Sunday, July 26, 2026

1026.अधिकार की लड़ाई, संस्कारों की कीमत पर नहीं

अधिकार की लड़ाई, संस्कारों की कीमत पर नहीं

पेपर लीक का विरोध पूरी तरह न्यायोचित था। युवाओं का आक्रोश स्वाभाविक था, क्योंकि जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के सपने और परिश्रम भी आहत होते हैं। सरकार ने कार्रवाई की, शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा दिया। अब आवश्यकता है कि इस षड्यंत्र में शामिल प्रत्येक दोषी को कानून के अनुसार कठोरतम दंड मिले, ताकि भविष्य में कोई भी विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ करने का साहस न कर सके।

किन्तु इस पूरे आंदोलन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों का जो आचरण सामने आया, वह अत्यंत दुखद और चिंताजनक है। विरोध के नाम पर अश्लील भाषा, अभद्र नारे और मर्यादा की सीमाओं का उल्लंघन किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की गरिमा को कलंकित करता है। अपनी बात रखने के लिए विचारों की शक्ति चाहिए, अभद्रता की नहीं। इस धरना प्रदर्शन में कुछ ऐसे फोटो और वीडियो सोशल मीडिया में चल रहे हैं मैं तो अपने पेज पर उन्हें पोस्ट या शेयर नहीं कर सकता। हमारी अपनी मर्यादा और ऐसे संस्कार है कि उन्हें मैं तो नही दोहरा सकता। 

 अगर जेन Z का है ये संस्कार है तो उनके माँ-बाप को शर्म से डूब मरना चाहिए जिन्होनें अपने बच्चों को तमीज़ नहीं सिखायी। पहले भी धरने-प्रदर्शन, अनशन आंदोलन होते रहे, यह लोकतंत्र का अधिकार है लेकिन प्रदर्शन के नाम पर भौंडापन, हक और अधिकार के नारों की जगह खुलेआम अश्लीलता, यह किसी भी विद्यार्थी के लक्षण नहीं हैं। उदण्ड लड़कों को तो फिर भी लोग समझ सकते हैं कि बाहर जाकर वे बिगड़ जाते हैं लेकिन जंतर मंतर में लड़कियों के द्वारा इस तरह अश्लीलता गम्भीर चिंता पैदा करती है। स्त्रियों का तो श्रृंगार लाज है जिसे इस प्रदर्शन में लड़कियों ने ताक पर रख दिया। अगर ये जेनZ है तो सभ्य समाज के लिए यह जेनरेशन कोढ़ साबित होगी। किसी भी समाज के लिए शब्दों की मर्यादा, संस्कारित आचरण और सकारात्मक विचार आवश्यक हैं।

भारत में धरना, प्रदर्शन और आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकार हैं। हमारे देश ने अनेक ऐतिहासिक आंदोलनों को देखा है, जहाँ असहमति भी शालीनता, संयम और नैतिक बल के साथ व्यक्त की गई। अधिकारों की लड़ाई यदि गरिमा और संस्कारों के साथ लड़ी जाए, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक और सकारात्मक होता है।

लोकतंत्र हमें विरोध का अधिकार देता है, परंतु संस्कृति हमें उसकी मर्यादा सिखाती है। हमारे देश ने गांधी, जयप्रकाश नारायण और अनेक जनांदोलनों की परंपरा देखी है, जहाँ संघर्ष था, पर संयम भी था; असहमति थी, पर शालीनता भी थी।

सबसे अधिक पीड़ा तब होती है, जब विद्यार्थी, जो राष्ट्र का भविष्य कहलाते हैं, स्वयं अपने आचरण से शिक्षा और संस्कार की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं। विशेष रूप से जब बेटियाँ भी सार्वजनिक मंचों पर अभद्र भाषा और अशोभनीय व्यवहार का प्रदर्शन करती दिखाई दें, तो यह केवल एक आंदोलन का विषय नहीं रह जाता, बल्कि समाज और परिवार दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाता है। नारी की सबसे बड़ी पहचान उसका आत्मसम्मान और उसका गरिमामय व्यक्तित्व है।

हाँ, यह भी उतना ही सत्य है कि कुछ व्यक्तियों के आचरण के आधार पर पूरी पीढ़ी या सभी विद्यार्थियों को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। आज भी असंख्य युवा ऐसे हैं, जो शालीनता, अनुशासन और तर्क के साथ अपनी बात रखते हैं और वही इस देश की वास्तविक शक्ति हैं।

माता-पिता अपने बच्चों को केवल डिग्री लेने के लिए नहीं, बल्कि एक बेहतर इंसान बनने के लिए घर से दूर भेजते हैं। शिक्षा यदि चरित्र निर्माण न कर सके, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। क्या दिल्ली की हवा की मानिंद वहाँ की शिक्षा भी प्रदूषित हो चुकी है?

विकसित भारत केवल आधुनिक इमारतों, तकनीक और अर्थव्यवस्था से नहीं बनेगा; वह संस्कारित नागरिकों, संयमित विचारों और मर्यादित आचरण से बनेगा।

अधिकारों की लड़ाई अवश्य लड़िए, लेकिन अपनी भाषा, अपने व्यवहार और अपने संस्कारों की कीमत पर नहीं। यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।

जय हिन्द!

 पंकज प्रियम
 #PaperLeak #EducationReform #StudentProtest #Democracy #RightToProtest #Respect #Discipline #IndianValues #Youth #ResponsibleCitizens #DevelopedIndia

Thursday, July 23, 2026

1025. आंदोलन

आंदोलन के नाम पे क्या तुम सारा देश जला दोगे?
नईं हुकूमत लाने को क्या, घर की नींव हिला दोगे?
शासन से मतभेद अगर है, आसन से तुम बात करो-
पर भीड़तंत्र के आगे क्या तुम लोकतंत्र झुठला दोगे?
@पंकज प्रियम

Monday, July 13, 2026

1023. कपूत



जिस बाप ने तुझको जनम दिया
और पाला पोसा बड़ा किया।
थाम के अँगुली चलना सिखाया
क़दमों पर अपने खड़ा किया।

आज विवश लाचार हुआ तो
हाय! कैसा तुमने कर्म किया?
हाथ उठाकर पिता पे तूने
अरे! कैसा ये अधर्म किया?

तनिक न कांपे हाथ तुम्हारे?
नहीं तुझे क्या शर्म लगी?
जिसने तुझको नाम दिया
संग उसके ही कुकर्म किया।

फ़टी क़मीज़ और फटे ही जूते
खुद ही पहने बाबा ने।
आदमी एकदिन बड़ा बनेगा
देखे सपने बाबा ने।

उन्हें पता क्या बड़ा तू होकर,
उनपे ही हाथ चलाएगा।
जिसने तुझको दुनिया दिखायी
उन्हें ही आँख दिखाएगा?
पंकज प्रियम 

Sunday, July 5, 2026

1022. अभिमान कैसा?

