Wednesday, October 31, 2018

469.विश्वविजय:लौहपुरुष

विश्वविजय
खड़ा हुआ है लौहपुरुष,
एकता भाव जगाने को।
खण्डित होते भारत को
फिर अखण्ड बनाने को।।

वर्षों से जो रहा उपेक्षित,
अब सम्मान दिलाने को।
देशप्रेम जीवन समर्पित,
बल्लभ कदम मिलाने को।।

आसमां को छूता परचम,
झंडा तिरंगा लहराने को।
सबसे ऊंचा रहता हरदम,
विश्व पताका फहराने को।।

दौड़ पड़े हैं सब मिलकर,
एकता का पाठ पढ़ाने को।
कदम-कदम आगे चलकर,
खुद को भी साथ बढ़ाने को।।

देख रही अब सारी दुनियां,
भारत बढ़ा हाथ मिलाने को।
फिर उड़ी है सोने की चिड़ियाँ,
खुद विश्वविजयी कहलाने को।।

©पंकज प्रियम

Monday, October 29, 2018

469.एक दूजे के लिए


एक तेरा और एक मेरा न समझो
सिर्फ था वो सात कदमों का फेरा।
हर कदम खुद पढ़ती इक कसम
हर सांस पर लिखा साथ का डेरा।

पिता-वियोग, पति-मिलन संयोग
रिश्तों के अग्निपथ का वो था घेरा
साथ सात शपथ लेकर साथ कदम
कदमों के हमकदम बनने का फेरा।

घर बाबुल का छोड़,बेटी का समर्पण
जीवन हवन आहुति का प्रण था तेरा
लेकर हाथों में हाथ,कसमों के साथ
परिक्रमा सृजन संसार का था फेरा।

एक दूजे के लिए,खुद का सात वादा
साक्षी बना प्रेम अटूट विश्वास का घेरा
संग जीने मरने सात जन्मों का इरादा
एक दूजे के नवजीवन का था फेरा।

एक दूजे के लिए नवसृजन का वादा
तेरा-मेरा साथ सात, कसमों का फेरा
एक दूजे के लिए नवजीवन का वादा
साथ थे जो चले सात कदमों का फेरा।

©पंकज प्रियम

468.बिगड़ता अंदाज

बिगड़ता अंदाज हूँ
माना कि बदलते दौर का बिगड़ता अंदाज हूँ
लेकिन तेरे कदमों से ही तो बढ़ता मैं आज हूँ।
नए दौर की नई बातें, तुमको ही लगती प्यारी
तेरी ही चाह में खुद का बदलता मैं मिज़ाज हूँ।
करता था मैं भी बात संस्कारों की व्यवहारों की
बदल दिया जो संस्कार,उसी का मैं आगाज हूँ।
धर्म-अधर्म की सारी बातें,सबको लगती भारी
नए दौर के लफ्ज़ों से निकला मैं अल्फ़ाज़ हूँ।
लबों की खामोशी को न समझ लेना कमजोरी
ध्यान से तो सुन तेरे ही दिल की मैं आवाज हूँ।
चुप बैठा हूँ जमीं पे तो बुज़दिल न समझ लेना
आसमां से भी ऊंची जो उड़े वही मैं परवाज हूँ।
ये दुनियां ये दौलत, ये हसरत और ये नफऱत
तेरे मन को जो भाये, वही झंकृत मैं साज हूँ।
अपनी बोली अपना जीवन,कब तुझको भाया
तुमने जो शब्द भरे,उन्हें ही देता मैं आवाज हूँ।
हाँ बदल गया मैं भी अब इन मौसमों की तरह
तुम्हारे ही दिल में तो दफ़न हुआ वो मैं राज हूँ।
कहा था तुमने वक्त के साथ बदलना होता है
बदल गया "प्रियम" तो कहते कि मैं नाराज़ हूँ।
©पंकज प्रियम

Sunday, October 28, 2018

467.मुक्तक। नाम

कोई गुमनाम मरता है,कोई बदनाम करता है
सफ़र-ऐ-जिंदगी ऐसी,कोई आराम करता है
नहीं शिकवा किसी से हो,नहीं गिला करे कोई
कदम मिलके बढ़ाये जो,वही तो नाम करता है।

©पंकज प्रियम

Saturday, October 27, 2018

466.चाँद सा

चाँद सा
क्यूँ देखे तू चँदा, खुद चेहरा तेरा चाँद सा
क्यूँ देखूँ मैं चँदा, जब प्यारा मेरा चाँद सा।

