
समंदर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, मुझे खामोश रहने दो, छुपा है इश्क़ का दरिया, उसे खामोश बहने दो। नहीं मशहूर की चाहत, नहीं चाहूँ धनो दौलत- मुसाफ़िर अल्फ़ाज़ों का, मुझे खामोश चलने दो। ©पंकज प्रियम
Thursday, December 9, 2010
महामहिम आपके स्वागत में ..

Tuesday, December 7, 2010
शीला की जवानी...से ...मुन्नी बदनाम

पंकज भूषण पाठक "प्रियम"
पहले तो मुन्नी बदनाम हुई अब शीला की जवानी भी सताने लगी है और इन दोनों ने लोगो का चैन छीन लिया हैं .आजकल दो गाने काफी चर्चित है मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए ... और शीला...शीला की जवानी... .हैं तो दोनों आइटम सोंग लेकिन उनकी चर्चा खूब हो रही है .क्या बड़े क्या बच्चे हर किसी की जुबान पर ये गाने चढ़े हुए हैं। मै उस वक्त हैरान रह गया जब एक छोटी सी बच्ची को अपनी तोतली आवाज में मुन्नी बदनाम हुई... और शीला की जवानी ..के बोल दुहरा रही थी .शायद ये बुद्धू बक्से यानि टेलीविजन का कमाल हैं जहाँ हर चैनल पर इन गानों की धमाल मची हुई हैं। घर से लेकर बाजार तक इन शीला की जवानी की चर्चा है जिससे तमाम मुन्निया बदनाम हो चुकी है। एक गाना आया था पप्पू कांट डांस साला ...और पप्पू पास हो गया पर पप्पू नाम के लड़के काफी परेशां रहे .कुछ यही हाल इन दिनों मुन्नी और शीला के साथ हो रहा है। मोहल्ले से लेकर स्कुल- कोलेज तक में उनका चलना दूभर हो गया है .सड़क छाप मजनू हो या फिर सहपाठी हर कोई इस इन गानों पर उनकी चुटकी लेने में लगा है। अब इनका क्या कसूर फिल्मवालो ने तो उनके नाम को बदनाम कर दिया .खैर गाने हैं गानों का क्या ...आइटम सोंग है तो उनमे मिर्च मसाला होना लाजमी है। गाने के बोल जो हैं सो हैं लेकिन जरा उसके फिल्मांकन को देखे तो जवानी और बदनामी का पूरा नजारा दिख जाएगा .जो दुसरे आइटम गानों की तरह परिवार के साथ बैठकर देखना तो कतई संभव नही है। लेकिन ये फिल्मवाले भी क्या करे ,इनकी भी बड़ी मज़बूरी है फिल्म को चलाने के लिए ऐसे मसाले तो डालने ही पड़ेंगे .क्युकी फिल्म इंडस्ट्री की हालत इनदिनों वैसे भी कुछ अच्छी नही है और आइटम सोंग तो फिल्मो के चटकपण के लिए शुरू से बेहतरीन साधन रहा हैं। पहले तो आइटम सोंग के लिए अलग से आइटम गर्ल हुआ करती थी जो सेक्सी अदाओ से गाने को रंगीन करती थी लेकिन आज के दौर में बड़ी और सुपरस्टार हीरोइने भी आइटम सोंग करने में अपनी शान समझने लगी है । अब कैटरिना को ही देख ले ..शीला की जवानी में उन्होंने माशा -अल्लाह ..क्या जलवा दिखाया है । इन गानों का हमारे समाज और नई पीढ़ी में क्या असर हो रहा है ये शायद बताने की जरुरत नही है।
Monday, December 6, 2010
प्रश्न नए
का भेद क्या भगवान् ने ही बनाया
सोचता हु फिर नहीं उसकी तो
सब संतान है वह कैसे भेद करेगा।
फिर किसने यह रंग जमाया
हम जिसे चाहते है ,जिसे पूजते है
अपना दर्द,अपनी जान मानते है,
पर उसे ही अपना नही पाते हैं
जाती धर्म की बेडियो में
बंधा खुद को लाचार पाते है
उसके ही संतान कों मारते हैं
कितना अच्छा होता पुरे जहाँ में
एक जाती धर्म .एक समाज
एक भगवान् एक खुदा होता
न कोई मंदिर ,न मस्जिद न चर्च न गुरुद्वारा
सब कुछ तो सबके दिल में है
सब जानते हैं फिर भी जाने क्यों
नही मानते हैं
हर बार नये प्रश्न उठाते हैं
--पंकज भूषण पाठक" प्रियम"
Sunday, December 5, 2010
हाथ बढाओ यारो
हाथ बढाओ यारो
ता उम्र पड़ी है भागदौड़
जिंदगी शाम सी
ग़जल
-- पंकज भूषण पाठक "प्रियम"
Wednesday, November 24, 2010
कैसी नादानी
मै ...