अभिमान कैसा?

ये दौलत ये शोहरत ये सम्मान कैसा?
ये जीवन उधारी तो' अभिमान कैसा?

जहाँ धड़कने भी उधारी किसी की
किसी को वहाँ दे अभयदान कैसा?

पलों से जियादा कहाँ ज़िन्दगी है?
तो पलपल पले ख़ूब अरमान कैसा?

पढ़ा और लिक्खा नहीं हर्फ़ से बढ़,
तो कहना तेरा खुद ही विद्वान कैसा?

उसी के' इशारों पे' चलती है' साँसे,
बँधी डोर पुतली का गुमान कैसा?

कहाँ कुछ लिये आये जाना कहाँ है
फ़क़त चार दिन का है' एहसान कैसा?

बिखर जाएगी देह माटी में मिलकर ,
परिंदों सा उड़ना है आसमान कैसा?

धरा ही रहेगा........ कमाया धरा में,
सफ़र ज़िन्दगी फिर ये सामान कैसा?

प्रियम जो कमाया, उसी का दिया सब
उसी का उसी को किया दान कैसा?
©पंकज प्रियम

Thursday, July 2, 2026

१०२१. व्यास का पुत्र व्यास नहीं बन सकता ?

 राजा का बेटा राजा, किसान का बेटा किसान, फ़िल्म स्टार के बच्चे स्टार, नेता का बेटा नेता, मुख्यमंत्री का बेटा मुख्यमंत्री, डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर, IAS/IPS के बच्चे भी उसी राह पर चलते हैं तो फिर एक कथावाचक का बेटा कथा क्यों नहीं कर सकता? इससे सबके पेट में दर्द क्यूँ होने लगा है? आरक्षण की सीढ़ी पीढ़ी-दर-पीढी चल सकती है लेकिन एक योग्य बालक अपनी पिता का काम नहीं सम्भाल सकता? मने हद ही कर देते हैं सब ! देवकीनंदन ठाकुर जी का बेटा देवांश किसी का हक तो मारने जा रहा है? कहीं नौकरी के लिए रोना/धोना करने नहीं जा रहा है? उसे व्यासपीठ की गद्दी विरासत में मिली है तो क्या दिक्कत है?

क्या वह अपने घर की व्यास परंपरा को आगे बढ़ाए या उन नौकरियों के लिए मत्था खपाये जहाँ अधिकांश प्रतिभा या तो आरक्षण के तले कुचली जाती है या फिर परीक्षा से पहले ही लाखों करोड़ों में क्वेश्चन लीक होने से हार जाती है।
अरे! बच्चे तो बचपन जो देखते आते हैं वही बनते हैं इसमें गलत क्या है? अगर यही कुछ और करता तो लोग कहते कि दुनिया को प्रवचन देने वाले अपने बच्चों में संस्कार नहीं भर पाये। कुछ समय पूर्व जब डॉ कुमार विश्वास जी ने कहा था कि बच्चों को रामायण की शिक्षा देनी चाहिए नहीं तो घर का नाम रामायण रखने से कुछ नहीं होता तो कई लोगों ने उनके बच्चों के रहन -सहन पर टीका टिप्पणी शुरू कर दी थी कि सबको रामकथा सुनाने वाले अपने बच्चों को संस्कार सिखाओ। धर्म हो, व्यवसाय हो या फिर कोई भी धंधा, पीढ़ियों से आगे बढ़ती जाती है। जितने भी व्यापारी हैं सबके बच्चे व्यापार की करते हैं, नौकरी वालों के बच्चे भी बहुत हद तक अपने अभिभावकों के ही रास्ते चलते हैं।
जाहिर सी बात है कि देवकीनंदन ठाकुर के बेटे देवांश में बचपन से ही कथा प्रवचन के संस्कार पड़े हैं और अगर वह भी अपने पिता की राह पर चल रहा है तो इसमें बुरा क्या है? उसके अंदर प्रतिभा होगी तो अपने पिता से बड़ा कथावाचक बन सकता है. अगर प्रतिभा न हो बड़े बड़े नेता और अभिनेताओं के बच्चों को फ़्लॉप होते देखा है। देवकीनंदन ठाकुर ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर जो आश्रम खड़ा किया है उसे उनका बेटा नहीं तो कौन सम्भालेगा? किसी पर भी ओछी टिप्पणी करने से पहले खुद उसके लायक बन तो जाओ? किसी पर आप एक उँगली उठाते हो तो तीन तुम्हारी ओर ही स्वयं उठती है।
राधे राधे

Tuesday, June 30, 2026

1020. राम मंदिर: आस्था और समर्पण

राम मन्दिर: आस्था और समर्पण
जो राम का नहीं, किसी काम का नहीं

अयोध्या राम मन्दिर में चढ़ावे की चोरी से किसी भी सच्चे सनातनी का मन आहत जरूर है लेकिन आस्था में कोई कमी नहीं हुई है। भला चोर उच्चकों के कारण भगवान और मन्दिरो पर आस्था कम हो सकती है क्या? घर मे नौकर चाकर चोरी कर लें तो क्या हमें अपने घर और मातापिता के प्रति आस्था घट जाएगी क्या? जिन्होंने कुकर्म किया उन्हें आज नहीं तो कल कर्मो की सजा अवश्य मिलेगी लेकिन इसके लिए हम ईश्वर पर श्रद्धा कम कर देंगे क्या? जिन्होंने ईश्वर की चरणों में दान दे दिया तो फिर उसके बारे सोचना क्या? संविधान और कानून के हाथ से लोग भले बच सकते हैं लेकिन ईश्वर की लाठी से कोई नहीं बच सकता। प्रभु राम तो त्याग और मर्यादा की मूरत हैं, रामायण हमें त्याग, समर्पण, विश्वास और मर्यादा का पाठ पढ़ाता है। जिस प्रभु ने जन कल्याण हेतु एक क्षण में राजपाट छोड़कर वनवास ले लिया उनसे बड़ा धैर्यवान और त्यागी कौन होगा? भरत ने मिला हुआ राज्य त्यागकर राम की खड़ाऊं सर पे रखकर उनके आने तक स्वयं तपस्वी जीवन जिया। फिर चाहे।माता सीता हौ, भ्राता लक्ष्मण-उर्मिला या फिर परम् भक्त हनुमान हों, हर एक पात्र से हमें जीवन का पाठ पढ़ने को मिलता है। जिस प्रभु राम ने सोने की लंका जीतने से पूर्व ही विभीषण को दान कर दिया उन्हें तुच्छ सोने चांदी रत्न आभूषण की जरूरत है क्या?

