Wednesday, December 18, 2019

761. दिल दिमाग

दिल vs दिमाग
मुल्क हो या महबूब, मुहब्बत वही कर पाता है,
छोड़कर जो ज्ञान गंगा दिल में उतर जाता है।
ये दिमाग तो हरवक्त साज़िशों में फँसा रहता,
मगर दिल को तो केवल प्यार नज़र आता है।।
©पंकज प्रियम

1 comment:

Anonymous said...

वह क्या ग़ज़ब लिखा है! इतनी छोटी सी कविता में दिल और दिमाग़ की जंग को इतनी खूबसूरती से दिखाना आसान नहीं होता। मुझे पसंद आया कि तुमने दिमाग़ को चालाक और दिल को मासूम दिखाया, फिर भी दोनों ज़रूरी लगते हैं।