ग़जल --पूछ बैठे
Saturday, November 13, 2010
झारखण्ड के १० साल : कितना विकास कितनी उम्मीदे
-पंकज भूषण पाठक
झारखण्ड गठन को १० साल हो गये और १५ नवम्बर को राज्य की जनता एक और स्थापना दिवस समारोह से रुबरु होगी. लेकिन जिस उम्मीद से इस राज्य का निर्माण हुआ था क्या वो सही मायनो में पूरा हुआ ,विकास सूचकांक को देखकर तो बिकुल ही नही लगता. किसी भी क्षेत्र की बात कर तो पिछले दस वर्षो में विकास की गति जस की तस है ,नेताओ का विकास हुआ और जनता ठगी रह गयी--एक लम्बे आन्दोलन के बाद १५ नवम्बर २००० को आदिवासियो का अपना एक अलग राज्य का सपना साकार हुआ और बिहार से अलग कर झारखण्ड प्रदेश का गठन हुआ. आदिवासियो के हितो के नाम पर बने इस प्रदेश हर मुख्यमंत्री आदिवासी ही रहा लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ये है की उनका अबतक विकास नही हो सका. पिछले १० वर्षो में राज्य की जनता ने ८ मुख्यमंत्री, उतने ही राज्यपाल को कुर्सी पर बैठते और हटते देखा है. कुर्सी की छिनाझपटी भी देखी और घोटालो का घोटाला भी. सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक विकास सूचकांक में झारखण्ड का स्थान बहुत ही नीचे है. विकास के किसी भी क्षेत्र में झारखण्ड में अपेक्षित विकास नही हुआ है- दरअसल जिन उम्मीदों पर झारखण्ड राज्य का गठन हुआ उसपर किसी भी सरकार ने अपनी इच्छाशक्ति नही दिखाई,राजनीतिक अस्थिरता भी इसकी एक बड़ी बजह मानी जा सकती है की किसी भी सरकार को बेहतर शासन करने का मौका ही नही मिला,जोड़तोड़ की सरकार अपना पूरा समय गठबंधन को बचाने में ही लगी रही और राज्य के खजाने पर हर किसी ने अपना हाथ धो लिया--इसबार भी १५ नवम्बर को भगवान बिरसा की जयंती के साथ ही राज्य की स्थापना की बधाईया ले लेंगे,सरकार कुछेक बड़ी घोषनाए भी करेंगी और जनता उनके भाषणों पर बस तालिया बजती रह जाएगी.अब भी वक्त है जागने का,पिछले १० वर्षो में राज्य का कितना विकास हुआ और जो उम्मीदे थी उसपर मंथन करने की जरुरत है..
