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Wednesday, April 13, 2022

844. पर्यावरण

प्रकृति और मानव

प्रकृति क्रन्दन आज सुनो, सुनो करुण चीत्कार।
मूढ़मति अरे मानवों,       कर गलती स्वीकार।।

मानव कर्मों की सज़ा , सबको मिलती आज।
दूषित है पर्यावरण,           मानव ऐसे काज।।

रोक कदम अब आज तुम, बहुत किया संहार।
पलपल प्रकृति देख अभी,   करती है हुंकार।।

कदम मिलाकर प्रकृति के,  चलो हमेशा संग।
नहीं करो प्रदूषण तुम,    भर लो जीवन रंग।।

देख जरा कैसे धरा,       पल-पल रही कराह।
जख़्म दिया तूने उसे,    ख़त्म हुई सब  चाह।।

जीवन तुझको दे धरा,      भुगत रही अंजाम।
मत कर उसका चीर हरण, होगा फिर संग्राम।।

दोहन करते जो रहे,        जल-जंगल आधार।
ख़त्म समझ संसार फिर, सुन कुदरत ललकार।।

जंगल को उजाड़ अगर, बसे शहर कंक्रीट।
छत तो होता पर मगर, हिले नींव की ईंट।।

©पंकज प्रियम
विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। आइये सब मिलकर इसे बचाएं।

Monday, July 13, 2020

855. सावन

कोरोना काल और सावन

कोरोना के काल में,      सावन है बेकार।
मिलना जुलना बन्द है, सब बैठे लाचार।।

मन्दिर के पट बंद हैं,    बंद सभी बाज़ार।
कैसे पूजा अर्चना,     कैसे हो जयकार??

बम भोले जो मौन हैं,   गौरा बन्द कपाट।
भक्त पुजारी देवता,     पीस रहे दो पाट।।

चूड़ी काजल बिंदिया, नौलक्खा क्या हार?
कंगन कुमकुम कंचुकी, सोलह क्या सिंगार?

सावन बरखा दामिनी,  मारे हिया कटार।
कोरोना में है फँसा,   साजन तो उसपार।।

ऑनलाइन पूजन करो, यही समय दरकार।
घर को बनाओ देवघर,  घर में ही जल ढार।।
©पंकज प्रियम

Monday, April 6, 2020

809. उम्मीद


दोहे- उम्मीद/आस/भरोसा

मन मे रख उम्मीद तू, जीने की रख आस।
कोरोना का खौफ़ भी, आए न कभी पास।।

रखते जो उम्मीद हैं, जीवन में सब  रंग।
मन से जो हारा यहाँ, कब जीता वह जंग।।

मन को जीता जो यहाँ, होती उसकी जीत।
हार गया जो आप से, हारे जीवन प्रीत।।

डोर भरोसे से जुड़ी, जीवन की सब रीत।।
टूट गयी यह डोर जो, खो जाये मनमीत।।

जो घबराते कष्ट से, छोड़े जो उम्मीद।
समझो हारी ज़िन्दगी, उड़ जाती है नींद।।

©पंकज

Wednesday, March 25, 2020

797. सर्वश्रेष्ठ इंसान!!

सर्वश्रेष्ठ इंसान!!

जान बचाने आपकी, चिंतित है सरकार।
इससे दुर्दिन और क्या, मानव है बेकार।।

घर में रखने को अभी, लाठी चलती यार।
खुद की चिंता गर नहीं, जीना तेरा बेकार।।

जनता कर्फ़्यू की पड़ी, क्यूँ अभी दरकार?
इसपर भी चेते नहीं, क्या करे सरकार?

अपनी चिंता मत करो, फ़र्क नहीं कुछ यार।
औरों का खतरा बनें, है किसको अधिकार।।

जान बचाने के लिये, देना पड़ा फरमान।
कैसे खुद को बोलते, सर्वश्रेष्ठ इंसान।

©पंकज प्रियम

जान है तभी तो जहान है।
वरना ठिकाना श्मशान है।।
घर में रहें सुरक्षित रहें।

Sunday, March 15, 2020

791. कोरोना


कोरोना के खौफ़ से, देख गिरा बाज़ार।
सारा शेयर गिर गया, डूबा लाख हजार।।

करोना वायरस कहे, सुनता वह कुछ और।
कोरो ना बारिश समझ, बरसाता घनघोर।।

साज़िश किसने की यहाँ, जल्दी उसको खोज।
कोरो ना बारिश सुने,........ बरसे बदरा रोज।।