अयोध्या मंदिर के मामले में किसी बड़ी साज़िश से भी इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि वर्षों बाद मन्दिर स्थापना के बाद से ही यह उन लोगों की आँख में खटक रहा है जिन्होंने जानबूझकर मन्दिर बनने नहीं दिया। कोर्ट के फैसले के बाद विरोधी तत्वों ने खुलेआम कह दिया था कि वे इस निर्णय को नहीं मानते और जब हुकूमत आएगी तो राम मन्दिर ध्वस्त कर दिया जाएगा। राम मंदिर हर ऐसे व्यक्ति की आंख की किरकिरी बना हुआ है जो नहीं चाहता था कि प्रभु राम का इतना भव्य मंदिर बने। मंदिर को बदनाम करने का हर सम्भव प्रयास जारी है। जिन्होंने राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था वे भी आज राम भक्त होने का स्वांग रचा रहे हैं। हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि हजारों कारसेवकों के बलिदान के बाद यह मंदिर बन सका है। 
मंदिर आस्था का केंद्र होता जहाँ केवल श्रद्धा, समर्पण और तपस्या होनी चाहिए। उसे पर्यटन बनाएंगे तो लूट खसोट होगी ही। मंदिर में सिर्फ पुजारी और सच्चे सेवादार होने चाहिए जिनकी ईश्वर में अटूट श्रद्धा हो, उसे पाप का भय होता है, वह कभी चोरी नहीं कर सकता। प्राचीन काल के हजारों मंदिर इसके उदाहरण है। मंदिरों में सदियों लोग सोने, चांदी, रत्न आभूषण अपनी श्रद्धा के अनुसार चढ़ाते रहे लेकिन जबतक मन्दिर पुजारियों के भरोसे रहा कभी चोरी की घटना नहीं हुई, हमारे मन्दिर इतने समृद्ध थे कि विदेशी आक्रांताओं ने सबसे पहले मंदिरों को ही निशाना बनाया। राजा महाराजाओं ने कभी भी भी मंदिरों में अपने मैनेजर नियुक्त कर उससे धन उगाही नहीं की, मंदिरों के चढ़ावे से गुरुकुल चलते थे।

मन्दिर कोई होटल नहीं जहाँ व्यवस्था के लिए मैनेजर हों वहाँ तो सिर्फ सेवादार होने चाहिए। मंदिर की व्यवस्था हमेशा से वही पूरी ईमानदारी के साथ संभाल सकता है जिसको भगवान के प्रति पूर्ण आस्था है, भगवान की दिनरात पूजा अर्चना सेवा करनेवाला पुजारी मन्दिर से चोरी करने की बात कभी सपने में भी नहीं सोच सकता लेकिन जिनकी पूजापाठ में कोई रुचि ही नहीं वैसे लोगों को मन्दिर की व्यवस्था में जोड़ेंगे तो गड़बड़ होगी ही। अयोध्या मंदिर में चोरी तो बहुत बड़ी बात है और उन पापियों को दण्ड मिलेगा इसमे कोई दो राय नहीं है लेकिन इस घटना को लेकर जिस तरह से सनातन पर हमले शुरू हो गए हैं वह चिंतनीय है। आज वे लोग भी छाती पीटकर हल्ला मचा रहे हैं जिन्हें न तो सनातन में आस्था थी और न ही भगवान श्रीराम में। उन्होंने तो राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था। कुछ लोग इस घटना के बाद भगवान को झूठे बोलकर कह रहे हैं की भगवान होते तो चोरी होती क्या?
 अरे! भगवान ने न तो कभी किसी चढ़ावा चढ़ाने को कहा और न ही उसकी रक्षा हेतु व्यवस्थापक रखने को। यह तो सरकारो ने मंदिर के चढ़ावे से मुफ्त की रेवड़ियां और सब्सिडी बांटने के लिए मंदिर को बैंक बना रखा है। मन्दिरों में चढ़ावे की देखरेख हेतु आफ़सर, बैंक कर्मी, मैनेजर और नौकर चाकर भर रखें है जिनकी न तो ईश्वर में आस्था होती है और न पाप का भय। उन्हें तो बस नोटो का पहाड़ दिखता है। चोरी सिर्फ मंदिर में तो हुई नहीं, जहाँ भी पैसों की बरसात होगी वहाँ चोरी लोग करेंगे ही। यह सामान्य कलयुगी मानवीय प्रवृति है। एक साधु संत तपस्वी ही इन चीजों से ऊपर है, उसे तो सिर्फ भगवान के भजन से मतलब है। इसमे आप आज के समृद्ध कथावाचकों को न जोड़आप बैंक लूट देखिए, अधिकांश मामलों में बैंक कर्मी मील होते हैं। सरकारी योजनाओं का हाल देखिए, मंदिरों से अधिक डाका तो सरकारी योजनाओं में पड़ता है, क्या मंत्री, क्या अफसर सभी अपने हिस्से की चोरी करने में लगे रहते हैं और यह सालों से चल रहा है। यूहीं तो कोई नेता साल दो साल में अरबो-खरबो का मालिक नहीं बन जाता? राम मंदिर में चोरी की घटना से किसी भी सच्चे सनातनी की आस्था और श्रद्धा में कोई कमी नहीं आयी है क्योंकि चोरी-डकैती लूटपाट हर जगह हो रही है भला इससे एक भक्त और भगवान के बीच की आस्था कैसे टूटने लगी? जो भी दान चढ़ावा करते हैं वे यह सोचकर नही करते की उसका क्या उपयोग होगा? वह तो अपनी श्रद्धा से अपनी कमाई का एक छोटा सा हिस्सा भगवान की चरणों मे समर्पित कर देता है इस भावना के साथ कि- "तेरा तूझको अर्पण क्या लागे मेरा" जब सबकुछ ईश्वर का ही है तो उस दान, चढ़ावे का दिखावा और अफ़सोस कैसा? 
पंकज प्रियम 