Saturday, November 6, 2010
हंसी बिखेरता चल
Monday, November 1, 2010
मैं बदन बेचती हूँ--
उस औरत के तन का
कतरा-कतरा फुट बहा है
तभी तो चीख-चीख कहती
हाँ मै बदन बेचती हूँ
अपनी तपिश बुझाने को नही
पेट की भूख मिटाने को नही
मै बेचती हूँ बदन ,हां बेचती हूँ मै
भूख से बिलखते रोते -कलपते
दो नन्हे बच्चो के लिए
मैं अपनी लज्जा अपनी अस्मत बेचती हूँ
छाती से दूध क्या
लहू का एक कतरा तक
न निकला सूखे होठो के लिए
आँख के आंसू भी कम पड़े तो
इन अबोध बच्चो की खातिर
आपने सिने को गर्म सलाखों से भेदती हूँ
हाँ मै बदन बेचती हूँ
ठण्ड से ठिठुरते बदन पर
धोती का इक टुकड़ा भर
कैसे इन बच्चो को तन से चिपका रखा
देखि नही किसी ने मेरी ममता
नजर पड़ी तो बस
फटे कपड़ो से झांकते
मेरे जिस्मो बदन पर
दौड़ पड़े सब पागल कुत्तो की तरह
इनके पंजो से बचने की खातिर
हवसी नजरो से बदन ढंकने की खातिर
मै आँखों की पानी बेचती हूँ
दर्द से कराहते बच्चो की खातिर
हाँ मैं बदन बेचती हूँ
पर इन सफ़ेदपोशो के जैसे
अपने ज़मीर नही बेचती हूँ
चाँद सिक्को की खातिर
अपना ईमान नही तौलती हूँ
कोई चोरी पाप नही कोई
जहां के भूखे भेड़ों से बचने की खातिर
अपनी दौलत नीलाम करती हूँ
इन मासूम बच्चो की दो रोटी की खातिर
हाँ मै बदन बेचती हूँ
आखिर हूँ तो एक माँ
नही देख सकती बच्चो का दर्द
नही सुन सकती उनकी चीत्कार
उन्हें जीवन देने की खातिर
खुद विषपान करती हूँ
हाँ मैं बदन बेचती हूँ---
---पंकज भूषण पाठक "प्रियम "
Wednesday, October 20, 2010
बुद्धू बक्से में सिनेमा
गोकुल धाम में बोबी की हिट जोड़ी ऋषि और नीतू ,ऍफ़आईआर में झूठा ही सही के जोनअब्राहम तो न आना इस देश लाडो में हिस्स की नई नागिन माल्लिका शेरावत..... जी हाँ----- ये नज़ारे अब आम हो गये हैं बड़े बजट की फिल्मे अब छोटे और आम लोगो की सीरियलों पर आश्रित हो गयी है .टेलीविजन से नाक-भौं सिकोड़ने वाले बड़े फ़िल्मी सितारे अब टीवी कलाकारों के पास पहुच अपनी पहचान बताने में जुटे हैं अब इसे फिल्म इंडस्ट्री का नया फ़ॉर्मूला कह ले या फिर उनकी मज़बूरी .......सिनेमा प्रचार का एक नया फंडा शुरू हो गया है ,हिंदी सिनेमा बुद्दू बक्से यानि टेलीविजन के भरोसे रह गया है। टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले करीब-करीब सभी सीरियल और रियलिटी शो में फिल्मो का जलवा देखने को मिलता है। सिनेमा हाल में दर्शको का इंतजार कर रही हो या फिर भविष्य में रिलीज होने वाली फिल्म हो उसका प्रमोशन टीवी पर जरुर देखने को मिल जाएगा। प्रमोशन के लिए भी फिल्मकारों के बीच जबरदस्त होड़ से मची है सीरियल में आने से पहले ही उसका जमकर प्रचार होता है और फिर एक हीरो या हिरोईन किसी सीरियल में दिखे नही की दुसरे में कोई और आने को तैयारफिल्म के प्रमोशन के लिए भी चर्चित और टीआरपीमें आगे चल रहे कार्यक्रमों का चयन किया जाता है। इससे फिल्मवालो को फायदा हो या न हो लेकिन दर्शको को मुफ्त में आपने चहेते सितारों को देखने का मौका मिल जाता है और नई फिल्मो के बारे में जानकारी मिलने के साथ-साथ उसे देखने या न देखने का फैसला कर पाना भी आसान हो जाता है.....शायद ये टेलीविजन की गाँव-गाँव तक पहुच और उसकी लोकप्रियता का भी कमाल है।
-पंकज भूषण पाठक"प्रियम "
Friday, September 17, 2010
क्यों नही तुम आ जाते राम
शुरू हो गयी है फिर से अयोध्या की कहानी
होगा कोर्ट में फैसला ,शुरू हो गयी जुबानी
हे राम तेरे नाम साकेत हो रहा बदनाम
तुझे तरस नही आती,क्यों नही तुम आजाते राम ॥
नही सुलझेगी बाहर, लड़ाई साठवर्ष पुराणी
राम-रहीम के खेल में कितने घर टूट गये
हुए अनाथ बच्चे ,माएं लुटी खूब सरेआम ।
क्या हो गया तुम्हे. क्यों नही तुम आ जाते राम ॥
तुम थे या नही बहस की बात बनी है
कोर्ट के फैसले पर तेरा बजूद टिका है
क्या होगा ,सोच सबकी है नींद हराम
जले फिर से देश सारा ,बेहतर होता आ जाते राम ॥
पाप-पुन्य की लड़ी खूब लडाई
अब है देश को बचने की बारी
पिता वचन की खातिर जो गये वन राम
उसी वचन का वास्ता ,फिर से तुम आ जाते राम ॥
--पंकज भूषण पाठक "प्रियम"
Monday, August 9, 2010
कितने बदल गये हैं बच्चे ...
