मुसाफिर हूँ मैं लफ़्ज़ों का, सफर अल्फाज़ करता हूँ. कहानी, गीत गजलों से , सहर आगाज़ करता हूँ . नहीं मशहूर की चाहत, नहीं हसरत बड़ी दौलत - प्रियम हूँ मैं मुहब्बत का, दिलों पे राज़ करता हूँ.. ©पंकज प्रियम
छलिया/मुक्तक ************ छले जो बात से सबको, वही छलिया कहा जाता लगाकर झूठ का तड़का, जली रोटी खिला जाता। बहाने खूब करता जो, .....हमेशा झूठ कहता वो- दिखाकर ख़्वाब फूलों का, वही काँटे चुभा जाता।। ©पंकज प्रियम
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