#Ram #rammandir #hindu #sanatandharma

Wednesday, June 24, 2026

1019. आग

आग
हम तभी जागते हैं जब 
लगती है कहीं पे आग
हो जाता है बड़ा हादसा
तब खुलती हमारी आंख
कुछ दिन पड़ताल चलेगी
कुछ दिन हो हल्ला होगा
घोषणा मुआवजा सरकारी
फिर वही चढ़ जाएगी 
सबकी आंखों में पट्टी
अखबारों में विज्ञापन की
जिम्मेवारों में रिश्वत की
सब सोये रहेंगे तबतक
जब तलक फिर कोई
हो नहीं जाएगा हादसा।
नहीं किसी की जिम्मेवारी
नही देखता कोई अधिकारी।
उनका क्या? जिनकी
गोद हो गयी सूनी
जिनके घर का बुझा चिराग
लग गयी सपनो में ही आग।

पंकज प्रियम 
साहित्योदय 

Monday, June 22, 2026

1018. ठोक दी गोली सीने में

ठोक दी गोली सीने में

उसे कह रहा था भ्रष्टाचारी, ठोक दी गोली सीने में। 
बहुत बन रहा था क्रांतिकारी, ठोक दी गोली सीने में।।

गाँव-गली की बात उठाकर, अपने कद को बढ़ा रहा था,
सत्ता विरुद्ध आवाज़ लगाकर, सबको कैसे चढ़ा रहा था। 
न्यायालय की राह कठिन थी, सच का खुलना बाकी था,
लेकिन फ़ैसला दिनदहाड़े, किस्मत को मिलना बाकी था। 
दफ़्तर-दफ़्तर कागज देकर, सरकारी विश्वास किया,
झूठ के ऊँचे सिंहासनों से, उसने सीधा त्रास लिया।

दरबारों को यह कब भाया, सच बोले जो जीने में।
बहुत बन रहा था क्रांतिकारी, ठोक दी गोली सीने में।।

कहते हैं मुठभेड़ हुई थी, कहते हैं हथियार मिला। 
कितने प्रश्न बचे हुए हैं, किसको है अधिकार मिला?
सच की लाशें दबी पड़ी है, सत्ता के तहख़ानों में,
जाने कितनी सिसक रही है,, बंद पड़े खदानों में।
लोकतंत्र की चौखट रोई, कानून खड़ा शर्माया है,
प्रश्न उठे जनता के जब, उत्तर गोली बन आया है। 

इतिहास पूछेगा कल तुमसे, क्या था दोष नगीने में?
बहुत बन रहा था क्रांतिकारी, ठोक दी गोली सीने में।।

जिसने सच की बात कही, वो ही सबसे भारी था,
दरबारों के झूठ के आगे, आँखों में चिंगारी था।
जनता के दुख-दर्द लिखे जो, वो अख़बार पुराना था,
राजमहल को आँख दिखा दे, ऐसा कहाँ जमाना था। 
काग़ज़, जिरह गवाह, अदालत, सबको पीछे छोड़ दिया,
जिसने सच की राह चुनी थी, उसका ही मुँह मोड़ दिया।

सच की कीमत पूछ रहे हो, बिकती है अब पीने में।
बहुत बन रहा था क्रांतिकारी, ठोक दी गोली सीने में।।

कानूनों की लंबी राहें, सबको बहुत थकाती हैं।
लेकिन सत्ता की बंदूकें, फ़ैसले तुरंत सुनाती हैं।
कल जो नारे गूँज रहे थे, आज सन्नाटा बोल रहा। 
लोकतंत्र की चौपालों में, कौन किसे अब तोल रहा?
इतिहासों की आदत है ये, सब हिसाब रख लेते हैं।
तख़्त बदलते देर न लगती, बदल के मंज़र देते हैं।

सच की कीमत यही बतायी, सूखा खून पसीने में।
बहुत बन रहा था क्रांतिकारी, ठोक दी गोली सीने में।

माना उसकी गलती थी, जो सत्ता को ललकारा था,
पर सिस्टम के आगे वह भी, कदम कदम पे हारा था।
बन्दूक उठाकर उसने भी, बहुत बड़ा अपराध किया,
आत्मसमर्पण करके लेकिन, था खुद को साध लिया।
उसके बाद हुआ जो कुछ भी, उसको कैसे छुपाओगे?
जिन प्रश्नों को छोड़ गया वह, उत्तर कैसे बताओगे?

तेरी भाषा मे कह दूं तो, "था पगला खून कमीने में"
बहुत बन रहा था क्रांतिकारी, ठोक दी गोली सीने में।।
पंकज प्रियम 
22.06.2026

सत्य है हर अन्याय के विरुद्ध बन्दूक उठाना समाधान नहीं है,
लेकिन इसके लिए सिस्टम को भी खुद सुधरने की जरूरत है। 
#bihar #Encounter #BharatTiwaryEncounter #system #Corruption #bullet #CrimeNews

Monday, June 15, 2026

1017. तीर्थ में साधन नहीं साधना जरूरी

तीर्थ में साधन नहीं साधना जरूरी

 चारधाम, अमरनाथ यात्रा, वैष्णोदेवी या फिर किसी भी तीर्थस्थल को अब लोगों ने पर्यटन का क्षेत्र बना दिया है जहाँ आस्था से अधिक लोग घूमने-फिरने के ख्याल से जाने लगे हैं। लोगों की बढ़ती भीड़ से कमाई का जरिया देखते हुए एविएशन कंपनी हर जगह हेलीकॉप्टर उड़ा रही है वहीं अधिकांश पहाड़ी क्षेत्रों में रोपवे बन रहा है। बेशक यह सुविधा तीर्थयात्रियों के लिए है लेकिन लोगों की भीड़ से सुरक्षा मानकों को धत्ता दिखाते हुए एविएशन कंपनियां पतंग ली तरह एक एक साथ दर्जनों हेलीकॉप्टर उड़ा रही है जिससे आये दिन हादसे हो रहे हैं। इन हेलीकॉप्टर में पूर्णतः प्रशिक्षित पायलट हैं या नहीं? यह भी जांच का विषय है। केदारनाथ समेत तमाम तीर्थस्थल इतने दुर्गम पहाड़ों पर हैं कि पहले लोग वहां साधना के लिए महीनों पैदल चढ़ाई कर जाते थे। तीर्थ में जाने का मतलब ही होता है कष्ट सहते हुए ईश्वर के दरबार मे भक्तिभाव से किसी तरह पहुँचना। मनुष्य का बस चले तो जिंदा ही स्वर्ग पहुँचने का रास्ता ढूंढने लगे। अन्य मजहबों में यह हो भी रहा है। जन्नत और 72 हूरों के ख्वाब में लोग खुद को बम से  उड़ा भी रहे हैं। मक्का-मदीना में भी आये दिन बेतहाशा भीड़ के कारण हादसे की ख़बर आती रहती है। यहूदी, सिक्ख, जैन के तीर्थस्थलों का भी यही हाल है। ईश्वर इन घटनाओं से हमें संकेत देने की कोशिश करता है कि आस्था के साथ खिलवाड़ मत करो, हमारे पास सिर्फ आये जिसके हृदय में सच्चा भाव हो, तीर्थस्थान सैर सपाटे की जगह नहीं है। यहाँ आना है तो प्रकृति के साथ उसके अनुसार पैदल चलते हुए भक्तिभाव से भजन वंदन करते आओ। ईश्वर के पास जाने के लिए हेलीकॉप्टर या गाड़ी का शॉर्टकट रास्ता मत अपनाओ। अगर प्रकृति विरुद्ध आओगे तो उसका दण्ड भी पाओगे। जब तपस्या करनी होती है तो साधन का मोह पीछे छोड़ना होता है। पहले के साधु संत इतने सक्षम थे कि कहीं भी मन की गति से चले जाते थे लेकिन जब तपस्या करनी होती थी तो दुर्गम रास्तो से पैदल चलकर पर्वत की चोटी पर जाकर साधना करते थे। भगवान श्रीराम जब  वनवास हेतु निकले तो उन्होंने रथ के साथ साथ तमाम राजसी वस्त्र और आभूषण त्याग कर पैदल ही चल पड़े। चाहते तो वह भी रथ और शिविर के साथ जाकर वनवास पूर्ण कर सकते थे। इसी तरह पाण्डवो ने भी पैदल चलकर अपनी तपस्या पूर्ण की। भगवान कृष्ण भी जब यदुवंशियों के लिए सुरक्षित स्थान की तलाश में निकले तो दाऊ बलराम के साथ पैदल ही निकले और समुद्र में द्वारिका नगरी बसाई।  