बच्चे होते मन के सच्चे
सुनी पढ़ी थी वर्षो हमने
छुट गयी वो बाते पीछे
अब वो नही रहे इतने कच्चे
नानी की अब लोरी नही
पॉप धुन से सोते हैं बच्चे
मत पूछो इनके स्टाइल को
खिलौने से टूटी दोस्ती
साथी बना लिया है मोबाइल को
पहले जब पापा घर आते
तो चोकलेट और मिठाई लाते
अब जरुरत बदल गयी बच्चो की
रिचार्ज और टॉपअप ही मंगाते
पापा हैं परेशां ,मम्मी भी हैरान है
क्या करे बच्चो का क्यों इतने नादाँ है
नही उनके लिए ये सब अच्छे
पर कहाँ मानते हैं आज के बच्चे
Saturday, July 31, 2010
बदलाव...: इडियट बॉक्स की मज़बूरी ...... दुनिया का इडियट आज ...
दुनिया का इडियट आज ...: "इडियट बॉक्स की मज़बूरी ...... दुनिया का इडियट आज इस कदर इडियट बन चूका है या यूँ कहे की टीआरपि की जंग से उसे बनने पर मजबूर कर दिया है की गाह..."
इडियट बॉक्स की लाचारी
दुनिया का इडियट आज इस कदर इडियट बन चूका है या यूँ कहे की टीआरपि की जंग से उसे बनने पर मजबूर कर दिया है की गाहे -बगाहे कुछ भी दिखानेको विवश है। धोनी की शादी में सभी न्यूज़ चैनलों को अब्दुल्ला दीवाना बनते पूरी दुनिया में देखा ये अलग बात है की धोनी तो क्या उनके नौकरों ने भी मिडिया को तरजीह नही दी.उसके बाद राहुल और डिम्पी की नौटंकी को भरे बाजार में बेचने का काम किया .पुराणी कहावत थी की जो दीखता है वही बिकता है लेकिन मिडिया ने इसे उलट कर जो बिकता है वही दीखता है कर दिया । ये सच है की बड़े सेलेब्रिटी की हर कदम पर उनके प्रसंसको की नजर होती है लेकिन ऐसी भी क्या मज़बूरी है की दुनिया भर की समस्या को छोड़ सभी समाचार चैनेल उसके पीछे पद जाये। पिछले दो दिनों से हर चैनल पर बस राहुल -डिम्पी की लड़ाई दिखाते रहे ,कोई लफंगा परिंदा ,कोई राहुल रावण आशिक आवारा राहुल जैसे हेडलाइंस लेकर विशेष चलते रहे। दिल टूटने और जोड़ने वाले गानों के साथ मनो शादी का एल्बम देख रहे हो ...हद हो गयी॥ तथाकथित स्वनामधन्य बड़े पत्रकार राहुल के घर से लेकर डिम्पी की चोटखायी नंगी पैरो के साथ वाकथ्रू करने में लगे रहे॥
Tuesday, July 27, 2010
न सीखी चाटुकारी.......
