समंदर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, मुझे खामोश रहने दो, छुपा है इश्क़ का दरिया, उसे खामोश बहने दो। नहीं मशहूर की चाहत, नहीं चाहूँ धनो दौलत- मुसाफ़िर अल्फ़ाज़ों का, मुझे खामोश चलने दो। ©पंकज प्रियम
Tuesday, December 13, 2022
951. प्री वेडिंग
Saturday, December 10, 2022
950. प्रेमगीत..चांदनी रात में
949.ब्राह्मण
Tuesday, December 6, 2022
948.शाकद्वीपी
*शाकद्वीपी*
सूर्य अंश से उपजे हम सब, सूर्य समान प्रतापी हैं।
श्रेष्ठ कुल के जन्मे हम सब, ब्राह्मण शाकद्वीपी हैं।
वेद-पुराण में चर्चा अपनी, संगीत-चिकित्सक, ज्ञानी हैं।
ब्राह्मण सर्वोत्तम कहलाते, धीर-वीर, अभिमानी हैं।
सूर्य अस्त के बाद श्राद्धकर्म, सूर्य वरण अधिकारी हैं,
मूल मगध के वासी मग हम, भास्कर-भुवन पुजारी हैं।
साहित्य, कला, संगीत, चिकित्सा में सर्वव्यापी हैं।
श्रेष्ठ कुल के जन्मे हम सब, ब्राह्मण शाकद्वीपी हैं।
पुत्र साम्ब को कुष्ठ हुआ तब, चिंतित राधेश्याम हुए।
परिवार अठारह शाकद्वीप से जम्बूद्वीप में बुलवाए।
आध्यात्म चिकित्सा के बल पे, रोग साम्ब का दूर किया।
मगध नरेश के आग्रह पर, कान्हा ने बहत्तर पुर दिया।
चाणक्य, वराहमिहिर, आर्यभट्ट, बाणभट्ट विद्वान बड़े,
सत्य-सनातन, धर्म-स्थापन, की ख़ातिर मिलते खड़ें।
धर्म ध्वजा को धारण करके, हमने दुनिया नापी है।
श्रेष्ठ कुल में जन्मे हम सब, ब्राह्मण शाकद्वीपी हैं।
*©कवि पंकज प्रियम*
Monday, October 3, 2022
947.मन के राम
Tuesday, June 21, 2022
946.मोह्हबत
Wednesday, June 15, 2022
945.पत्थर की खोज
Tuesday, June 14, 2022
944.डर
Monday, June 13, 2022
943.सनातन धर्म
Saturday, May 21, 2022
942. प्रतीक्षा
Friday, May 20, 2022
941.गंगा-यमुना
Wednesday, May 18, 2022
940. मुद्दे और सियासत
Monday, May 16, 2022
939. भारत की पुकार

Friday, April 15, 2022
938.अज़ान
Wednesday, April 13, 2022
844. पर्यावरण
प्रकृति और मानव
प्रकृति क्रन्दन आज सुनो, सुनो करुण चीत्कार।
मूढ़मति अरे मानवों, कर गलती स्वीकार।।
मानव कर्मों की सज़ा , सबको मिलती आज।
दूषित है पर्यावरण, मानव ऐसे काज।।
रोक कदम अब आज तुम, बहुत किया संहार।
पलपल प्रकृति देख अभी, करती है हुंकार।।
कदम मिलाकर प्रकृति के, चलो हमेशा संग।
नहीं करो प्रदूषण तुम, भर लो जीवन रंग।।
देख जरा कैसे धरा, पल-पल रही कराह।
जख़्म दिया तूने उसे, ख़त्म हुई सब चाह।।
जीवन तुझको दे धरा, भुगत रही अंजाम।
मत कर उसका चीर हरण, होगा फिर संग्राम।।
दोहन करते जो रहे, जल-जंगल आधार।
ख़त्म समझ संसार फिर, सुन कुदरत ललकार।।
जंगल को उजाड़ अगर, बसे शहर कंक्रीट।
छत तो होता पर मगर, हिले नींव की ईंट।।
©पंकज प्रियम
विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। आइये सब मिलकर इसे बचाएं।
483.इश्क़ की आग
इश्क़ की आग मेरे दिल में जगाने वाले
अब तो आजा मुझे रातों में जगाने वाले।
दिल की ये आग को कैसे मैं बुझा पाऊंगा
अब तो आजा मेरे शोलों को जलाने वाले।
मैं तेरे प्यार में नग़मे जो लिखा करता हूँ
मुझको पागल ही समझते हैं जमाने वाले।
मैं तेरी याद में जो हररात जगा करता हूँ
मुझको दीवाना भी कहते हैं बताने वाले।
मेरी चाहत को जमाने से छुपाये रखना
दिल के जज़्बात को दिल में छुपाने वाले।
इस मुहब्बत को तू दिल में बसाये रखना
मेरी हर बात को ही दिल से लगाने वाले।
ऐ प्रियम कौन मिटाएगा दुनिया से गज़ल
जब तलक जिंदा हैं दिल को सताने वाले।
©पंकज प्रियम