Saturday, May 5, 2018

315. ग़ज़ल-दीवाना न होगा


अब जमाने से तो कतराना न होगा
राज भी दिल का अब छुपाना न होगा।

चाहतों के दरमियां अब कुछ न बचा है
मुहब्बतों का और तो ठिकाना न होगा।

लिख दिया है फसाना हमने इश्क़ का
अब यहाँ और कोई अफ़साना न होगा।

तेरी मुहब्बत में जो हद गुजार दी हमने
यहाँ मुझसा और कोई दीवाना न होगा।

आज तुमने जो हमें यूँ छू लिया हमको
इससे बड़ा कोई और नजराना न होगा।

चाँद ही कह देगा सब हाले दिल प्रियम
अब तुम्हें उनसे कुछ जतलाना न होगा।
©पंकज प्रियम
5.5.2018

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