सबकुछ सिखा हमने ,न सीखी चाटुकारी
सच है दुनियावालो की हम है अनाड़ी॥
जो हो तुमको बढ़ना, सीखो होशियारी
आगे-पीछे डोलो ,हां में हाँ तू बोलो
मीठी छुरी मारो,करो जी हुजूरी ॥
नये गुरुकुल की यही है पढाई
तौर -तरक्की के वास्ते जाना इसी रास्ते
चमचागिरी के मन्त्र करो दिल से मक्कारी
तभी बढोगे आगे ,करोगे पत्रकारी ॥
-----पंकज भूषण पाठक 'प्रियम'
सावन

-पंकज भूषण पाठक 'प्रियम '
Thursday, July 22, 2010
यही उमीद है.......नेताओं से ...
बिहार विधानसभा में जो कुछ भी हुआ और हो रहा है उसमे आश्चर्य की कोई बात नही है..आज की राजनीती में विधायक,सांसदऔर मंत्रियो से कुछ और उम्मीद नही की जा सकती ..राजनीती में नैतिकता का कोई मोल नही रह गया है और न ही अछे आचरण की आस हैं । ये सिर्फबिहार की बात नही संसदऔर दुसरे विधानसभा में भी इस तरह की घटनाए होती रही है ..हाँ बिहार में स्थिति सबसे बदतर हो गयी हैं। वहां जो कुछ भी हुआ वो निश्चित तौर पर शर्मनाक है और लोकतंत्र के लिए घातक , इस घटना से झारखण्ड विधानसभा के बजट सत्र की याद आ गयी जब एक स्कूल के बच्चे विधायी कार्यो को जानने -समझने के लिए विधानसभा आये थे ,ठीक उसी वक्त एक घोटाले की सीबीआई जाँच की मांग को लेकर विपक्ष ने हल्ला बोल रखा था। विधायको की आपसी गली-गलौज .कुर्सिओ की उठापटक और अनुसासनहीनता का मंजर देख उन नौनिहालों पर कितना नकारात्मक असर पड़ा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है । गाँधी,नेहरु और बल्लभ भाई पटेल जैसे लोग हर किसी के आदर्श है लेकिन आज का कोई भी नेता आदर्श बनने की योग्यता रखता है क्या ? इस हालात और आचरण से तो बिलकुल हो नही .......
पंकज भूषण पाठक,...
Wednesday, July 21, 2010
हाकी...सेक्स....सलेक्शन ....

लगता है रास्ट्रीय खेल हाकी के दुर्दिन आ गये हैं तभी तो विवादों से लगातार घिरता जा रहा है। पहले ख़राब परफोर्मेंस की वजह से अंतररास्ट्रीय स्तरपर पिछड़ना फिर हाकी इंडिया का विवाद और अबतो सबसे बड़ा खुलासा हुआ है सेक्स स्केंडल का ...कोच पर महिला खिलाडी के साथ यौन-दुर्व्यवहार का आरोप लगा है ,साथ ही टीम के साथ जानेवाले एक विडिओग्राफर पर भी वैश्यावृति का आरोप...यूँ फिल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग काउच के मामले आते रहे हैं लेकिन रास्ट्रीय खेल में इस तरह का मामला सामने आया है जाहिर तौर पर हाकी के दामन पर गहरा दाग लगा है ....झारखण्ड को महिला हाकी की नर्सरी माना जाता है जहाँ की दर्जनों खिलाडियो ने रास्ट्रीय -अंतररास्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का परचम लहराया है ,लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह से झारखण्ड की खिलाडियो के साथ भेदभाव किया जा रहा है उसमे इस घटना ने संदेह के बिज बो दिए हैं...अभी राज्य की एक खिलाडी अन्शुता लकड़ा का चयन रास्ट्रीय टीम में हुए था लेकिन एनवक्त पर उसका नाम हटा दिया गया .....इसके पीछे क्या बजह थी ये तो सलेक्टर और कोच की बता सकते हैं लेकिन इन घटनाओ से हाकी के नर्सरी में आग लग गयी है जो रास्ट्रीय खेल के लिए काफी घातक हो सकती है.....
पंकज भूषण पाठक
Monday, July 19, 2010
रेल हादसा


एक और हादसा ...और जिम्मेवारी ....
