Friday, November 8, 2019

718. नज़र चाहिए

ग़ज़ल
212 212 212 212
इस नज़र को नज़र की नज़र चाहिए,
फूल बनकर खिलें वह असर चाहिए।

ख़्वाब को पँख हमने लगाया बहुत,
जो हकीकत लगे वह ख़बर चाहिए।

दिल भरा दर्द इतना मुहब्बत मुझे,
रोज़ शामों सुबह हर पहर चाहिए।

गर मुनासिब लगे छोड़ देना डगर,
पर सफ़र में मुझे हमसफ़र चाहिए।

तिश्नगी प्यार की आग बनके जली,
दिलजले के लिए इक ज़िगर चाहिए।

हर तरफ रेत ही रेत बिखरा "प्रियम",
छाँव मिलता रहे वह शज़र चाहिए।
©पंकज प्रियम

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