अगर आप ईश्वर के बताए रास्तो पर चलते हुए जाते हैं तब जाकर आप सही मायनों में साधना और तपस्या कर पाते हैं। इन स्थलों में सिर्फ वही जाते थे जिन्हें वास्तव तप, जप और साधना करनी होती थी लेकिन आज ये सभी स्थल पर्यटन केंद्र बन चुके हैँ जहाँ केवल भीड़ है और उनसे कमाई करने के लिए प्रकृति के साथ लगातार छेड़छाड़ की जा रही हैं। पहाड़ों को काटकर सुरंग, सड़क, होटल, हेलीपैड इत्यादि का निर्माण हो रहा है लिहाज़ा प्रकृति मनुष्यों से अपना बदला ले रही है। इन प्राकृतिक स्थलों पर पर्यटकों की बेतहाशा भीड़ से वहाँ हर तरह के प्रदूषण भी बढ़ रहे हैं जिसके कारण वहाँ का संतुलन बिगड़ने लगा है। इस परिवर्तन का विरोध प्रकृति हादसों के रूप में दिखाती है बावजूद इसके लोग समझते नहीं। इन दिनों वीकएंड पर लोग इन स्थलों में सैर सपाटे के लिए निकल पड़ते हैं। आज किसी भी तीर्थस्थल में शनिवार, रविवार या छुट्टियों के दिन पांव रखने की जगह नहीं मिलती जिससे हादसे भी होते हैं। 

पंकज प्रियम

1016. पत्थर की खोज

पत्थर की खोज

इन दिनों हर तरफ पत्थरों की ही चर्चा है। यूँ तो हमारे यहाँ फूलों की वर्षा का रिवाज़ है लेकिन जब ओले पड़ते हैं तो उसे आम बोलचाल की भाषा में पत्थरों की बारिश भी कहते हैं। हालाँकि यहाँ जिस पत्थर की बात चली है उससे हर कोई वाक़िफ़ है।आजकल कश्मीर से लेकर केरल तक पत्थरबाज शांतिपूर्ण ढंग से सड़कों पर पत्थरों की बारिश कर रहे हैं। पहले तो सिर्फ कश्मीर में ही भटके हुए युवा पत्थरों की बारिश करते थे लेकिन झटका तब लगा जब एक पत्थरबाज को ही सेना ने जीप के आगे बांधकर पत्थरों की बारिश से स्वागत कराया। इस तकनीक से सेना के जवान भटके हुए युवाओं की भीड़ से सकुशल बाहर निकल सके। एक बयान को लेकर  3 जून 2022 को कानपुर में पत्थरबाजों ने अपनी कला का जोरदार प्रदर्शन किया फिर 10 जून को तो एकसाथ 16 राज्यों में पत्थरों की बारिश हुई। कई पुलिसकर्मियों के सर फूटे, जानमाल का भारी नुकसान हुआ। हालाँकि इस शुक्रवार को पत्थर के साथ-साथ पेट्रोल बम और गोलियां भी चल गई। राँची में तो दो की मौत भी हो गयी। इसपर खूब बवाल भी मचा और किसी ने तो यहाँ तक कह दिया कि -"पत्थरों से जान जाती है क्या?" यही तो एक नया टेक्नीक डेवलप हुआ है कि पत्थर कोई हथियार तो है नहीं। संविधान और कानून की नजर में आप निहत्थे हैं और पुलिस इसके लिए गोली तो चलाएगी नहीं। किसी को पत्थर लग भी गया तो उसकी फोरेंसिक जाँच तो हो नहीं सकती! बुलेट का मिलान तो पिस्तौल से हो जाती है लेकिन पत्थर को फूटे सर से मिलान करना उतना आसान नहीं होगा। पत्थर मुफ्त और सुलभ हथियार के रूप में हर गली मोहल्ले में उपलब्ध है और चलाने के लिए भी कोई प्रशिक्षण की जरूरत नहीं। एक बच्चा भी पत्थर उठाकर किसी का सर फोड़ सकता है। बाद में उसे नाबालिक करार देकर कानूनी तौर पर बचा जा सकता है। इसी टेक्निकल खोज ने आज भारत को परेशान कर रखा है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी बाबा ने तो पत्थर के जवाब में बुलडोजर उतार दिया है। शुक्रवार को जो चलाएगा पत्थर, शनिवार को उसके घर चलेगा बुल्डोजर। लंबी और कि लचर कानूनी प्रकिया से आजिज आ चुकी आम जनता को यह बुलडोजर व्यवस्था बहुत भा रही है। कानूनी प्रक्रिया के तहत अगर कार्रवाई शुरू भी होती है तो सजा होते-होते दशकों बीत जाता है। सजा भी मामूली ऐसी की अपराधी को कोई फर्क पड़ता नहीं। 
आप भले पत्थर मार कर पुलिस का सर फोड़ दें, उनकी जान ले लें लेकिन पुलिस ने आत्मरक्षा में भी अगर हल्का बल प्रयोग कर लिया तो फिर पूरी दुनिया में विक्टिव कार्ड खेल सकते हैं कि पुलिस ने  निहत्थे मुल्जिमों पर गोली चला दी। 
यूँ तो पत्थर का प्रयोग पाषाण काल से ही प्रारम्भ हो गया था लेकिन तब मनुष्य अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ही इसका उपयोग करता था। पत्थरों के प्रयोग से आग की खोज हुई और मानव ने भोजन पका कर खाना सीखा। हालाँकि हमारे प्राचीन वेद और ग्रन्थों में बहुत पहले से मनुष्य काफी विकसित हो चुका था। चूंकि भारत में पत्थरों की कोई कमी नहीं है। विशाल पर्वत हो या पठारी चट्टान, नदी नाले या फिर मैदान, पत्थरों से पटा हुआ है अपना देश महान। यहाँ तो कंकर-कंकर में शंकर विद्यमान हैं। हम हैं कि हर पत्थर को बना देते हैं भगवान। वैसे भी हमारे यहाँ प्रचलित कहावत है -"मानो तो देव नहीं तो पत्थर". 
इसलिए सनातन धर्म मे पत्थर सदैव पूजनीय है। हमारे यहाँ तो पत्थरों को रत्न का दर्जा प्राप्त है जिसे हर कोई आभूषणों में इस्तेमाल करता है।उसका दुरूपयोग तो हम कर ही नहीं सकते। इतिहास को जानने समझने के लिए पत्थरो का बड़ा महत्व है तभी तो पहले के लोग शिलालेख की विधि अपनाते थे जो आज भी प्राचीन इतिहास का जीता जागता साक्षी है। पत्थरों से मूर्तियां और मन्दिर बनाये जाते थे तभी तो चाहकर भी विदेशी आक्रांता उनका अस्तित्व मिटा नहीं सके। हमारे आराध्य प्रभु राम ने तो सागर पर पत्थर का पुल बांध दिया था जो आज भी रामसेतु,  एडमब्रिज के नाम से जाना जाता है। भगवान श्री कृष्ण ने तो गोवर्द्धन पर्वत उठाकर न सिर्फ पूरे गोकुल की रक्षा की वल्कि देवराज इंद्र के घमंड को भी चकनाचूर कर दिया। यह सही है कि बगैर पत्थर के कंक्रीट के घर की कल्पना भी नहीं कि जा सकती है। घर हो या सड़क, पुल हो या बांध, बिना पत्थर के कुछ भी सम्भव नहीं है। इसलिए पत्थरों का बड़ा महत्व है लेकिन इसका उपयोग निर्माण में हो किसी के विनाश में नहीं।
  एक मुहावरा है -"ईंट का जवाब पत्थर" लेकिन इसका कतई मतलब नहीं है कि हम पत्थरबाजी करेंगे। दरअसल इसका सही अर्थ है मुँहतोड़ जवाब देना, पत्थर मारना नहीं। पत्थर को जड़ का स्वरूप भी माना गया है लेकिन  'करत-करत अभ्यास के जड़मति हॉट सुजान' भी प्रचलित है। पानी की लगातार गिरती धार और कुआं में रस्सी के घिसने से पत्थर कटने का भी उदाहरण है। यहाँ तो पत्थर से आसमान में भी सुराख कर देने का जज़्बा कायम है। दुष्यंत कुमार यूँ नहीं लिखते- 
"कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता?
जरा एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।

