मुसाफिर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, सफर अल्फाज़ करता हूँ. कहानी, गीत गजलों से , सहर आगाज़ करता हूँ . नहीं मशहूर की चाहत, नहीं हसरत बड़ी दौलत - प्रियम हूँ मैं मुहब्बत का, दिलों पे राज़ करता हूँ.. ©पंकज प्रियम
नवरात करूँ जगराता, माता तुम सबपे उपकार करो, महिषासुर घाती माता, कोरोना संहार करो। घर में कैद हुआ है मानव, बाहर विचरे ऐसा दानव- रक्तबीज बन बैठा राक्षस, कोरोना पे वार करो।।
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