चाहत होगा चकोर का,क्या होगा भोर का
क्यूँ इंतजार करना,ये मुखड़ा तेरा चाँद सा

प्यार है संस्कार है, प्रियतम का इंतजार है
करवा चौथ पे,बेक़रार चेहरा तेरा चाँद सा।

निकल आ रे चँदा, मामला है जज़्बात का
चंद्रदर्शन को व्याकुल चेहरा तेरा चाँद सा।

पुलकित धरती गगन,हर्षित होता प्रियम
एक चाँद को देखने खिला चेहरा चाँद सा।
©पंकज प्रियम

Friday, October 26, 2018

465.गज़ल- चाँद सा

चाँद सा
क्यूँ देखे तू चँदा, खुद चेहरा तेरा चाँद सा
क्यूँ देखूँ मैं चँदा, जब प्यारा मेरा चाँद सा।

चाहत होगा चकोर का,क्या होगा भोर का
क्यूँ इंतजार करना,ये मुखड़ा तेरा चाँद सा

प्यार है संस्कार है, प्रियतम का इंतजार है
करवा चौथ पे,बेक़रार चेहरा तेरा चाँद सा।

निकल आ रे चँदा, मामला है जज़्बात का
चंद्रदर्शन को व्याकुल चेहरा तेरा चाँद सा।

पुलकित धरती गगन,हर्षित होता प्रियम
एक चाँद को देखने खिला चेहरा चाँद सा।
©पंकज प्रियम

Thursday, October 25, 2018

464.शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा

धवल चाँदनी, शरद पूर्णिमा
सकल आसमां, सरस् चंद्रमा।
बरस रही है सुधा भी झर झर
अँजुरी भर भर उसको पी लो।

पुलकित धरती,हर्षित काया
मुग्ध हुआ देख अपनी छाया
निशा शबनमी हुई है निर्झर
अँजुरी भर भर उसको पी लो।

रजत वर्ण से हुई सुशोभित
शरद पूर्णिमा निशा तिरोहित
अमृत कलश हुआ है हर हर
अँजुरी भर भर उसको पी लो।

दिवस ये पावस,सरस् समंदर
उठा रहा ज्वार दिल के अंदर
चमक रही चाँदनी भी भर भर
अँजुरी भर भर उसको पी लो।

©पंकज प्रियम

Tuesday, October 23, 2018

463.दीप जलाओ

स्वच्छता अभियान में हो रही साफ सफाई
थोड़ी पर्यावरण की भी चिंता कर लो भाई।

कुछ ही दिनों में आनेवाली है शुभ दिवाली
पटाखों से फैलेगी हरओर दुर्गंध धुआँ काली।

धूम धड़ाको से मचेगा कितना तब शोर
ध्वनि-वायु प्रदूषण फैलेगा तब हरओर।

नहीं रखना क्या?पर्यावरण का ध्यान!
तो फिर आज ही मन में  लो यह ठान।

बम पटाखों की तुम करो हवा टाइट।
चायनीज लाइट को कहो गुडनाईट ।

हर घर में मिटटी के दीप जलाओ
एक गरीब के घर चूल्हा जलाओ।

घर का बना पुआ पकवान खाओ
मिलावटी खोवे से खुद को बचाओ।

©पंकज प्रियम

Saturday, October 20, 2018

462.याद मुक्तक

मुझे तुम याद आओगे,नहीं तुम भूल पाओगे
गुजारे साथ जो लम्हें,उन्हें क्या भूल पाओगे
नहीं गुजरा हुआ कल हूँ, की मैं लौट ना पाउँ
करोगे याद जो दिलसे,खुदी को भूल जाओगे।
©पंकज प्रियम

Friday, October 19, 2018

453.मुक्तक। आगाज


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बुराई खत्म कर दिल का,नया आगाज तुम कर लो
कहाँ देखा कल किसने,मुहब्बत आज तुम कर लो
नहीं रावण जले कोई...कदम तुम राम के चलना
बहा दो प्रेम की गंगा.....दिलों पे राज तुम कर लो।
©पंकज प्रियम

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Tuesday, October 16, 2018

461.प्यार/मुक्तक

प्यार/मुक्तक

मुहब्बत की निगाहों से,तुझे इजहार कर दूँगा
समंदर सी तेरी आँखे,इश्क़ का ज्वार भर दूँगा
गुलाबी पंखुड़ी से हैं,......शबनमी होठ ये तेरे
अधर को चूमकर तेरे..लबों से प्यार कर लूँगा।