जो पत्थरबाजों के रहनुमा बनकर बोलते हैं कि पत्थर से किसी की जान जाती है क्या? तो उन्हें दुष्यंत कुमार के अंदाज़ में जवाब देना पड़ रहा कि

"कौन कहता है कि पत्थर से जान नहीं जाती?
जरा एक पत्थर तो तबियत से खाकर देखो!"

पत्थरों की मार उनसे पूछिये जिन बेगुनाहों/पुलिस जवानों के सर फटे हैं। राँची में ही पुलिस अधिकारी यूसी झा की पत्थर लगने से मौत हो गयी थी। ऐसे कितने ही जवान, इंसान पत्थरबाजों के पत्थर से घायल होते हैं, उनकी जान तक चली जाती है।  बचपन में मेरा भी सर फूटा है एक पत्थर से, हालाँकि किसी पत्थरबाजी का परिणाम नहीं बल्कि आम पेड़ के नीचे खड़े होने का दण्ड था। मेरे स्कूल का ही एक सहपाठी आम तोड़ रहा था जिसके हाथ से निकला पत्थर आम तो नहीं तोड़ पाया लेकिन मेरे सर को फोड़ डाला। एकबारगी तो लगा जैसे सर पर कोई चट्टान गिर पड़ा और मेरी आँखों के आगे अंधकार छा गया। वह लड़का तो भाग खड़ा हुआ। मेरे साथ मेरी दीदी थी वह मुझे पास के हैंडपंप तक ले गयी और जब सर पर पानी गिराया तो मानो खून की नदी बह निकली। हैंडपंप का पूरा प्लेटफार्म खून से लाल हो गया था। किसी तरह पास के हॉस्पिटल जाकर इलाज़ करवाया तो जान बची। वह एक अनजाने में लगा पत्थर था लेकिन जो पत्थरबाजी होती है उसमें तो इरादतन पूरे बल से पत्थर मारा जाता है अगर वह किसी के सर में लगे तो बचना मुश्किल है। आखिर किसने पत्थर चलाने की शुरुआत की है जो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत को चोटिल करता जा रहा है। क्यूँ कुछ लोग अपने छतों पर पत्थर जमा करके रखते हैं?और समय आने पर बेगुनाहों का सर फोड़ते हैं! जरूरत है इसपर ठोस कार्रवाई की। अपराधियों को कड़े दंड की ताकि कोई अन्य सपने में भी पत्थर चलाने की सोचे नहीं।
 

कवि पंकज प्रियम

Tuesday, March 3, 2026

1014. ट्रम्प जोगीरा

जोगीरा
आपस में ही लड़वाकर के, बेचे खुद हथियार।
युद्ध कराकर नोबेल चाहे,  सामन्ती सरदार।।
जोगीरा सा रा रा रा

पल-पल में ये बोली बदले, बदले अपना भाव।
खुद को तानाशाह समझता, देता टैरिफ ताव।।
जोगीरा सा रा रा रा

अच्छा है ये सनकी अबकी, खत्म करे आतंक।
आतंकी देशों को विषधर, मारे चुन-चुन डंक ।।
जोगीरा सा रा रा रा

सब आतंकी खत्म हुए तो, होगी दुनिया शांत।
शान्ति हेतु युद्ध जरूरी, जबतक हैं आक्रांत।।
जोगीरा सा रा रा रा

