ये बच्चों की नादानी है जो फ़र्क मान बैठते-
माँ का आँचल को आनंदमयी रमणरेती है।

फ़टी चादर को क्या तलवार से सिया जाता है?
अपनों से क्या रिश्तों का हिसाब लिया जाता है?
मिलना न मिलना सब तय है उसके बहीखाते में-
फल तो वही मिलता है जो कर्म किया जाता है।।

प्रियमवाणी
©पङ्कज प्रियम

Wednesday, October 30, 2024

1002.आओ ज्योति पर्व मनायें

आओ ज्योति पर्व

मन से ईर्ष्या द्वेष मिटाकर, 
नफरत का हर भेष मिटाकर।
प्रेम भाव सन्देश जगाकर, 
               सत्य सनातन दीप जलाएं
                आओ ज्योति पर्व मनाएं।

अंधकार पर प्रकाश की,
अज्ञानता पर ज्ञान आस की।
असत्य पर सत्य की,
              पुनः एक जीत दुहरायें,
              आओ ज्योति पर्व मनाएं।

भूखा -प्यासा हो अगर,
बेबस लाचार ललचाई नज़र। 
उम्मीद जगे तुमसे इस कदर, 
           कि दर्द में मरहम लेप लगायें,
               आओ ज्योति पर्व मनाएं।

अन्याय से ये समाज, 
प्रदूषण-दोहन से धरा आज ।
असह्य वेदना से रही कराह
        इस दर्द की हम दवा बन जायें,
              आओ ज्योति पर्व मनाएं।

भय आतंक -वितृष्णा बुझाकर
बुझती नजरो में आस जगाकर।
जाति-मज़हब का भेद मिटाकर
                अमन-चैन के फूल खिलायें,
                   आओ ज्योति पर्व मनाएं।

चहुँओर प्रीत की रीत जगाकर,
निर्मल निश्छल गीत बनाकर।
निर्झर का संगीत सजाकर,
               मन से मन का मीत बनायें
               आओ ज्योति पर्व मनाएं।
               आओ ज्योति पर्व मनाएं।
©पंकज प्रियम
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Thursday, October 24, 2024

1001. गैया माता (आरती)

ॐ जय गैया माता, मैया जय गैया माता।
दूध दही घृत माखन, घर-घर सुख दाता। ॐ जय-

तुम हो गौंवत्री पयस्विनी, तुम हो सुधा दाता।
 ओ मैया तुम हो सुधा दाता।
गौरी, धेनु, सुरभी, भद्रा हिंदमाता। ॐ जय गैया माता।

तुम हो कान्हा प्यारी, कपिला गिरिजा गीता। 
ओ मैया कपिला गिरिजा गीता।
तुम्हरे चरण जिस घर में, धन बैभव आता। ॐ जय गैया माता। 

गौतमी गोमती श्यामा, वैष्णवी मङ्गला गौमाता। ओ मैया वैष्णवी मङ्गला गौमाता।
नंदिनी भारती कृष्णा, रजता, मनसा तृप्ता। ॐ जय गैया माता

गोपेश्वरी कल्याणी, संध्या, ज्वाला, ललिता। 
ओ मैया सन्ध्या ज्वाला ललिता। 
पंचगव्य तुमसे ही, पूर्णा, भक्ति, त्वरिता। ॐ जय गैया माता। 

गोबर ऊर्जादायक, गोमूत्र अमरदाता। ओ मैया गोमूत्र अमरदाता। 
रोग प्रतिरोध क्षमता, अमृता कहलाता। ॐ जय गैया माता। 

गौसेवा फलदायी, सुख सन्तति करता। ओ मैया सुख सन्तति करता।
जिस घर में तुम रहती, क्लेश नहीं टिकता। ॐ जय गैया माता।

निशदिन आरती जो कोई, प्रेम सहित गाता। ओ मैया प्रेम सहित गाता।
कहत प्रियम सुन साधो, संकट मिट जाता। ॐ जय गैया माता। 

ॐ जय गैया माता, मैया जय गैया माता। 
दूध दही घृत माखन, घर-घर सुखदाता। ॐ जय गैया माता।
©®पंकज प्रियम

Sunday, October 20, 2024

1000. शिवायन

*दोहा*
जन रामायण पूर्ण कर, कृष्णायन का नाम।
मातुपिता आशीष से, किया शिवायन काम।।

भोलेशंकर की कथा, आदि अनादि अशेष। 
प्रियम समर्पित साधना, ग्रंथ शिवायन भेष।। 2

*चौपाई*
शिवशक्ति की महिमा न्यारी। ग्रंथ शिवायन गाथा प्यारी।।1
अद्भुत अनुपम रचना प्यारी। सत्य सनातन महिमा न्यारी।। 2
कण-कण भारत काव्य बना है। सबके मन का भाव सना है।।3
शिव का वर्णन सरल कहाँ है।
कण भर कोशिश हुई यहाँ है।।4
सत्य स्वरूप शिवायन सुंदर।  स्थापित हो यह घर के अंदर।।5
सबने पूरी की है निष्ठा।वेद ग्रन्थ सी मिले प्रतिष्ठा।। 6
हर दिन पूजन करे जो इसका। पूर्ण मनोरथ हो सब उसका।। 7 
ग्रन्थ शिवायन शिव को अर्पण। 
करे प्रियम निज भाव समर्पण।।8

