मुसाफिर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, सफर अल्फाज़ करता हूँ. कहानी, गीत गजलों से , सहर आगाज़ करता हूँ . नहीं मशहूर की चाहत, नहीं हसरत बड़ी दौलत - प्रियम हूँ मैं मुहब्बत का, दिलों पे राज़ करता हूँ.. ©पंकज प्रियम
मुक्तक मात्रा भार 30 जान हथेली पे रखकर के, जो करते देश की हैं रक्षा। सच्चे वीर सिपाही हैं वो, दिल होता इनका है सच्चा। नहीं मौत से घबराते, नहीं किसी से हैं वो डरते, लिपटे धरती भारत के, जैसे माँ गोदी में बच्चा।।
©पंकज प्रियम
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