Sunday, March 11, 2018

ग़ज़ल-जिंदगी






जिंदगी को न मुख़्तसर कर लेना
यूँ अधर में ही न गुज़र कर लेना।

संग चलना है बहुत दूर ऐ जिंदगी
यूँ राह अकेले न सफर कर लेना।

तेरे नाम ही लिख दी मैंने जिंदगी
किसी और संग न बसर कर लेना।

सुबहो शाम की है तेरी मैंने बन्दगी
आधी रात ही न तू सहर कर लेना।

लफ्जों में लिख दी है मैंने जिंदगी
होके रुसवा न तू जहर कर लेना।

तेरी सांसों में बसी है खुशबू मेरी
बात जमाने का न असर कर लेना।

बहुत खूबसूरत है सुन तू ऐ जिंदगी
इसे न तू यूँ खुद मुख़्तसर कर लेना।
©पंकज प्रियम
11.3.2018

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