©पंकज प्रियम

Monday, October 15, 2018

460.हादसे

वक्त के हाथों बड़ा लाचार हूँ
हाँ मैं हादसों का शिकार हूँ।

अपनों की खातिर मरते मरते
अपनों से ही पाया दुत्कार हूँ।

जब जब चाहा बेहतर करना
पाया असफलता का द्वार हूँ।

तमन्नाओं की हर ख़्वाहिश में
किया स्वयं कहाँ स्वीकार हूँ।

कौन अपने?कौन पराये यहाँ
रोज इन सवालों से दो चार हूँ।

जब भी निकलता हूँ सफ़र में
हुआ मैं हादसों का शिकार हूँ।

©पंकज प्रियम

459.रावण दहन

रावण दहन करो

भीतर के रावण का दमन करो
फिर तुम रावण का दहन करो।
पहले राम राज्य का गठन करो
फिर तुम रावण का दहन करो।

चला लेना तुम बाण को बेशक़
जला देना निष्प्राण को बेशक़
बचा लेना तू विधान को बेशक़
पहले राम का अनुशरण करो।
फिर तुम.....

पहले राम बनकर दिखलाओ
सबको तुम इंसाफ़ दिलवाओ
पुरुषों में तुम उत्तम कहलाओ
राम की मर्यादा का वरण करो।
फिर तुम....

हर माता का तुम सम्मान करो
पिता वचन का तुम मान रखो
भ्राता प्रेम पर अभिमान करो
रघुकुल रीत से तुम वचन करो।
फिर तुम....

यहाँ घर घर में रावण बसता है
छदम वेश कर धारण डंसता है
अहम पाल कर अंदर हँसता है
आओ पहले इनका शमन करो
फिर तुम....

हर घर सीता सी पीड़ित नारी
अपनों के ही शोषण की मारी
घुट घुट कर मरने की लाचारी
इनके जीवन को चमन करो।
फिर तुम....

सरहद पे रोज चलती है गोली
पहियों तले कुचलती है बोली
भूख कर्ज में रोये जनता भोली
पहले इनका बोझ वहन करो।
फिर तुम...

©पंकज प्रियम

Friday, October 12, 2018

458.ख़्वाब मुक्तक

ख़्वाब भर दूँगा

निगाहों के समंदर में,हसीं इक ख़्वाब भर दूँगा
अधर को चूमकर तेरे,    कली गुलाब कर दूँगा
सुवासित हो मेरा जीवन,बदन महके तेरा चंदन
मुझे ना आजमाना तुम,  तुझे बेताब कर दूँगा।
©पंकज प्रियम

Thursday, October 11, 2018

457.मीरा के घनश्याम

मीरा के श्याम

यशोदा के लल्ला कान्हा
राधा के माधव घनश्याम
गोपियों के  कृष्ण कन्हैया,
मोहन बने मीरा के श्याम।

मीरा रानी का जीवन
समर्पित कान्हा के नाम
राजभोग कर तर्पण
खुद अर्पित घनश्याम।

छोड़ महल बन जोगन
गिरधर को सौंपी जान
हरिनाम का कर भजन
हंसकर किया विषपान।

©पंकज प्रियम

456.विहान

विहान

घर घर नारी का अपमान
पल पल टूटता अभिमान
सिसक रहा बचपन यहाँ
न जाने कब होगा विहान?

सूख रहे सब खेत खलिहान
बंजर जमीं,तपता आसमान
कर्ज़ के दलदल सब है फंसा
न जाने कब होगा कल्याण?
       
सरहद पे रोज मरता जवान
भूखे पेट रोज मरता किसान
सियासत का घनचक्कर यहाँ
पल पल खुद से डरता इंसान।

©पंकज प्रियम

455.शक्ति

शक्ति

मन की शक्ति बढ़े तो बेहतर
तन की शक्ति का क्या है?
उसे तो राख में मिल जाना है।

मन की शक्ति से जीत है
मन की शक्ति से ही हार
जंग जो मन की जीत ली
तन की फिर कैसी हार!