रविवार की देर रात एक और दर्दनाक हादसा हो गया .भागलपुर से रांची आ रही वनांचल एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। सरकारी आकड़ो के मुताबिक ५० अधिक की मौत और १०० के करीब घायल है लेकिन असली आकडे इससे कहीं अधिक हैं। पिछले ६ महीनो में ४थि और इस महीने की ये दूसरी घटना है जब ट्रेन हादसे में यात्रिओ की जान पे बन आई। हादसा कैसे हुआ और कौन जिम्मेवार है इसके लिए जाँच बैठा दी गयी है मृत और घायलों के लिए मुआवजे का भी ऐलान कर दिया गया ...लेकिन क्या इतना भर से किसी की जिम्मेवारी ख़त्म हो गयी ? यात्री सुरक्षा के नाम पर किराये में अलग से से राशी जोड़ी जाती है और हरबार हादसे के बाद सुरक्षा पर ध्यान देने की बात कही जाती है लेकिन क्या होता है नतीजा वही ढाक के तीन पात .रेल मंत्री ममता बनर्जी ने कह दिया की हादसे के पीछे विरोधियो की साजिश है लेकिन क्या इससे उनकी जिम्मेवारी ख़त्म हो गयी .मंत्री होने के नाते क्या उनकी जवाबदेही नही बनती की रेल सुरक्षा पर ध्यान दिया जाय .क्या बजह है की तमाम कोशिशो के बावजूद रेल हादसे थमने का नाम नही ले रहे हैं ?ट्रेन से सफ़र करनेवाले यात्रिओ के मन में हमेशा असुरक्षा की आशंका बनी रहती है .नक्सली हमले का खौफ हो या फिर हादसे की आशंका ,पूरी रेल यातायात आज संदेह के घेरे में हैं ,झारखण्ड,ओरिसा ,बंगाल और बिहार में तो नक्सलियो के खौफ से रात में कई ट्रेने चल भी नही रही है। ऐसे में देश के सबसे बड़े यातायात व्यवस्था पर कैसे कोई भरोसा करे ?
ग्लैमर की चकाचौंध
ग्लैमर की चकाचौंध...और अँधेरा --

पत्रकारिता के नये स्वरुप और मीडिया जगत की अस्थिरता को देख आज मैं उस दिन को अपने जीवन का सबसे गलत फैसले वाला दिन मानता हू जब इस क्षेत्र में कैरियर बनाने का निर्णय लिया। दुसरे लोगो की तरह मेरे भीतर भी पत्रकारिता को अपना मिशन बनाने का जूनून सवारहुआ। यु तो मीडिया के प्रति मेरा बचपन से ही झुकाव था लेकिन इसे बतौर कैरियर अपनाऊंगा कभी सोचा नही था। ग्रेजुवेशन के बाद सिविल सेवा की तयारी में जुट गया। रांची में एक कोचिंग सेंटर में नामांकन कराकर अपने मित्रो के साथ अच्छी तयारी करने लगा। इसी दरम्यान पत्रकारिता का कीड़ा एकबार फिर कुलबुलाने लगा। लगे हाथ पत्रकारिता विभाग में नामांकन भी करवा लिया और ज्यादा ध्यान उधर देने लगा। इसी बिच आकाशवाणी में ऑडिशन पास कर उद्घोषक भी बन गया रेडिओ में अपनी आवाज देने का सपना पूरा हुआ। अखबारों में भी मेरे आर्टिकल्स छपने लगे फिर क्या था सिविल सेवा की तयारी गयी तेल लेने और मैं चौथे खम्भे पर खड़ा होने को संघर्ष करने लगा। पहले अख़बार और उसके बाद टेलीविजन की पत्रकारिता करने लगा। १० वर्षो के छोटे सफ़र में बहुत बड़ी कामयाबी तो नही लेकिन बहुत कुछ अपने दम पर कर जरुर कर दिखाया। दो-स्टिंग ओपरेशन और कई ऐसी खबरे जिसका व्यापक असर पड़ा और मुझे भी काफी सुकून मिला। खबरों के लिए मैंने अपनी जान की परवाह किये बगैर बहुत कुछ किया लेकिन उसका फलाफल मुझे कुछ नही मिला। मेरी खबरों पर चैनल ने खूब खेला ,मेरी जान पर बन आई लेकिन चैनल की और से न कोई सुरक्षा और न ही एक छोटा सा कम्लिमेंट्स भी मिला। खबरों की दुनिया में इस कदर खो गया की अपनी जिंदगी की ही खबर नही रही। समय अपनी रफ़्तार से गुजरता गया और कितना वक्त निकल गया पता ही नही चला। मीडिया में आने से पहले इसके प्रति जो आकर्षण था जो जूनून था कुछ कर गुजरने का दुनिया में छा जाने का वो अब ख़त्म हो गया। मीडिया की असली तस्वीर को बहुत करीब से देख लिया है मैंने. पत्रकारिता के मायने बदल गये है इसके मन्त्र बदल गये हैं ..