Tuesday, September 4, 2018

425.मुक्तक.कान्हा

मुक्तक
काल चक्र से परे हो मोहन,तुम्हीं बताओ पड़े कहाँ हो
पार्थ सारथी बने हो माधव,जहां जरूरत खड़े वहाँ हो
तुम्हें ही ढूंढे है जग ये सारा,तड़प रहा है ये दिल हमारा
अभी जरूरत तुम्हारा केशव,चले ही आओ बसे जहाँ हो।

नहीं धरा में न आसमां में,न तुम यहाँ हो ना तुम वहाँ हो
घर के अंदर सबने खोजा,तुम्हीं बताओ ना तुम कहाँ हो
नहीं पता है किसी को तेरा,अजब रचा है ये खेल तेरा
करे मुहब्बत तुम्हें जो कान्हा,यही बताओ ना तुम वहाँ हो।

©पंकज प्रियम

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