Thursday, October 3, 2019

675. कलम कवि की


कवि की कलम

जब आग दिलों में है जलती,
तब कलम कवि की है चलती।

हर रोज़ निशा भी सँग जगती,
हर बात की साक्षी वह बनती।
जब हृदय में पीर कोई पलती
तब कलम कवि की है चलती। 1।

जब सारा जग है सो जाता,
जब स्याह अँधेरा हो जाता।
जब रात घनेरी कुछ कहती,
तब कलम कवि की है चलती।2।

घड़ी भी टिक-टिक ये करती,
खुद से खुद वह बातें करती।
जब शाम सिन्दूरी बन ढलती,
तब कलम कवि की है चलती।3।

जब किरण सबेरे बिखराती,
सतरंगी छटाएँ निखराती।
जब खुशबू चमन में है घुलती,
तब कलम कवि की है चलती।4।

जब प्यार किसी से हो जाता,
ख़्वाबों में दिल ये खो जाता।
जब साँसे सरगम से सजती,
तब कलम कवि की है चलती।5।

जब साथ किसी का है छूटा,
दिल प्यार में दर्पण सा टूटा।
जब दर्द से नयना है बहती,
तब कलम कवि की है चलती।6

जिस माँ ने गोद में पाला था,
हाँ बाबा ने जीवन ढाला था।
जब तन्हाई उनको है खलती,
तब कलम कवि की है चलती।7।

जब भूख से कोई यहाँ मरता,
जब भीड़ से कोई यहाँ डरता।
जब ज्वाला मन में है जलती,
तब कलम कवि की है चलती।8।

जब राह कोई भी भटकता है,
फाँसी पे किसान लटकता है।
जब सज़ा बिना कोई ग़लती,
तब कलम कवि की है चलती।9।

जब कानून ही अंधा हो जाता,
भ्रष्टाचार ही धँधा हो जाता।
जब पाप की गंगा है बहती,
तब कलम कवि की है चलती।10।

जब धर्म-अधर्म का युद्ध बड़ा,
असत्य हो सत्य विरुद्ध खड़ा।
जब भीष्म की चुप्पी है सधती,
तब कलम कवि की है चलती।11।

जब कलम पे पहरा लगता है,
शासक भी बहरा लगता है।
जब रश्मि रवि की है थमती,
तब कलम कवि की है चलती।12।

©पंकज प्रियम
गिरिडीह, झारखंड

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