तुम हो

जब भोर की देहरी पर
पक्षियों के कलरव के
साथ आंख खुलती है।
और अलसायी भारी
पलकों से निहारता हूँ
           तो लगता है कि तुम हो।
गर्म विस्तर छोड़ने को
जी नही करता
फिर आंखे बंद कर
तकिये में छुपता  हूँ
           तो लगता है कि तुम हो।
सर्द भाप निकलते
कंपकपाते होठो से
गर्म चाय की प्याली लगाता हूँ
              तो लगता है कि तुम हो।
खिड़की के शीशे को चीरती
अरुण लालिमा लिए किरण
मेरे वदन को छू जाती है
             तो लगता है कि तुम हो।
दिन की शुरुआत में
मेरी हर बात में
दिल से निकले जज़्बात में
                       तुम ही तो हो।
दिनभर की भागदौड़
व्यस्तता में चूर चूर
थोड़ी देर नरम छांव में
पलक झपकाता हूँ
              तो लगता है कि तुम हो।
शाम में सूरज जब होता
अस्ताचल को अग्रसर
लौटते घर पक्षी नभपर
संग संग उनके चलता हूँ
             तो लगता है कि तुम हो।
शांत निश्चल रात्रि पहर
घड़ी की टिक टिक टिक
भंग करती तन्मयता में
आंखों को बंद कर लेता हूँ
            तो लगता है कि तुम हो।
सुरमयी सुंदर
सपनों की जहां में
खुद को शहंशाह सा
मुट्ठी में सारे जहां को पाता हूँ
              तो लगता है कि तुम हो।
दरिया में गुलाब
बहकर आता उसे
उठाके अपने लबों से
जब लगाता हूँ
        तो लगता है कि तुम हो।
दूर तलक एक गीत सदा
मेरे दिल को भेदती
थामकर दिल को जब
करीब जाता हूँ
      तो लगता है कि तुम हो।
बन्द आंखों में कोई तस्वीर
उभर कर बारबार मुझे
नर्म हाथो से कोई
ख्वाबों में सहलाता है
       तो लगता है कि तुम हो।
मेरी हर सांस मेरी धड़कन
मेरी रूह मेरे कण कण
मेरे आंसू मेरे मुस्कान
मेरे गीत मेरे साजो गज़ल
मेरे हर बात मेरे जज्बात।
           बस तुम ही तुम हो ।
  
©-पंकज भूषण पाठक"प्रियम"-
Shared publiclyView activity