मुसाफिर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, सफर अल्फाज़ करता हूँ. कहानी, गीत गजलों से , सहर आगाज़ करता हूँ . नहीं मशहूर की चाहत, नहीं हसरत बड़ी दौलत - प्रियम हूँ मैं मुहब्बत का, दिलों पे राज़ करता हूँ.. ©पंकज प्रियम
कोई छेड़े जो कुदरत को, यही प्रतिकार है मिलता, कहीं पे बाढ़ कहीं सूखा, कहीं अँगार है मिलता। मिटाकर सारे वन -उपवन, खड़ा कंक्रीट का जँगल- धरा को कष्ट जब होता, यही उपहार है मिलता।। ©पंकज प्रियम
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