जब जब धर्म की हानि होती, होता सबका नाश।
अधर्म हमेशा हार ही जाता, होता स्वयं विनाश।।
जोगीरा सा रा रा रा

खामनई की मौत पे देखो, जश्न मने ईरान।
भारत मे सब छाती पीटे, कैसा है ईमान?
जोगीरा सा रा रा रा

औरों की ख़ातिर क्या कोई, घर में लगाता आग?
अगर शौक का लड़ने का तो, जाओ भारत त्याग।
जोगीरा सा रा रा रा
पंकज प्रियम 
विश्व कल्याण हेतु एकबार में सारे आंतकी नेता और आतंकी देशों का सफ़ाया आवश्यक है। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि धर्म और शांति की स्थापना हेतु निर्णायक युद्ध भी आवश्यक है। अगर दुर्योधन बातों से ही मान जाता तो प्रेम के आराध्य कृष्ण को महाभारत क्यूँ रचना पड़ता। कहते हैं न लातों के भूत बातों से नहीं मानते। 

Sunday, March 1, 2026

1013. जोगीरा

दुनियाभर में आग लगाकर,  बनता है सरदार।
आपस में लड़वाये सबको, बेचन को हथियार।
जोगीरा सा रा रा

टैरिफ-टैरिफ खेल रचाकर, करता सबको तंग।
पागल हाथी के जैसे यह, करता है हुड़दंग।।
जोगीरा सा रा रा


मोदी जी ने जाकर बोला, कर दो रेलम रेल। 
खींचातानी बहुत हो गयी, ख़त्म करो अब खेल।।
जोगीरा सा रा रा
पंकज प्रियम
 


Thursday, January 22, 2026

1012.शून्य से शब्द

शून्य से शब्द

चाहता हूँ लिखना
मैं भी बहुत कुछ
पर मन है अशांत उद्विग्न
कुछ जाना, कुछ भिन्न
शून्य में खोजता हूँ
कुछ शब्द कुछ बिम्ब
पर,जाने क्यूँ? 
सूझता नहीं कुछ.
खो गया कहाँ
न जाने अब
अपना ही प्रतिबिम्ब।
चाहता हूँ जोड़ना
रिश्तों को प्यार से
स्नेहिल रेशमी तार से
पर पता नहीं क्यूँ
उलझ जाते हैं
रेत से बिखर जाते हैं
चाहता हूँ खोलना
खुद को उलझे जाल से
अनकहे अनसुने
अनसुलझे जंजाल से
चाहता हूँ जितना 
मैं सुलझना
उतना ही और
उलझा पाता हूँ। 
खोजता हूँ 
स्वयं में स्वयं को
पर खुद को भी
कहाँ ढूंढ़ पाता हूँ।
शब्दों के सागर में
डूबकर भी कहाँ
कुछ लिख पाता हूँ
है कोई ?
जो मुझसे
मिला दे मुझे!
शून्य से शब्द
दिला दे मुझे!

©पंकज प्रियम
22.1.2026

1011.सिस्टम

सिस्टम

फाइलों के जंजाल में,
बाबू मकड़जाल में,
टेबुल सुस्ती चाल में,
        काम अड़ जाता है।

कागजी पड़ताल में,
बेजा के हड़ताल में,
नियम भेड़चाल में,
       सिस्टम सड़ जाता है।

यहाँ-वहाँ चक्कर मे,
घूमे घनचक्कर में,
अहम के टक्कर में,
       खुदे लड़ जाता है। 

सब बने बोली वीर,
हवा में चलावे तीर,
काम जो पड़े तो फिर
          पैर पड़ जाता है।

        ©पंकज प्रियम
22.01.2026

Sunday, September 7, 2025

1010. गीतायन

गीतायन परिकल्पना 
पंकज प्रियम 
वरदा वीणा वादिनी, तुझे नवाऊँ शीश।
रूके नहीं यह लेखनी, दे मुझको आशीष।।

मातु पिता आशीष से, पूरण हो मन-काम।
धर्म ध्वजा लहरा सकें, गीतायन के नाम।।

लीलाधर की लीला न्यारी। महाभारत कथा है प्यारी।
गीतायन है ग्रन्थ मनोरम। हर प्रसङ्ग लगता सर्वोत्तम।।
इसकी महिमा बड़ी निराली। भर दे सबकी झोली  खाली।।
गीता का यह ज्ञान सिखाये। सही गलत की राह दिखाये।।

धर्मस्थापन के लिए, रचा महा संग्राम।
कौरव पाण्डव पात्र थे, युद्ध लड़े घनश्याम।। 

धर्म-कर्म की अनुपम गाथा। भावक नवा रहे निज माथा।।
मन में यह विश्वास जगाए। अज्ञ-तिमिर को दूर भगाए।।
गूँजी गीता वाणी न्यारी । जिसे बखाने कृष्ण मुरारी॥
संकट में जब अर्जुन डोला । ज्ञान-कोश तब प्रभु ने खोला॥

कथा कही मुनि व्यास ने, जिसको लिखे गणेश।
है भारत के रूप में,    अद्भुत ग्रन्थ विशेष।।

धर्म हेतु रणभूमि सजाई । नीति-रीति सबकुछ समझाई ॥
कर्मयोग के पाठ पढ़ाये । भक्ति-ज्ञान के मार्ग बढाये.  
सुख-दुख सब की गति बतलाई. वृथासक्ति सब दूर भगाई। 
पावन गीता ग्रन्थ पुनीता । ज्ञान-मोक्ष की मार्ग प्रणीता।


गाथ रची संग्राम पर, हुआ अनोखा काम।
भारत के हर भाग से, जन-मन जुड़े तमाम।।

सरल सहज हिन्दी की भाषा। गढ़ी गयी नूतन परिभाषा।।
शब्द सुमन सुंदर अति पावन। भाव शिल्प लगते मनभावन।
सत्य शांति स्नेहिल रस धारा। है गीतायन गान हमारा।
कृष्ण कंठ वर्णित उपदेशा। मोक्ष मार्ग दर्शित सन्देशा।।


सफल मनोरथ हो रहा, मिला स्वजन-सहयोग।
"गीतायन" के रूप में, यह है नवल प्रयोग।

गीतायन यह दीप अनोखा। जिसने जनमन का विष सोखा ॥
सत्य धर्म सेवा हितकारी। जीवन यज्ञ सफल  सुखकारी।।
जीवन कर्म सुगम फलदाता. सकल मनोरथ भाग्यविधाता.
गीतायन यह ज्ञान अनूपा. मंगल गान अमित स्वर-रूपा. 