चैत माह में देख लो, घटाटोप घनघोर।
बरसे बरखा बावरी, बदरा बहके भोर।।

सुन-सुन के सन्देश ये, पकते सबके कान।
कैसे बचना है अभी, दे दो इसपर ध्यान।।

बचना गर जो कोरोना, करना एक उपाय।
दूर रहो तुम भीड़ से, कोई फटक न पाय।।

©पंकज प्रियम

Friday, March 6, 2020

790. कोरोना होली

कोरोना vs होली

कान्हा भर-भर मारना, पिचकारी में रंग।
जी भर के तू खेलना, होली मेरे संग।।

सुन राधा मैं क्या करूँ, कैसे खेलूँ रंग।
कोरोना के खौफ़ से, रंग हुआ बदरंग।।

रंग हुआ बदरंग जो, पड़ता जैसे भंग।
मिलने से भी डर लगे, कैसे खेलूँ संग।।

फूलों के तू रंग से, भरना मेरे अंग।
रंग-उमंग-तरंग से, खेलो होली संग।।

टेसू फूल पलाश से, बनते कितने रंग।
खौफ़ नहीं कुछ रोग का, कर चाहे हुड़दंग।।

©पंकज प्रियम

Thursday, December 12, 2019

747.जीवन में खुश रहने के 7 मंत्र

जीवन मंत्र

स्वर्ग यहीं है और नर्क भी यहीं है , सुख और दुःख सबकुछ आपके कर्मों पर आधारित है। जिसके लिए हमारे वेदों में बहुत सरल मार्ग भी दिखाये गये हैं। गरुड़ पुराण में जीवन के हर क्षण का बहुत बारीकी से विवेचन किया गया है। विज्ञान के सारे नियम और प्रकृति को बहुत पहले इस ग्रन्थ में बहुत विस्तृत से बताया गया है। इसके 19000 श्लोकों मैं जीवन का सम्पूर्ण सत्य और दर्शन प्राप्त होता है। दशगात्र कर्म में सिर्फ 16 अध्याय का ही पाठ किया जाता है। उसके सिर्फ 7 सूत्र को ही अगर जीवन में उतार लें तो कष्ट नहीं होगा। उसके इन 7 सूत्रों को सरल दोहे के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है।

1. धैर्य
धीरज ही सबसे बड़ा, है जीवन का मीत।
रखता मन में धैर्य जो, मिलती उसको जीत।।

3. इंद्रियों पे काबू
रखना वश में इन्द्रियाँ, जाना जिसने ज्ञान।
लगता उसको है यहाँ, हर मुश्किल आसान।।

2. क्रोध पे नियंत्रण
जीवन में बढ़ना अगर, मत करना तुम क्रोध।
गुस्से में जलकर सभी, बनते खुद अवरोध।।

4. पवित्रता
लक्ष्मी मिलती है उसे, मन जिसका हो पवित्र।
मन पावन महके सदा, सुंदर स्वच्छ चरित्र।।

5.दया
करता सबपर जो दया, खुश रहते भगवान।
मिलती खुशियां सब उसे, कहलाता इंसान।।

6. मीठी वाणी
मीठी वाणी बोलिये, खुल जाता सब द्वार।
बोली से ही प्यार है, बोली से तकरार।।

7. द्वेष का त्याग
खुद का बैरी है वही, दिल में जिसका द्वेष।
तन को मिलता कष्ट है, मन को होता क्लेश।।

