बढ़ते चले जाना
शष्टपदी
1222 1222 1222 1222
कभी रुकना नहीं इक पल, सदा बढ़ते चले जाना,
कभी गिरना नहीं नीचे, सदा चढ़ते चले जाना।
समर ये जिंदगी हरक्षण, यहाँ लड़ते चले जाना।
हवा विपरीत हो जाये, मगर अड़ते चले जाना।
सदा कदमों निशां अपने, यहाँ गढ़ते चले जाना।
लिखा जो हर्फ़ जीवन का, प्रियम पढ़ते चले जाना।
©पंकज प्रियम
मुसाफिर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, सफर अल्फाज़ करता हूँ. कहानी, गीत गजलों से , सहर आगाज़ करता हूँ . नहीं मशहूर की चाहत, नहीं हसरत बड़ी दौलत - प्रियम हूँ मैं मुहब्बत का, दिलों पे राज़ करता हूँ.. ©पंकज प्रियम
Tuesday, October 29, 2019
707. बढ़ते चले जाना
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