Thursday, May 7, 2020

830. अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव चः।


*अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव चः।*

गीता के इस उपदेश में बहुत बड़ा गूढ़ रहस्य छिपा है। इसका स्पस्ट अर्थ है कि मनुष्य के लिए अहिंसा परम धर्म है तो लेकिन धर्म और सत्य  पर संकट आए तो मनुष्य को शस्त्र उठाना चाहिए और धर्म  की रक्षा करनी चाहिए। यह अहिंसा से भी बड़ा धर्म है। भगवान बुद्ध हो या महावीर दोनों ने अहिंसा को ही परम धर्म माना है। यह सही भी है कि हमें हिंसा नहीं करनी चाहिए उससे केवल विनाश होता है। आजतक जितने भी युद्ध हुए उसमें सिर्फ विनाश ही हुआ है। इसमें असंख्य निर्दोषों की जान चली जाती है। हिंसा का अर्थ केवल रक्तपात या युध्द नही, प्राणिमात्र की हिंसा को अपराध माना गया है। अपनी स्वार्थ पूर्ति और जिह्वा के क्षणिक स्वाद के लिए जो बेजुबानों का कत्ल करते हैं, बलि देते हैं वह सबसे बड़ा पाप है। मनुष्य तो अपनी रक्षा के लिए संघर्ष भी करता है लेकिन एक बेजुबान जानवर जिसे बांधकर उसकी बलि दे दी जाती है वह तो प्रतिकार भी नहीं कर सकता। चूँकि वह निर्दोष बेजुबान होता है। लोग अमूमन खुद से कमजोर पर ही हिंसक होते हैं, कोई शेर, बाघ , चीता जैसे खूंखार जानवरों की बलि नहीं देते क्योंकि वे ताकतवर होते है। दुर्गा हो या काली कभी बलि नहीं मांगती ,सब उसकी संतान है तो भला एक माँ अपने बच्चों की बलि कैसे ले सकती है? यह केवल अपनी जिह्वा शांति के लिए लोग बलि चढ़ाते हैं। जिस दिन माता बलि लेने लगी लोग बलि देना छोड़ देंगे। बुद्ध ने भी बेजुबानों की बलि देखकर ही सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाया यह तो बात हुई रक्तचाप और बलि की लेकिन हिंसा की श्रेणी किसी को मन, वचन और शरीर से कष्ट देना ,प्रताड़ित करने को भी हिंसा कहते हैं। बुध्द क्या हमारे वेद और पुराणों में भी प्राणिमात्र की हिंसा का विरोध किया गया है। किसी भी तरह की हिंसा का प्रतिकार हमें किसी न किसी रूप में मिलता ही है। प्रकृति के साथ कि गयी हिंसा का ही परिणाम प्रलय है।

अब आते हैं श्लोक के शेष भाग में जिसमें धर्म की रक्षा हेतु हिंसा को अहिंसा से भी बड़ा धर्म माना गया है। महाभारत में अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने यह कहा कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना ही धर्म है।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥
(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४)

भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं दुष्टों के नाश और धर्म की रक्षा का सन्देश दिया है। भगवान ने अपने सभी अवतारों में धर्म और सत्य की रक्षा हेतु दुष्टों का संहार किया। आप किसी भी भगवान का रूप देख लें अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हैं लेकिन मुद्रा सदा आशीर्वाद की रहती है। यानी कि प्राणिमात्र से स्नेह और जरूरत पड़ने पर उनकी रक्षा हेतु दुष्टों का संहार।

अतः यह पूरा श्लोक ही धर्म सत्य और जीवन का मूल आधार है इसे  अधूरे में नहीं देख सकते।

©पंकज प्रियम

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