इसमें आगे बढ़ने और सफल होने के अलग रस्ते हैं। चाटुकारिता करो ,बोस की सही गलत बातो में हां से हां मिलाओ ,मैनेजमेंट के खिलाफ कभी कुछ कहने का दुस्साहस मत करो .बोस इस आलवेज राईट का फ़ॉर्मूला अपनाओ .गाँधी के तीन मंत्रो की तरह 'कुछ मत सुनो ,कुछ मत देखो और कुछ मत कहो 'को अपना जीवन आधार बनाना होगा और हाँ शराबखोरी तो सबसे बड़ा मन्त्र है इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए ....इन सब चीजो को मैंने नही अपनाया शायद इसलिये मैं थोडा पीछे रह गया लेकिन मुझे संतोष है की मैंने जितना भी हासिल किया अपनी काबिलियत और मेहनत की बदौलत ..इस बात का गर्व है की चापलूसी ,जी हुजूरी और चाटुकारिता के मन्त्र से मैंने खुद को दूर रखा...लेकिन मीडिया के फिल्ड में ये बाते बहुत जरुरी है तभी आप आगे बढ़ सकते हो ...आज मुझे वाकई में बहुत अफ़सोस हो रहा है की इन सब बातो को समझे बगैर इस कष्स्त्र में कूद गया और अपने जीवन का बहुमूल्य समय ख़त्म कर दिया ..खैर बिता समय तो नही लौटता लेकिन इस क्षेत्र की चकाचौंध में आ रहे तमाम नवयुवको से मै यही कहना चाहता हू की अगर पत्रकारिता के इन नये मंत्रो को अपना सकते हो तभी आगे बढ़ो...मीडिया में हम पूरी दुनिया की आवाज उठाते है लेकिन अपनी आवाज उठाने का अधिकार नही है। तमाम प्रयासों के बावजूद भी नौकरी के स्थायित्व की कोई गारंटी नही है ,मंदी के नाम पर जिस तरह से बड़े-बड़े दिग्गज पत्रकरों को भी के मिनट में बाहर का रास्ता दिखा दिया जा रहा है वो गंभीर स्थिति है। जितने भी बड़े पद पर और नाम के पत्रकार हो वो अपने स्थायित्व को लेकर कभी निश्चिंत नही हो सकते... १०-१२ घंटे की शारीरिक -मानसिक मेहनत के बावजूद भी आपको इतनी तनख्वाह नही मिल सकती की आप सुकून की जिंदगी जी सके ,हाँ ऊपर के मंत्रो को अपना लिया तो आपके वारे -न्यारे है.आपकी तनख्वाह अलग होगी इन्क्रीमेंट भी अलग होगी-॥
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Saturday, July 17, 2010
लूट खण्ड
सरप्लस बजट के साथ अस्तित्व में आये झारखण्ड का बजट बिगड़ चूका है। प्राकृतिक खनिज सम्पदा से परिपूर्ण इस राज्य की अधिकांश आबादी कर्ज के दलदल में फंसी है। प्रदेश की आधीआबादी गरीबी रेखा से निचे गुजर बसर कर रही है। शिक्षा,स्वास्थ्य और दूसरी मुलभुत सुविधाओ का भी बुरा हाल है। १० वर्ष की छोटी अवधि में राज्य के हालात तो नही बदले ,सूबे के नेताओ की सूरत और सीरत जरुर बदल गयी। राज्य की अकूत सम्पदा को नेताओ ने किस बेरहमी के साथ लुटा ....पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा और उनके सहयोगियो का हाल देख अंदाजा लगाया जा सकता है...कोड़ा समेत आधे दर्जन नेता जेल की सलाखों के भीतर है और उनकी संपत्ति भी जब्त हो रही है। दुसरे नेता पाक -साफ है ऐसी बात नही है लेकिन क्या हैं न पकड़ा गया वो चोर जो बच गया उसकी सिरमौर ....लोगो ने न केवल यहाँ धन को लुटने का काम किया वरन बौद्धिक संपदा पर भी डाका डाला ..जेपीएससी घोटाला ,नेतरहाट नामांकन घोटाला जैसे मामले निश्चित तौर पर भगवन बिरसा ,सिद्धो-कान्हो और शेख भिकारी जैसे आन्दोलनकारियों की शहादत पर पानी फेर रहे हैं .....