मन की शक्ति से बड़ी
कहाँ कोई और तलवार।
मन की शक्ति जो करे
कहाँ कोई करे हथियार।

©पंकज प्रियम

454.#Me Too

Me Too
हर शख्स पर देखो सवाल हो गया
मीटू मीटू पर देखो बवाल हो गया।

उड़ रही हवाईयां सबके अक्स पर
अब कैसा ये देखो बवाल हो गया।

लग रहा दाग़ हर आमो खास पर
उठी उंगलियां तो बवाल हो गया।

उड़ गयी नींद,चैन सुकून भी गया
उठी जो नज़र, तो बवाल हो गया।

रुपहले पर्दे की वो स्याह हक़ीक़त
छपी किताबों में तो बवाल हो गया।

सोचा नहीं था खुलेंगे राज यहां पर
वर्षों बाद खुली तो बवाल हो गया।

क्यूँ तब चुप रही,यूँ सब सहती रही?
इस सवाल पर तो बवाल हो गया।

©पंकज प्रियम

Wednesday, October 10, 2018

452.माँ तुम अवतार धरो

माँ दुर्गा !फिर अवतार धरो
चण्ड मुण्ड का संहार करो
महिषासुर पर तुम वार करो
दुष्टों में फिर हाहाकार करो।
      माँ दुर्गा! फिर अवतार धरो।
बहुत चढ़ा है ताप यहाँ पर
बहुत बढ़ा है पाप यहाँ पर
बहुत बढ़ा सन्ताप यहाँ पर
पापियों का तुम संहार करो
       माँ दुर्गा!फिर अवतार धरो।
घर घर सिसकती एक नारी
हवस भरी नजरों की मारी
तुम समझो उसकी लाचारी
असह्य वेदना से उद्धार करो।
       माँ दुर्गा! फिर अवतार धरो।
सरहद पे मर रहा जवान
कर्ज़ में पीस रहा किसान
मर्ज़ बिना मर रहा इंसान।
इनका बेड़ा तुम पार करो
      माँ दुर्गा! फिर अवतार धरो।
महँगाई तो देखो हुई चरम
हरपल धरती हो रही गरम
बेहयाई पे उतर आई शरम
कुसंस्कृतियो की हार करो
   माँ दुर्गा!फिर अवतार धरो।

Tuesday, October 9, 2018

माँ

माँ क्या होती है?
ख्यालो की तन्द्रा भंग हुई
देखा सामने मलीन वस्त्रो में
डरा सहमा, निरीह नजरों से
एक बालक चुपचाप खड़ा था।
आश्चर्य! चकित!!अवाक!!!
मैं मानो मूढ़ बन गया
क्या ?मालूम नहीं अभागे को
माँ क्या होती है?
अरे!
बलिदान की देवी
वात्सल्य की सुरत होती है
अमृत की सहस्रधारा
करुणा स्नेह की मूरत होती है
तपिश में चाँदनी
दर्द की दवा बन जाती है
उष्णता में शीतल जल
आन पड़े जो कभी
बच्चों की खातिर
खुद कुर्बान हो जाती है
कोपल का अभेद्य कवच
तकवार की ढाल बन जाती है
माँ का जिसको प्यार मिला
बस समझो कि संसार मिला
गुरु ईश्वर और साथी
दीप की रोशन बाती
कर्तव्य साधना की
भोली सुरत होती है
धरती पे भगवान की
सच्ची मूरत होती है।
माँ
हाँ माँ
यही होती है।
ओ माँ
माँ।
©पंकज प्रियम

451.सत्य

सत्य

सत्य का सूरज कभी ढलता नहीं
झूठ के आँचल कभी पलता नहीं
ढंके कुछ पल भले झूठ का बादल
जो सत्य है वो कभी बदलता नहीं।

©पंकज प्रियम

Monday, October 8, 2018

450.धरोहर

धरोहर

हमारे संस्कार
हमारी संस्कृति
बड़ों का प्यार
संयुक्त परिवार
यही तो धरोहर है।
बड़ों का सम्मान
आतिथ्य का मान
छोटे छोटे अरमान
मन्दिर की घण्टी
मस्जिद का अज़ान
यही तो धरोहर है।
आलीशन भवन नहीं
मीनारें छूती गगन नही
नहीं ये नहीं धरोहर है
प्रेम करुणा धर्म जीवन
सहिष्णुता कर्म समर्पण
प्रेम में जो जीवन तर्पण
वही तो धरोहर है।
©पंकज प्रियम

449.श्रद्धा। मुक्तक

श्रद्धा
विधा-मुक्तक

श्रद्धा हो अगर मन में,खुदा आसान हो जाता
श्रद्धा जो नहीं दिल में,खुदा पाषाण हो जाता
मिलेगा सब यहीं तुझको,जरा श्रद्धा तो रक्खो
श्रद्धा हो अगर तन में,मन भगवान हो जाता।

श्रद्धा है तो सुमिरन है,श्रद्धा है तो समर्पण है
श्रद्धा ही भजन कीर्तन,श्रद्धा है तो अर्पण है
सारा श्राध्द अधूरा है,अगर श्रद्धा नहीं उसमें
तन को मोक्ष जो दे दे,श्रद्धा है तो तर्पण है।

