मुसाफिर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, सफर अल्फाज़ करता हूँ. कहानी, गीत गजलों से , सहर आगाज़ करता हूँ . नहीं मशहूर की चाहत, नहीं हसरत बड़ी दौलत - प्रियम हूँ मैं मुहब्बत का, दिलों पे राज़ करता हूँ.. ©पंकज प्रियम
मुक्तक-कविता
जले जब धूप में पर्वत, तभी सरिता निकलती है, सजा ले प्रेम का दर्पण, तभी वनिता निकलती है। किसी में प्यार गहराता,किसी को जख़्म हो जाता- दिलों में दर्द जो उमड़े, तभी कविता निकलती है।
©पंकज प्रियम गिरिडीह, झारखण्ड
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