गीतायन के ज्ञान से, हुआ सुजाग्रत बोध। 
धर्म, योग, उपदेश से, मिटे सकल अवरोध॥

गीतायन गीत
युग-युग का सन्देश सुनाती, सम्मुख रख मानव जीवन।
सुन लो आज अनोखी गाथा, क्या कहती है गीतायन?

कुरुक्षेत्र का कण-कण साक्षी, युद्ध लड़े नर नारायण।
किसने कब-कब किसको मारा, हारा किससे किसका मन।
जीत गया जो रण में सबसे, फिर वह किससे हार गया।
कौन पराजित हुआ यहाँ पर, कौन किसे ललकार गया।

किसने क्या बलिदान दिया, कब किसने किया परायण.  
सुन लो आज अनोखी गाथा, क्या कहती है गीतायन?

सब कहते सत्ता का झगड़ा, भाई –भाई को मारा.
नारी का अपमान हुआ तो, मिट गया वंश कुरु सारा. 
पांचाली का हँसना वह भी,  मूढ़मगज दुर्योधन पर।
पुत्रमोह में अंधे राजा के शापित वृद्धापन पर।।

कौन यहाँ दोषी बन बैठा, किसको था मौन समर्थन
सुन लो आज अनोखी गाथा, क्या कहती है गीतायन।

धर्म अधर्म के मध्य लडाई, सत्य-असत्य की खाई. 
लोभ, मोह, दम्भ के मोहरे,  चौसर की सब चतुराई।
झूठ, कपट के, छल के आगे, हारी सब सच्चाई।
सभामध्य में चीरहरण पर, किसको थी लज्जा आई? 

भीष्म, द्रोण, कर्ण के मौन ने किया कलंकित आदर्शन?
सुन लो आज अनोखी गाथा, क्या कहती है गीतायन? 

गीतायन महाकाव्य अनुपम, जिसमें गीता-सार लिखा।
रणभूमि रण मध्य खड़े कृष्ण, विराट रूप संसार दिखा।
युग परिवर्तन की चौखट पर, कृष्ण रूप अवतार हुआ।
धर्म स्थापन हित अधर्म के पुतलों का संहार हुआ।।

अद्भुत कथा, महाभारत के सर्जक थे ऋषि द्वैपायन।
सुन लो आज अनोखी गाथा, क्या कहती है गीतायन।।

Tuesday, April 22, 2025

1009.आतंक का मज़हब

वो आये नाम पूछा
धर्म देखा और मार दी गोली
न ब्राह्मण देखा, न क्षत्रिय
न वैश्य और न ही शूद्र,
न अगड़ा, न पिछड़ा
न ऊंच न नीच
म सवर्ण न दलित
न जैन, न भीम 
न एसटी, एससी, ओबीसी
न यादव, न सिंह, न मिश्रा, न वर्मा
न जात देखी, न पात देखी
उनकी नजरों में तो बस हिन्दू थे
जिनके कपार पर ठोक दी गोली
छोड़ा तो सिर्फ उन्हें ही छोड़ा
जिन्होंने उनके कहने पर कलमा पढ़ा। 
आप लड़ते रहो जात-पात पर
उलझे रहो जातिगत जनगणना पर।
किसी को ब्राह्मणों पर मूतना है
किसी को भूरा बाल साफ करना है
किसी को एमवाई का साधन है गणित
कोई अगड़ा, पिछड़ा और दलित।
@पंकज प्रियम

Saturday, April 5, 2025

1008. जयचन्द



जयचन्द

तब भी कुछ जयचंद थे, अब भी हैं जयचंद।
जयचंदों ने ही किया, भारत का पट बंद।।

आक्रान्ता औकात क्या? कर पाते क्या वार?
साथ अगर देते नहीं,         देश छुपे गद्दार।।

सोने की चिड़िया कभी, आर्यावर्त अखण्ड।
खण्ड-खण्ड जिसने किया, देना होगा दण्ड।।

देश छुपे गद्दार को, अब लो सब पहचान।
जो हुआ नहीं देश का, क्या तेरा है जान।।

भारत माता कह रही,  कर लो अब संकल्प।
राष्ट्र बचा लो साथ मिल,  वक्त बचा है अल्प।।

पंकज प्रियम
05.04.2025

Friday, March 14, 2025

1007. रंग से परहेज़

रंगों से परहेज किसे है,         बोलो मेरे यार।
रंग बिना क्या धरती-अम्बर, रंग बिना संसार?
जोगीरा सा रा रा रा

रंगों से ही सजा हुआ है, यहाँ सकल संसार।
रंग बिना बेरंग है कितने, जीवन के दिन चार।
जोगीरा सा रा रा रा

झगड़ा-झंझट काहे करते, काहे करते रार?
मिलकर सारे रंग लगाओ, रंगों का त्यौहार।
जोगीरा सा रा रा रा

पङ्कज प्रियम

Wednesday, March 12, 2025

१००६.. रंग मुहब्बत

मिटाकर रंग नफ़रत का, मुहब्बत रंग तुम भर लो।

भुलाकर दुश्मनी दिल में, नई उमंग तुम भर लो।
नहीं शिकवे गिले कोई, न कोई द्वेष हो मन में-
मनाकर प्रेम की होली, सभी को संग तुम कर लो।।
©पंकज प्रियम

Friday, February 7, 2025

1005.ऋतुराज बसन्त

ऋतुराज बसन्त
धरती ने शृंगार किया हो चले सुगन्धित वन उपवन। 
बासंती जो चली हवा, तो, झूम उठा सारा तन-मन।

फूल खिले हैं बागों में और वसुधा ओढ़ी पीली चुनर।
कुहू-कुहू कोयलिया गाये,   गुंजारित कर रहे भ्रमर।
बौराये मकरंद की ख़ातिर, फिरते कलियों के आंगन।
बासंती जो चली हवा, तो, झूम उठा सारा तन-मन।

दुल्हन आज बनी है अवनी, अम्बर आज बना है कन्त।
प्रकृति ने बारात सजायी, आया जो ऋतुराज बसन्त।
फूलों ने जो खुशबू बिखेरी, महक उठा है आज चमन।
बासंती जो चली हवा, तो, झूम उठा सारा तन-मन।

नवकोंपल से शोभित तरुवर, हर्षित धरती और गगन।
होली सा खुमार चढ़ा है,         नाचते गाते सारे मगन
सुर्ख दहकते अंगारों से...    फूल पलाश भरे कानन।
बासंती जो चली हवा, तो, झूम उठा सारा तन-मन।

पंकज प्रियम कवि पंकज प्रियम