©पंकज प्रियम

Sunday, October 7, 2018

445. मिला ही नहीं

खुशबू यकीनन महक जाती मगर
फूल आपसा कोई खिला ही नहीं।
नजरें यक़ीनन बहक जाती मगर
यहाँ आपसा कोई मिला ही नहीं।
©पंकज प्रियम

Friday, October 5, 2018

448.मुक्तक। प्रकृति

मुक्तक

खिले जो पुष्प उपवन में,भ्रमर करते अनुगूँजन
भरे जो वृक्ष जंगल में,भ्रमण करते वन जीवन
प्रकृति आस वसुधा की,प्रकृति सांस जीवन की
रहे खुशहाल ये जीवन,अगर करते संरक्षण।

©पंकज प्रियम

ब्लॉगर से मुलाकात

https://plus.google.com/+iBlogger/posts/LZExdjqDjTp?_utm_source=1-2-2

447.मुक्तक। चरणामृत

चरणामृत
जरा सा चरणामृत पिया,क्यूँ बवाल करते हो
ऐसा उसने क्या किया,जो सवाल करते हो
यहां चाटे है जो तलवा,वही खाता है हलवा
उसने क्या पैर है धोया,तुम कमाल करते हो।

©पंकज प्रियम

Thursday, October 4, 2018

446.मुक्तक। सपने

सपने। मुक्तक

पलक जो बन्द कर देखा,वही सपना होता है
पलक जो खोल कर देखा,वही अपना होता है
कहाँ पूरे हुए सपने,कहाँ कब हो सके अपने
उड़ा दो नींद आंखों की,तभी अपना होता है।

©पंकज प्रियम

Wednesday, October 3, 2018

444.धन। मुक्तक

धन जो पास नहीं होता,बड़ा मजबूर करता है
धन जो पास बहुत होता,बड़ा मग़रूर करता है
नहीं कोई शख्स है ऐसा, जो चाहे नहीं पैसा
धन को पाकर हर अक्स,बड़ा गुरुर करता है।
©पंकज प्रियम

Tuesday, October 2, 2018

443.गाँधी:मुक्तक

गाँधी जयंती :मुक्तक

मेरे बापू का था सपना,स्वच्छ भारत हो अपना
नहीं मैली रहे गंगा, नहीं गन्दा रहे यमुना
बने सोने की फिर चिड़ियां,कदम चूमे पूरी दुनियां
नहीं लाचार हो कोई,ना हिंसा की कोई घटना।
2
जमीं पे लौट कर देखो,हुआ है हश्र क्या देखो
हुई गंगा बहुत मैली,नदी का हाल क्या देखो
बहुत हिंसा है फैली,चले हर बात पे गोली
बड़ा बीमार सिस्टम है,हुआ बेहाल  क्या देखो।
3
नमन हम आज करते हैं,तुम्हें हम याद करते हैं
तेरे कदमों पे ही चलना,यही फरियाद करते हैं
तेरे सपनों के भारत की,हमें आधार है रखना
अहिंसा और सुरक्षा की,अब शुरुआत करते हैं।
©पंकज प्रियम

Monday, October 1, 2018

442.बिखरे अहसास

रिश्तों ने की साज़िश ऐसी
#बिखर गये अहसास मेरे
लफ्ज़ों ने की साज़िश ऐसी
बिखर गये अल्फाज़ मेरे।
अश्क़ों की हुई बारिश ऐसी
भींग गये सब ख़्वाब मेरे
काँटों ने की साज़िश ऐसी
बिखर गये सब गुलाब मेरे।
अपनों ने की रंजिश ऐसी
दुश्मनों की दरकार नहीं
अपनों ने की बंदिश ऐसी
सपनों में भी प्यार नहीं।
ख़्वाबों की ख्वाहिश ऐसी
बचा नहीं कुछ  पास मेरे
हसरतों की नुमाइश ऐसी
बचे नहीं अहसास मेरे।
©पंकज प्रिय

441.दफ़ा 497.दोहे

दोहे-कोर्ट का फैसला।

निर्णय कैसा कर दिया,लेकर के संज्ञान।
इक झटके में हर लिया,तूने सबके प्राण।।

रिश्ते नाते बह गए,यौन तृप्ति आधार।
आदिम युग को ला रहे,अब कैसा परिवार।।

न्यायालय ही रच रही,एक अलग संसार।
नैतिकता कैसी रही,हुआ वैध व्यभिचार।।

साहब तुम ऐसा करो,छोड़ो घर परिवार।
सारे बन्धन तोड़ दो,खोलो तुम बाज़ार।

मर्यादा अब क्या रही,नहीं लोक की लाज
वर्जना जो टूट गयी,क्या रहेगा समाज।।

✍पंकज प्रियम