Thursday, July 15, 2010
पहले मुर्गी...पहले अंडा
पहले राज्य...पहले घपले का फंदा....
वैज्ञानिको ने मुर्गी और अंडे के पेंच को तो सुलझा लिया की धरती अपर सबसे पहले मुर्गी आई लेकिन झारखण्ड के मसले पर ये सवाल अब ज्यादा प्रासंगिक है। नवगठित झारखण्ड में जिस तरह से हर रोज भ्रस्ताचार के अध्याय जुड़ते जा रहे है ये प्रश्न ज्यादा मुनासिब है की पहले झारखण्ड बना या घोटाले-घपलो का राज्य.सरप्लस बजट के साथ अस्तित्व में आये इस प्रदेश में उपलब्धियां कम,भ्रस्ताचार के मामले अधिक सामने आये..क्या नेता और क्या अफसर हर किसी का दामन भ्रस्ताचार के कालिख से दागदार है। एक रिपोर्ट में झारखण्ड को अफ्रीकन देशो से भी गरीब राज्य की श्रेणी में ला खड़ा किया है। निश्चित तौर आदिवासी हितो का दंभ भरनेवाले नेताओ को शर्म से डूबकर मर जाना चाहिए..
Tuesday, July 13, 2010
क्या लिखूं

एक अरसा हो गया
जब कुछ लिखा था
जिंदगी की आपाधापी में
खो गया कुछ ऐसा
न अपना होश रहा
न खबर रही दुनिया की
ब्रेकिंग न्यूज़ की जहाँ में
यू उलझ गया..पूछो मत
विसुअल और दो बाईट
शब्दों की हेराफेरी
इसी में सिमटी दुनियादारी
किबोर्ड की खटपट में
खो गयी लेखनी हमारी
दिनभर की दौड़ में
कितना दर्द है क्या कहूँ मैं ..
मर गयी रचना हमारी
कैसे वो जख्म दिखाऊ मैं
अपनी कहानी.अपना फ़साना ..
कैसे और क्या लिखू मैं ....?
क्या लिखू मैं........
Saturday, July 10, 2010
पत्रकारिता...चाटुकारिता....
पत्रकारिता...अरे नीति और सिद्धन्तो से है परे
न ही मेहनत का फल मीठा .न योग्यता की पूछ
जो कर सके जी हुजूरी उसी की है जय
किसी ने क्या खूब कहा था
हो सके मुकाबिल तो अख़बार निकालो
पर क्या वाकई में है आज ऐसा ?
मुख में राम बगल में छुरी
खूब करो बोस की जी हुजूरी
तभी मिलेगी तुम्हे तरक्की
मिलेगा बोस का प्यार <कंपनी का दुलार
ये बात तुम भी गांठ में बांध लो यार
मेरी तो जमी नही तुम इसे अपनाना
पत्रकारिता के इस नये फोर्मुले से हु अनजान
शराब _कबाब गुटबंदी से हूँ दूर
तभी बढ़ नही पाया <रह गया हूँ नादान .....