Thursday, April 23, 2020

820. राम सीता त्याग(हर प्रसंग प्रासंगिक-4)

सीता-राम का त्याग

पुरुष हथियार से केवल शरीर जीतता है
लेकिन स्त्री त्याग से मन को जीत लेती है।
कवि पंकज प्रियम

सीता वनवास को लेकर कई भ्रांतियां है। सभी  ग्रन्थों में अलग-अलग तरह से इसकी व्याख्या की गई है। सीता के परित्याग पर लोग राम पर लाँछन लगाते रहे हैं। अब यह कहानी सही है या नहीं पता नहीं क्योंकि कहा जाता है बाल्मीकि रामायण में यह बाद क्षेपक जोड़ा गया। अब वास्तविक जो भी हो लेकिन रामानन्द सागर ने सभी ग्रंथो पर पूर्ण रिसर्च करने के बाद उत्तर रामायण में जो प्रसंग दिखाया उससे तो स्पस्ट है कि राम ने तो कभी सीता का परित्याग किया ही नहीं बल्कि सीता ने अयोध्यावासियों के लाँछन को खत्म करने के उद्दयेश्य से स्वयं अयोध्या और पति सहित पूरे परिवार के त्याग की भीष्म प्रतिज्ञा ले ली थी। यूँ तो राजा और रानी का जीवन खुद का होता नहीं लेकिन प्रजा में सीता को लेकर उठ रहे सवाल के बावजूद राम इतने व्यथित हो गए कि राजपाट छोड़कर सन्यास धारण करने तक का फैसला ले लेते हैं। सीता के त्याग के सवाल पर वह खुद वनवास जाने की सोच लेते हैं। राम के इस अंतर्द्वद्व को सीता जैसी पतिव्रता स्त्री ही समझ सकती थी। जब सीता को प्रजा की बात पता चली तो उसने खुद को लांछन मुक्त करने के लिए त्याग का अमोघ अस्त्र चलाया। रामायण का यह संवाद बेहद जानदार है कि पुरुष तो तीर तलवार से दुश्मन के शरीर को जीत सकता है लेकिन स्त्री त्याग और बलिदान के अस्त्र से दुश्मन का मन जीत लेती है। सीता सिर्फ एक पत्नी और साधारण नारी नहीं थी वह अयोध्या की महारानी थी, साक्षात देवी थी। सीता से अगाध प्रेम में जब राम के कदम अपने कर्तव्य से डिगने लगे तब सीता ने ही उन्हें राजधर्म का पाठ पढ़ाया और राजा के कर्तव्यों का भान कराया। राम को उनकी शपथ याद दिलाई जिसमें एक राजा के लिए प्रजा से बढ़कर कुछ नहीं होता, घर परिवार, पत्नी बच्चे यहां तक की खुद का भी जीवन नहीं होता। वह याद दिलाती है कि किस प्रकार राजा हरिश्चन्द्र ने सत्य और धर्म के लिए पत्नी, पुत्र और स्वयं को बेच दिया था। सीता ने वनवास के निर्णय स्वयं लिया ताकि उसपर लगा कलंक मिट सके, जो प्रजा आज लांछन लगा रही वही पश्चाताप कर क्षमा मांगकर सीता को महारानी स्वीकार करेगी। राम ने तो सीता को विरोध करने की भी सलाह दी लेकिन सीता का यह जवाब दिल जीतने वाला है कि स्त्री का प्रतिकार पुरुषों से अलग होता है। वह बिना तीर तलवार के ही दुश्मन को सिर्फ त्याग के हथियार से पराजित कर सकती है। अगर सीता वनवास नही लेती तो प्रजा की नज़र में वह कलंकित ही रहती। इस प्रसंग में राम का यह संवाद भी काफी प्रासंगिक है कि जनता बहुत निर्दयी होती है जो राजा से सिर्फ लेना चाहती है लेकिन जब राजा के लिए उसे कुछ देने की बारी आती है तो वह मुँह फेर लेती है। ठीक ऐसे ही जैसे कि हम मौलिक अधिकारों की बात तो ख़ूब करते हैं। सरकार को दिनरात कोसते रहते हैं लेकिन जब मौलिक कर्तव्यों की बात आती है तो चुप हो जाते हैं। देश ने क्या दिया इसपर ख़ूब चिल्लाते हैं लेकिन आपने देश को क्या दिया इस सवाल पर मौन साध लेते हैं। सोचिए उस राम के मन मे क्या बीती होगी जो सीता से अगाध प्रेम करता है। त्याग के ख्याल से ही पूरा राजपाट छोड़कर सन्यास धारण करने का निर्णय ले लेता है। उस सीता के मन मे क्या बीती होगी जो अभी 14 वर्ष का वनवास काट कर लौटी और तुरंत वनवास जाने का कठोर संकल्प लेना पड़ा। यह एक पति पत्नी के बीच का अगाध प्रेम ही था जो राम के ऊपर लगे पत्नीमोह के लाँछन को मिटाने के लिए खुद जंगल जाने को तैयार हो जाती है। अगर राम भी राजपाट छोडकर सीता के साथ वनवास को जाते तो यही जनता उन्हें ठेठ भाषा मे कहें तो मौगा कहकर खिल्ली उड़ाती और यही बात सीता ने भी राम को भी समझाया कि आप राजधर्म से विमुख न हों। राजपाट छोड़कर सन्यासी बन जाना बहुत आसान होता है लेकिन सर पर कांटो का ताज धारण कर जनता के समक्ष मुस्कुराते रहना बहुत कठिन होता है। यहां तो सबकुछ राम और सीता की आपस मे समझ और सहभागिता से वनवास के प्रसंग हुआ, इसमें राम की निंदा  बिल्कुल अनुचित है। सोचिए राम के दिल पर क्या बीती होगी जब अपनी प्राणों से प्रिय सीता के त्याग के प्रण को स्वीकृति देनी पड़ी। यह दोनों का आपसी समन्वय था लेकिन सिद्धार्थ ने तो पत्नी और अबोध बच्चे को नींद में ही छोड़कर सन्यास धारण कर लिया सिर्फ ज्ञान प्राप्ति के लिए। जिसके बाद गौतम बुद्ध बने। कमोबेश यही कहानी महावीर की भी है दोनों आज भगवान की तरह पूज्य हैं। वाकई रामायण का हर प्रसंग हमेशा ही प्रासंगिक है और जीवन का सार्थक संदेश प्राप्त होता है।

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