Thursday, October 10, 2019

685. नींबू पर चढ़ गया राफेल

नींबू पर चढ़ा रॉफेल
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©पंकज प्रियम

लगी मिर्ची तुझे क्यूँ है,.. ....चढ़ा नींबू अगर राफेल,
मजा तब खूब ले लेते, ....कभी होता अगर ये फेल।
हमारे धर्म संस्कारों से,...... रहा भारत सदा समृद्ध-
महज कुछ वोट के कारण, सदा होता ग़लत है खेल।
राफेल युद्ध विमान का पदार्पण हुआ और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने उसकी विधिवत पूजा भी की। इस को लेकर बवाल मचा हुआ है तथाकथित सेक्यूलर और बुद्दिजीवी वर्ग इसका मजाक उड़ाने में लगे हैं। यह कोई नई बात तो नहीं?  जब भी हम कुछ नया करते हैं चाहे वाहन हो या घर-दुकान उसकी पूजा करते ही हैं। राफेल के टायर के नीचे नीबूं रखने का वही लोग मजाक कर रहे  हैं जो अपने-अपने दुकान और घरों में शनिवार को नींबू मिर्च टांगते हैं और फेसबुक में बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। हर शुभकार्य से पहले उसकी पूजा आराधना की पुरानी परम्परा रही है। वाहन पूजा में नींबू पर टायर चढ़ाने की परपंरा रही है जिसके पीछे अपनी अलग आस्था और मान्यता है कि कभी कोई अनहोनी न हो,दुर्घटना न हो। पूजा पाठ में नींबू  का अपना अलग ही स्थान है इसको लेकर हायतौबा मचाने की जरूरत नहीं है। नीबू  और मिर्च इसलिए भी प्रयोग में लाते है कि इससे एक आस्था जुड़ी है कि लोगों की बुरी नजर न लगे। देश के प्रायः सभी ट्रक और दुकानों में देखा होगा कि लोग नींबू और मिर्च टांगकर रखते हैं तो फिर अगर राफेल की पूजा हो भी गयो तो कुछ लोगों को तकलीफ क्यों हो रही है? विश्वकर्मा पूजा में तो लोग टूटी साइकिल की भी पूजा करते हैं। राँची के जैप में तो दुर्गा पूजा के मौके पर खुखरी, तलवार और बन्दूको की पूजा होती है क्योंकि इसे शक्तिपूजा भी कही जाती है। आजतक जितने भी राजा हुए युद्ध के मैदान में जाने से पूर्व तिलक लगाकर पूरी आस्था के साथ शस्त्र पूजा करते थे।
सभी धर्मों में लोग अपनी आस्था के अनुरूप ईश्वर की इबादत करते हैं। बड़े से बड़े वैज्ञानिक और अत्याधुनिक विचारों से लैस व्यक्ति भी अपने अपने भगवान की पूजा करते ही हैं। सन्डे को चर्च जाना, जुमे की नमाज और गुरुद्वारा में सभी जाते ही हैं लेकिन उसके खिलाफ कली टिप्पणी नहीं करता। यहाँ तक कि वोट बैंक के लिए ही सही सेक्युलर का ढोंग करने वाले लोग तो बकायदा टोपी पहन इफ़्तार करते और दरगाहों में चादर चढ़ाने जाते हैं भले ही वो कभी अपने भगवान की पूजा न करते हों। आस्था ही तो है कि लोग इतने रुपये खर्च कर हज करने मक्का मदीना जाते हैं। शैतान को कंकड़ मारते हैं क्या वह भी पाखण्ड है? अजमेर शरीफ़ के दरगाह में जाकर जब चादर चढ़ाते हैं और खिड़की की जाली में धागा बांधते है तो वह पाखण्ड और अंधविश्वास नहीं है क्या? जब चंगाई सभा में हजारों लोग उमड़ते हैं और बीमारी ठीक होने का दावा करते हैं तब तो कोई नहीं कहता कि ये अंधविश्वास है! क्या सारे सवाल सनातन धर्म के लिए ही है? छद्म सेक्युलर इसी से पता चलता है की जब ममता बनर्जी पूरे इस्लामिम तरीके से खुदा की इबादत करती है तो उसे सेक्युलर कहते हैं लेकिन उसी प्रदेश में नुसरत जहाँ ने ही हिन्दू धर्म के अनुसार माँ दुर्गा की पूजा की तो वह हराम हो गया!

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