Saturday, November 2, 2019

709. छठ महापर्व

छठ पर्व
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किया खुद से स्वयं हठ है, कठिन तप साधना छठ है,
महज़ पूजा फ़क़त अर्पण, नहीं बस कामना छठ है।
नदी तालाब सूरज और मिट्टी बांस फल-जल-बल-
सभी को स्वच्छ करने का बड़ी आराधना छठ है।।

रवि आदित्य सविता सूर्य, दिनकर भानु प्रभाकर,
मरीचि हंस अंशुमाली, जगत रौशन करे भास्कर।
सहस्रांशु त्रिलोचन,....हरिदश्वम विभावसवे-
त्रिमूर्ति द्वादशात्मकम, करे कल्याण दिवाकर।।

महापर्व लोकआस्था का, छठ महिमा अपरम्पार,
अस्ताचल-उदयगामी, दोनों वक्त जयजयकार।
कठिन तप निर्जला छठ ये, करे जो पर्व ये मन से-
मिटे सब कष्ट जीवन का, होता उसका बेड़ापार।।

कहे भूगोल ये हरदम, जो उगता है वो डूबेगा,
हमारी आस्था कहती, जो डूबता है वो उगेगा।
इसी विश्वास के बल पर यहाँ होती सदा पूजा-
हमेशा सोच पूरब की, जहाँ से सूर्य निकलेगा।।
©पंकज प्रियम

छठ कोई पर्व या सिर्फ त्यौहार नहीं होता,
केवल रीत रिवाज या संस्कार नहीं होता।

छठ पर्व है अपनों को अपनों से मिलाने का,
विदेशों में बसे बच्चों को पास में बुलाने का।

बच्चों को नदी सूर्य और तालाब दिखाने का,
जातिगत भेदभाव और पाखण्ड मिटाने का।

बांस की सिमट रही सुप-दौरा को जगाने का,
घर नदी गली तालाब से गंदगी को हटाने का।

बेड-टी कल्चर से निकल कर प्रातः उठाने का,
उगते सूरज को ही सलाम की सोच मिटाने का।

"उदित-अस्त" दोनों को ही सम्मान दिलाने का,
छठ महापर्व है प्रकृति से खुद को मिलाने का।

सरिता में संस्कारों का कमल फूल खिलाने का।
कठोर तप साधना से पूरे तनमन को जगाने का

छठ पर्व सिर्फ कोई व्रत या विचार नहीं होता,
छठ पर्व महज कोई एक त्यौहार नहीं होता।

©पंकज प्रियम

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