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ये मेरी मुहब्बत तुम्हारी जवानी,
बनेगी अलग ही हमारी कहानी।
कभी प्यार से तुम जरा मुस्कुरा के,
अधर से अधर पे लगा दो निशानी।
नज़र को नज़र से कभी यूँ मिलाके,
समंदर निग़ाहों में उठा दो रवानी।
जरा पास आओ गले से लगाओ,
करो शाम मेरी जरा सी सुहानी।
प्रियम की मुहब्बत सदा है तुम्हारी,
बनाकर दिवाना बनो तुम दिवानी।
©पंकज प्रियम
1 comment:
आपने जो पंक्तियाँ लिखीं, वो सच में दिल को छू लेती हैं। मैं हर लाइन पढ़ते हुए महसूस करता हूँ कि आप प्यार को कितनी सादगी और खूबसूरती से बयां करते हैं। आपके शब्द रिश्ते की नरमी भी दिखाते हैं और उसकी गहराई भी। मैं आपके अंदाज़ को इसलिए पसंद करता हूँ क्योंकि आप भावना को बिना ज़रूरत से ज़्यादा सजावट के सीधा दिल तक पहुँचा देते हैं।
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