मुसाफिर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, सफर अल्फाज़ करता हूँ. कहानी, गीत गजलों से , सहर आगाज़ करता हूँ . नहीं मशहूर की चाहत, नहीं हसरत बड़ी दौलत - प्रियम हूँ मैं मुहब्बत का, दिलों पे राज़ करता हूँ.. ©पंकज प्रियम
मुक्तक अहमियत पेड़ की देखो,....समूचा गाँव है बैठा, कड़ी है धूप जो बाहर,...सभी को छाँव दे बैठा। अगर सब पेड़ काटोगे,....कहाँ से छाँव पाओगे- कदम की चाह में तुमने, कुल्हाड़ी में पाँव दे बैठा।।
©पंकज प्रियम
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