*दोहा* 
शिव शक्ति के प्रेम का, अद्भुत हुआ बखान। 
सत्य शिवायन साधना, बने सुग्रन्थ महान।। 3

*चौपाई*
आदिशक्ति की प्रीत पुनीता। जनम-जनम में रही विनीता।। 9
बमभोले की है वो प्यारी। मातु भवानी महिमा न्यारी।। 10
शिवशक्ति का रूप मनोरम। पुरूष प्रकृति का है संगम।। 11
जग कल्याण के हेतु हरदम। त्याग समर्पण करते बमबम।।12
व्याघ्रछाल नरमुण्ड की माला, कण्ठ सुशोभित करते हाला।।13
जटाजूट से गङ्गा धारा। भाल सुशोभित चंदा न्यारा ।। 14
भस्म लपेटे तन में सारे। कानन-कुण्डल बिच्छू प्यारे।।15
डम-डम डमरू नाद भयंकर, ले त्रिशूल ताण्डव कर शंकर।। 16
दानव-मानव सबके प्यारे। बमभोले हैं जगत दुलारे।।17
भेदभाव से परे हैं शंकर। अभयदान देते अभ्यंकर।। 18
सहज सरल हैं बमबम बोले। बेल-धतूरे से मन डोले।। 19
पूजा जपतप ध्यान जरूरी। मनोकामना करते पूरी ।। 20

 *दोहा*
सत्य साधना से सृजित, पूर्ण मनोरम काम।
शिव को समर्पित ग्रन्थ ये, रचा शिवायन नाम।।4

*चौपाई*
पन्द्रह सर्गो में संपादित। दो खण्डों में है ये सर्जित।। 21
प्रथम खण्ड में गाथा सुंदर। द्वितीय खण्ड में युद्ध भयंकर।। 22
डेढ़ शतक कवियों ने मिलकर। किया सृजन यह ग्रन्थ मनोहर।।23
ग्रन्थ शिवायन काव्य महातम। सकल जगत में है यह उत्तम।।24
नितदिन जो भी पाठ करे वो। कभी काल से नहीं डरे वो ।। 25
काल अकाल निकट नहि आवै। मोक्ष प्राप्त कर शिव को पावे।। 26
कहे प्रियम यह ध्यान लगाकर। तृप्त हुआ मन ग्रन्थ को पाकर।। 27
शिवशक्ति की गाथा पावन। सत्य साधना ग्रंथ शिवायन।। 28

दोहा- 
भोलेशंकर की कृपा, मिला अम्ब वरदान।
ईश्वर के आशीष से, पूर्ण हुआ अवदान।।

  
पंकज प्रियम

999. शिव का मन

शिव का अंतर्मन
कैसे तुझे बताऊं गौरा, क्या कहता है मेरा मन।
सबने देखा तन के बाहर, देख न पाया अंतर्मन।

काल का देव बनाया हमको, महाकाल सब कहते।
जग संहारक नाम दिया और मुझसे सब हैं डरते।
जग कल्याण के हेतु हरदम, हमने खुशियां त्यागी।
भोग विलास से दूर रहे हम, ध्यान योग वैरागी।
चिताभस्म में धूनी रमाये, व्याघ्रचर्म है मेरा वसन।
सबने देखा मृत्यु ताण्डव, देख न पाया सन्तुलन।
सबने देखा तन के बाहर, देख न पाया अंतर्मन।

सागर के मंथन में अमृत, सब देवों ने पान किया।
देवता दानव सबने अपने, हिस्से धन का खान किया।
कालकूट का विष फैला तो, सबने मेरे नाम किया।
मेरे भक्तों ने ही मुझको, आज यहां बदनाम किया। 
गांजा फूँके भांग को पीते, मेरे नाम पे मद सेवन।
सबने हलाहल पीते देखा, देख न पाया मन क्रंदन।

कैसे तुझे बताऊं गौरा, क्या कहता है मेरा मन।
सबने देखा तन के बाहर, देख न पाया अंतर्मन।
पंकज प्रियम

Monday, September 16, 2024

998. मंज़िल

मंजिले मिलती उन्हीं को, जो समय के संग हो। 
ज़िन्दगी का हो सफ़र या, मौत-जीवन जंग हो।

हार में क्या? जीत में क्या?
प्रेम में क्या? प्रीत में क्या?

997. ज़िन्दगी बहार लगती है

ज़िन्दगी
ज़िन्दगी यार बड़ी, खुशगवार लगती है,
इश्क़ का फूल खिलाती, बहार लगती है।
पास आकर के कभी मौत मुस्कराये तो-
ज़िन्दगी धूप में ठंडी,  बयार लगती है।।
पंकज प्रियम 
16.09.2024