©पंकज प्रियम
12.12. 2019


Monday, December 9, 2019

737. चमक दमक

चमक-दमक
दोहे

चमक-दमक की चाँदनी, फिर अंधेरी रात।
तुम चमक में मत खोना, मानो मेरी बात।।

चमक-दमक में मत उलझ, यह तो माया जाल।
जीवन सादा है भला, बाकी सब जंजाल।।

चमक-दमक में जो फँसा, डूबा वह मझधार।
नाव भँवर में जब फँसी, क्या करता पतवार।।

चमक-दमक आवोहवा, शहर की मायाजाल।
खुद में ही उलझे यहाँ, फँसकर उसके जाल।।

चमक-दमक को छोड़ के, आ जाओ तुम गाँव।
निर्मल जल स्वच्छ हवा, शीतल शीतल छाँव।।

©पंकज प्रियम

Saturday, September 14, 2019

652. हिंदी

हिंदी
भाषा निज सम्मान है, भाषा से पहचान।
भाषा निहित समाज है, भाषा से अरमान।।

मातृभाषा से अपनी, करते सब हैं प्यार।
मातृभाषा बोल बड़ी, है अपना हथियार।।

हिंदी भाषा हिन्द की, अंग्रेजी को छोड़।
दिल बसा ले स्वदेशी, इससे नाता जोड़।।

हिंदी भाव सहज बड़ी, मीठे इसके बोल।
भाषा सब हिंदी खड़ी, कानों में रस घोल।।

©पंकज प्रियम

बिना शक्कर के मीठी खीर लगती हो,
सब भाषाओं में सबसे वीर लगती हो।
अपने ही घर में लाचार हुई जो हिंदी-
तुम पाक अधिकृत कश्मीर लगती हो।।
©पंकज प्रियम

Thursday, July 4, 2019

595.रथ यात्रा


                                 रथयात्रा
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया, घर से निकले नाथ।
रथ चढ़े मौसीबाड़ी, भाई- बहन के साथ।।

लकड़ी का है रथ बना, डोरी भी है साथ।
सुंदर रथ सब खींचते, चढ़े जगत के नाथ।।

निकली बड़ी रथयात्रा, खींच हजारों हाथ
सबके सर पर हाथ दे, जय जय जगन्नाथ।।

संग में बहिन शुभद्रा, ले भ्राता बलराम।
पहुँच के मंदिर गुंडिचा, प्रभु करते विश्राम।।

मुहूर्त बड़ी शुभ यात्रा, बनते बिगड़े काम।
कर ले जो रथ-यात्रा, पहुंचे प्रभु के धाम।।

©पंकज प्रियम
4.7.2019

Friday, June 28, 2019

586. सूखा आषाढ़

सूखा आषाढ़
दोहे

वर्षा ऋतु बरखा बिना, बिन बादल आकाश।
खेतों में सूखा पड़ा,     टूटी सब की आस।।

बदरी बरसे क्यों नहीं, समझा उसका हाल?
कुदरत को सब छेड़कर, किया उसे बेहाल।।

गलती मानव कर रहा, जंगल रोज उजाड़।
पेड़ों का संहार कर,   काटत रोज पहाड़।।

पानी का दोहन करत,  भेज दियो पाताल।
तरसे पानी बूँद को,   सूखी नदिया ताल।।

एसी तो ठंडक करे,     मगर बढ़ावे ताप।
दूषित है पानी-हवा, दोषी जिसके आप।।

@पंकज प्रियम

Sunday, November 4, 2018

468.माटी


झुर्रियों से झांकती ये दर्द भरी मुस्कान
काँपते कमजोर हाथों से सजी दूकान।

इंतजार करती बूढ़ी आंखे,लेके सम्मान
माटी के बरतन भरे,सजा धजा सामान।

आया पर्व प्रकाश का,खुशी का त्यौहार
आओ आओ कहां गए हो सब खरीदार?

माटी के बर्तन से ही सजता मेरा घरबार
माटी माटी जिंदगी,माटी ही मेरा व्यापार।

प्लास्टिक बर्तन से अब करते सब प्यार
चायनीज लड़ियों से सजा खूब बाजार।

मेरी भी वर्तन खरीद,तो चले मेरा संसार
मेरे घर चूल्हा जले,मने दीवाली त्यौहार।
©पंकज प्रियम

Saturday, November 3, 2018

466.धूप-दीप

धूप-दीप से तुम करो,चाहे हवन हजार।
मन में बैठा मैल जो,सब पूजन बेकार।।

धूप-दीप हर्षित करे, जैसे फूल बहार।
तनमन भी गर्वित करे,पाकर रूप निखार।।

धूप-दीप घर घर जले,आया फिर त्यौहार।
एक दीया कुम्हार का, लेकर दो उपहार।।

धूप-दीप से है सजा,जगमग ये संसार।
धूप-दीप पूजन-हवन,महकाए घरबार।।

धूप-दीप के मेल से,बह शीतल की धार।
तन को भी हर्षित करे,मन को मिले करार।।

©पंकज प्रियम
गिरिडीह,झारखंड