Monday, November 18, 2019

727. बरगद की छाँव

बरगद की छाँव में

मेरे घर गाँव में
बरगद की छाँव में,
बीता है बचपन
उसके जो ठाँव में।
विशाल बरगद का पेड़
नीचे बनता खलिहान,
जहाँ होता सबका जुटान।
वो बतकही और ठहाके,
आहिस्ते-आहिस्ते भैंस-बैलों का
धान के खोवा में घूमना मिसना,
उसकी पीठ पर शान से मेरा चढ़ना,
बैलों के संग गोल गोल घूमना,
फिर एक रोज मेरा धड़ाम से गिरना
और फिर मेरी ठुड्ढी का कटना,
आज भी मौजूद है वह निशान,
जिससे सब हो गये थे परेशान।
और उसके पीछे-पीछे छड़ी ले
किसना बाबा का संग चलना,
वो बरगद महज़ एक वृक्ष नहीं
हमारे घर का बड़ा सदस्य था,
जिसकी बड़ी शाखाओं में लगते झूले
जिसपर झूलते हमारा बचपन बीता,
शाखाओं से लटकती लम्बी-लम्बी डोर
जिसपर झूलते बेफ़िक्री में बच्चे हर ओर।
बट सावित्री के दिन माँ चाची का पूजन
विशाल बरगद का आस्था की डोर का बंधन।
उसके पत्तों का आसन, उसकी ही छाया
पत्तों से ही भगवान को पँख झलना
बरगद के छाँव में नारी का पतिधर्म पलना।
हम बच्चे उछलते कूदते प्रसाद के इतंजार में
सच में कितना सुकून था बरगद के प्यार में।
वक्त के साथ बरगद भी लाचार हुआ
या कहूँ शाखाओं की छँटाई से बीमार हुआ।
धीरे-धीरे वह सूखता गया
मानो वह हमसे रूठता गया।
खतम हो गयी उसकी सारी निशानी
रह गयी तो सिर्फ यादों की कहानी।
अब न तो बरगद है और न छाँव है,
रोजगार सृजन में हमसे दूर गाँव है।
©पंकज प्रियम
18/11/2019

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