Tuesday, April 21, 2020

815. मौत का मंज़र

संशोधित

*मौत का मंज़र*

रो रही धरती अभी, रो रहा है आसमां।
जल रहा सारा जगत, बूझती हर इक शमा।

मौत का मंज़र यहाँ, ख़ौफ़ में सारा जहाँ।
साँस सबकी थम रही, बढ़ रही धड़कन यहाँ।

कैद घर में आदमी, मिल रही कैसी सजा?
बोल ईश्वर कह खुदा,  क्या अभी तेरी रजा।?

रोज़ बढ़ता आंकड़ा, मर रहा हर शख्स है,
ख़ौफ़ के साये में अब, छुप रहा हर अक्स है।

मर रहा कुछ रोग से, मर रहा कुछ भूख से,
देखकर नैना बहे, फट रहा हिय हूक से।

माँग लाली धुल रही, कोख़ भी उजड़ी अभी,
आ गयी विपदा बड़ी, शोक में विलखे सभी।

खो गया है बचपना, उठ गया सर हाथ है,
काल कोरोना बना, छूट गया सब साथ है।

अब प्रियम सब बोलते, और कर मत तू बयाँ,
रो रही धरती अभी, रो रहा है आसमां।
©पंकज प्रियम

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